भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1769, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1769

इक्कीसवाँ अध्याय 21/142-145 ] वेणु-माधुरीका प्रभाव :- ध्वनि-बड़ उद्धत, पतिव्रतार भाङ्गे व्रत, पति-कोल हैते टानि' आने। वैकुण्ठेर लक्ष्मीगणे, येइ करे आकर्षणे, तार आगे केबा गोपीगणे ॥ 142 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी वेणुकी ध्वनि बहुत अभिमानी है, वह पतिव्रता-स्त्रियों तकके व्रतको भङ्ग करा देती है। वह ध्वनि उन्हें पतियोंकी गोदसे भी खींचकर ले आती है। उसमें इतना सामर्थ्य है कि वह वैकुण्ठकी लक्ष्मियों तकको भी आकर्षित कर लेती है, तब गोपियोंके विषयमें क्या कहें? ॥ 142 ॥ नीवि खसाय पति-आगे, गृहधर्म कराय त्यागे, बले धरि' आने कृष्णस्थाने। लोकधर्म, लज्जा, भय, सब ज्ञान लुप्त हय, ऐछे नाचाय सब नारीगणे ॥ 143 ॥ अनुवाद—वंशीकी ध्वनि पतियोंके सामने ही गोपियोंके नाड़ेको ढीला कर देती है, गोपियोंके गृह-धर्मका त्याग कराकर उन्हें बलपूर्वक पकड़कर उस स्थानपर ले आती है, जहाँपर श्रीकृष्ण विराजमान होते हैं। उन गोपियोंका लोकधर्म, लज्जा, भयादिका सब ज्ञान लुप्त हो जाता है। श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि समस्त नारियोंको अपने इशारोंपर नचाती है॥ 143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'नीवि'—लहँगेको कमरसे बाँधने वाली डोरी॥ 143 ॥ श्रीकृष्णके अतिरिक्त सभी शब्दोंको स्तम्भित करनेवाली :- काणेर भितर वासा करे, आपने ताँहा सदा स्फुरे, अन्य शब्द ना देय प्रवेशिते। आन कथा ना सुने काण, आन बुझिते बोलय आन, एइ कृष्णेर वंशीर चरिते॥ 144 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 144 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'काणेर भितर वासा करे'—'हम गोपियाँ हैं, हमारे कानके भीतर वंशीध्वनि वास करती है अर्थात् सदा कानमें लगी ही रहती है॥' 144 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि गोपियोंके कानोंमें आवास बनाकर स्वयं ही ध्वनिकी स्फूर्तिसे गोपियोंको उन्मत्त प्राय बनाकर रखती है, तब गोपियोंके कानमें अन्य कोई शब्द प्रवेश नहीं कर पाता और उनका मन कहीं और होनेके कारण वे ठीक-ठीक उत्तर नहीं दे पातीं। श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिका ऐसा प्रभाव है कि वह गोपियोंके मनको सम्पूर्ण रूपसे श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंसे दूर कर देती है॥ 144 ॥ इक्कीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभुका बाह्य दशामें आना, अमानी और मानद-धर्म :- पुनः कहे बाह्यज्ञाने, आन कहिते कहिलुँ आने, कृष्ण-कृपा तोमार उपरे। मोर चित्त-भ्रम करि', निजेश्वर्य-माधुरी, मोर मुखे शुनाय तोमारे ॥ 145 ॥ अनुवाद—कुछ बाह्यज्ञान होनेपर महाप्रभु पुनः कहने लगे—मैं क्या कहते-कहते क्या कह गया? हे सनातन! तुमपर श्रीकृष्णकी कृपा है, इसलिये उन्होंने ही मेरे चित्तको भ्रमित कराके, अपने ऐश्वर्य और माधुर्यकी कथाको मेरे मुखके माध्यमसे तुम्हें सुनाया है॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस प्रेमके आवेशमें श्रीकृष्णतत्त्व बोलते-बोलते बाह्यज्ञान शून्य होकर महाप्रभुने जिस रससन्दर्भको प्रकाशित किया, यह स्थान उसका वर्णन-स्थल नहीं है। इसलिये वे कह रहे हैं,—"मैं एक विषयमें बोलते हुए अन्य विषयको बोलने लगा, श्रीकृष्णने कृपा करके मेरे चित्तमें भ्रम उत्पन्न कराके अपनी ऐश्वर्य-माधुरी तुम्हें श्रवण करायी है॥ 145 ॥ इक्कीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। । 323

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