भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1776, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1776

[ 22/8-18 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अमृतप्रवाह भाष्य—'स्वांश-रूपे'—अर्थात् चतुर्व्यूह हुई) और मेरी लज्जाकी भी उपशान्ति नहीं हुई। हे और उनके अवतारोंके रूपमें। स्वांश-अवस्थामें यदुपते! अन्तमें मैं उन्हें परित्याग करके सद्बुद्धि प्राप्त श्रीकृष्णका स्व-स्वरूपत्व सर्वत्र लक्षित होता है। करके आपके अभयचरणोंमें शरणागत हुआ हूँ, आप जीव—उनके विभिन्नांश रूप हैं। जीव भी श्रीकृष्णकी अब मुझे अपने दासके रूपमें नियुक्त करो॥16॥ शक्तिरूपमें गिने जाते हैं। जीव दो प्रकारके हैं—नित्यमुक्त अनुभाष्य— और नित्यसंसार (बद्ध)। नित्यमुक्त जीवोंने कभी भी कामादीनां (कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यादीनां) दुर्निदेशाः (दुष्टाः मायाके सम्बन्धका आस्वादन नहीं किया। वे श्रीकृष्णके आदेशाः) कतिधा (प्रकाराः) मया कति न पालिताः (अपि चिन्मय धाममें श्रीकृष्णचरणोंके उन्मुख रहकर तु पालिता एव); तेषां (कामादिरिपूणां) मयि करुणा (दया) 'श्रीकृष्ण-पार्षद'-नामसे जाने जाते हैं और श्रीकृष्णसेवा- न, त्रपा (ममापि लज्जा) न, उपशान्तिः (मम तद्विसर्जनेच्छापि) सुख ही उनका भोग है। नित्यबद्ध सभी जीव श्रीकृष्णसे न च जाता। अथ (अनन्तरं) हे यदुपते, साम्प्रतम् (इदानीं) नित्य बहिर्मुख रहकर संसारमें स्वर्ग-नरकादि सुख- तान् (कामादीन्) उत्सृज्य (रिपु-पारवश्यं त्यक्त्वा) लब्धबुद्धिः दुःखका भोग करते हैं। श्रीकृष्ण-बहिर्मुखता दोषके लिये (अभिज्ञः सन्) अभयम् (अकुतोभयं) त्वां शरणम् आयातः माया-पिशाची उन्हें स्थूल और सूक्ष्म आवरणमें बाँधकर (प्राप्तः); माम् आत्मदास्ये (निजकैङ्कर्ये) नियुङ्क्ष्व (नियोजय)। दण्ड प्रदान करती है अर्थात् आध्यात्मिकादि तीन श्लोक-भावानुवाद—काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद- प्रकारके ताप उन्हें बहुत ही जर्जरित करते हैं। वे मात्सर्य आदिके कितने दुष्ट आदेशोंका मैंने कितनी काम-क्रोधादि छः तरङ्गोंके वशीभूत होकर मायारूपी प्रकारसे पालन किया है, तो भी वे मेरे प्रति दया नहीं पिशाचीकी लातें खाते रहते हैं—यही जीवोंका रोग है। करते और [निर्लज्जकी भाँति उनकी सेवा करते हुए] संसारमें इस प्रकार ऊपर-नीचे (स्वर्ग-नरकमें) भ्रमण न ही मेरी लज्जा त्याग करनेकी इच्छा होती है। हे करते-करते जीव यदि कभी साधुरूपी वैद्यको प्राप्त यदुपते! अन्तमें अब मैं उन कामादि शत्रुओंकी करता है, तब उनके उपदेशरूपी मन्त्रसे माया-पिशाची वश्यताको त्यागकर सद्बुद्धि प्राप्त करके आपके भाग जाती है और जीव भी श्रीकृष्णभक्ति प्राप्त करके अभयचरणोंकी शरणमें आया हूँ, कृपा मुझे अपने श्रीकृष्णके निकट पहुँच जाता है॥8-15॥ दासके रूपमें नियुक्त कीजिये॥16॥

  शरणागतकी प्रार्थना :-       भक्ति ही निरपेक्ष अभिधेय और
  भक्तिरसामृतसिन्धु (3/2/25)—       कर्मज्ञानयोगादि भक्ति-सापेक्ष :-

कामादीनां कति न कतिधा पालिता दुर्निदेशा- कृष्णभक्ति हय अभिधेय-प्रधान। स्तेषां जाता मयि न करुणा न त्रपा नोपशान्तिः। भक्तिमुख-निरीक्षक कर्म-योग-ज्ञान॥17॥ उत्सृज्यैतानथ यदुपते साम्प्रतं लब्धबुद्धि- भक्तिके आश्रयके बिना कर्मज्ञानयोगादिकी निष्फलता :- स्त्वामायातः शरणमभयं मां नियुङ्क्ष्वात्मदास्ये॥16॥ एइ सब साधनेर अति तुच्छ बल। कृष्णभक्ति बिना ताहा दिते नारे फल॥18॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥16॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्, कामादिके कितने ही अनुवाद—श्रीकृष्णभक्ति ही प्रधान अभिधेय है। प्रकारके दुष्ट आदेशोंका ही मैंने (कितनी प्रकारसे) कर्म-योग-ज्ञान संसारसे मुक्तिके उपाय हैं, परन्तु फल पालन किया है। तथापि मेरे प्रति उनकी करुणा (नहीं देनेमें ये सब भक्तिपर निर्भर करते हैं। इस सब साधनोंका बल अति तुच्छ है और भक्तिके बिना ये

330 ।

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1776, कुल 2549 में से · BharatKosha