श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1777, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाईसवाँ अध्याय 22/17-20 ] स्वतन्त्ररूपसे फल देनेमें असमर्थ हैं॥17-18॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्रोंमें अनेक स्थानोंपर कर्मको, अनेक स्थानोंपर योगको और अनेक स्थानोंपर ज्ञानको ‘अभिधेय’ कहकर वर्णन किया गया है; तथापि सर्वत्र भक्तिको ही सर्वप्रधान ‘नित्य अभिधेय’ कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्णभक्ति ही परमपुरुषार्थ (प्रेम)को प्राप्त करनेका एकमात्र प्रधान अर्थात् 'साक्षात्' अभिधेय है; कर्म, योग और ज्ञानको जो अभिधेय रूपमें कहा है, वह—'गौण' है; क्योंकि, भक्तिके मुखकी अपेक्षा करके ही वे जो कुछ भी फलादि प्रदान कर सकते हैं। भक्तिके आश्रयके बिना कर्म, योग और ज्ञान कोई भी फल नहीं दे सकते। भक्तिका आश्रय प्राप्त करनेपर ही कर्म और हठ-योग भुक्ति-फल एवं ज्ञान और राजयोग मुक्ति और सिद्धि-फल दे सकते हैं॥17-18॥ भक्तिविहीन शुष्कज्ञान या निष्काम कर्म भी व्यर्थ :— श्रीमद्भागवत (1/5/12)में— नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाव-वर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे ना चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥19॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥19॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नैष्कर्म्यरूपी निर्मलज्ञान ही जब अच्युत भक्तिसे वर्जित होनेपर शोभा नहीं पाता, तब सदैव अभद्र (अशुभ) स्वभाववाले कर्म ईश्वरमें अर्पित नहीं होनेपर निष्काम होनेपर भी किस प्रकार शोभा पा सकते हैं?॥19॥ अनुभाष्य—श्रीव्यासदेवके द्वारा बहुत तप-अनुष्ठान और सभी शास्त्रोंका प्रणयन आदि करनेपर भी उनका चित्त प्रसन्न नहीं हुआ और वे सरस्वती नदीके तटपर अप्रसन्न चित्तसे मन-ही-मनमें अनेक प्रकारके तर्क-वितर्क और खेद कर रहे थे, तब उनके अन्तर्यामी गुरुदेव श्रीनारद गोस्वामी वहाँ आकर उपस्थित हुए। व्यासदेवने उनसे अपनी आत्माकी प्रसन्नताके अभावके कारणकी जिज्ञासा की, तब श्रीनारद कर्म और ज्ञान आदि सभी मार्गोंकी अपेक्षा शुद्ध हरिभक्तिके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं— अच्युतभाववर्जितम् (अच्युते कृष्णे भाववर्जितम् अनुकूलानुशीलनविहीनं चेत्) निरञ्जनं (निरुपाधिकं निर्मलमिति यावत्) नैष्कर्म्य (फलभोगराहित्यम् अपि) ज्ञानम् अलम् (अत्यर्थं) न शोभते (सम्यक् मोक्षाय न कल्पते); पुनः तथा शश्वत् (सर्वसमये साधनकाले प्राप्तिकाले च अतएव) अभद्रं (दुःखात्मकं) यत् च अकारणं कर्म (प्रवृत्तिपरं काम्य यद्यपि निवृत्तिपरम् अकाम्यं तच्चापि कर्म) ईश्वरे (विष्णौ) न अर्पितं (नोद्दिष्टं सत्) कुतः [शोभते? नैव हीति भावः]। श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके अनुकूल अनुशीलनसे विहीन फलभोगरहित निर्मलज्ञान ही जब शोभा नहीं पाता, तब जो सदैव (अर्थात् साधनकाल और फलप्राप्तिकाल, दोनोंमें) दुःख प्रदान करनेवाला है, वह कर्म विष्णुमें अर्पित नहीं होनेपर निष्काम होनेपर भी किस प्रकार शोभा पा सकता है? अर्थात् नहीं पा सकता—यह भाव है॥ ॥19॥ श्रीकृष्णको अर्पित किये बिना समस्त प्रकारके कर्मकाण्ड—संसारजनक :— श्रीमद्भागवत (2/4/17)में— तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः। क्षेमं न विन्दन्ति बिना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥20॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सभी तपस्वी, सभी दान-परायण व्यक्ति, सभी यशस्वी व्यक्ति, मनस्वी व्यक्ति, वेदोंके मन्त्रोंको जाननेवाले सभी व्यक्ति, उनके द्वारा किये गये वे कर्म सुमङ्गल होनेपर भी, जिन्हें अर्पण नहीं करनेसे कुछ भी मङ्गल प्राप्त नहीं कर सकते, उन सुभद्रश्रवा । 331