भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1778, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1778

[ 22/20-22 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (मङ्गलकीर्तिवाले) भगवान्‌को पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ॥ 20 ॥ अनुभाष्य—परीक्षितके द्वारा मायाधीश श्रीहरिकी सृष्टि आदि लीलाके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर, श्रीशुकदेव श्रीहरि और उनकी सेवाके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं— तपस्विनः (तपोनिरताः ज्ञानिनः) दानपराः (वदान्याः) यशस्विनः (कीर्त्तिमन्तः) मनस्विनः (योगिनः) मन्त्रविदः (निगमागमविदः) सुमङ्गलाः (सदाचाराः) यदर्पणं (यस्मिन् श्रीहरौ पूर्वोक्त- तपादिना स्व-स्व-प्राप्यफलसमर्पणं) बिना (ऋते) क्षेमं (कल्याणं) न विन्दन्ति (न प्राप्नुवन्ति), तस्मै सुभद्रश्रवसे (मङ्गलकीर्त्तिविग्रहाय भगवते श्रीहरये) नमो नमः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 20 ॥ भक्तिविहीन ज्ञान मुक्तिप्रद नहीं; मुक्ति-भक्तिकी दासी :- केवल ज्ञान 'मुक्ति' दिते नारे भक्ति बिना। कृष्णोन्मुखे सेइ मुक्ति हय ज्ञान बिना॥ 21 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“ज्ञानतः सुलभा मुक्तिः”-इस शास्त्रवचनसे जाना जाता है कि ज्ञान ही मुक्ति दे सकता है, किन्तु उसमें एक गूढ़ बात यह है कि भक्तिके आश्रयसे ही ज्ञान मुक्ति दिया करता है। पक्षान्तरमें, श्रीकृष्णोन्मुखी भक्तिके उदित होनेपर किसी भी प्रकारकी ज्ञानकी चेष्टा नहीं करनेपर भी मुक्ति स्वयं ही उपस्थित होती है॥ 21 ॥ अनुभाष्य-केवल-ज्ञान अर्थात् भक्तिरहित सम्विद् वृत्तिका अनुभव जीवको जड़-बन्धनसे मुक्त नहीं करा सकता। ब्रह्मको जाननेके लिये जीव कितना ही (संसारकी सभी वस्तुओंको नकारते हुए) यह ब्रह्म नहीं है, यह ब्रह्म नहीं है क्यों न करे, उसमें श्रीकृष्ण-स्वरूपकी अज्ञानताके कारण अहंग्रहोपासना (जिसकी मैं उपासना कर रहा हूँ, मैं वही हूँ, यह बुद्धि) ही प्रबल हो जाती है और वह अधःपतित हो जाता है। ज्ञानानुशीलन नहीं करनेपर भी श्रीकृष्णकी सेवामें तत्पर होनेपर वह जीव ज्ञानके फल जड़-बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करके श्रीकृष्णके स्वरूपके अनुभवको प्राप्त करता है। श्रीकृष्णकर्णामृतमें- “भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा भगवन् यदि स्याद्देवेन न फलति दिव्य-किशोरमूर्त्तिः। मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलिः सेवतेऽस्मान् धर्मार्थकामगतयः समय-प्रतीक्षाः॥” [अर्थात् “हे भगवन्! आपमें यदि हमारी अचला भक्ति रहे, तब आपकी अप्राकृत किशोरमूर्ति स्वतः ही हमारे हृदयमें उदित होती है। उस समय मुक्ति स्वयं हाथ जोड़कर हमारी सेवामें रत होती है और धर्म, अर्थ और काम भी सेवाके लिये आदेशके समयकी प्रतीक्षा करते हैं।”]॥ 21 ॥ भक्तिमार्गमें ही एकमात्र नित्य कल्याण, उसके अतिरिक्त शुष्क ज्ञानसे वृथा परिश्रम ही सार (फल) :- श्रीमद्भागवत (10/14/4)में— श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये। तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥ 22 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 22 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे विभो! आपमें भक्ति ही कल्याणका पथ है, उसे परित्याग करके जो सब व्यक्ति केवल ज्ञान प्राप्तिके लिये अर्थात् 'मैं ब्रह्म' हूँ, इसको ही स्थिर रूपमें जाननेके लिये अनेक प्रकारके कष्ट स्वीकार करते हैं, खाली भूसीको पीसनेवालोंको जिस प्रकार चावल नहीं मिलते, उसी प्रकार, उन्हें अन्तमें क्लेशमात्र ही प्राप्त होता है॥ 22 ॥ अनुभाष्य-बछड़ोंको हरण करनेके फलस्वरूप श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माके अभिमानके चूर्ण होनेपर ब्रह्मा श्रीकृष्णके एकान्त शरणागत होकर स्तव कर रहे हैं- हे विभो (भगवन्), ये (जनाः आरोहवादि-तर्कपन्थिनः) श्रेयःसृतिं (श्रेयसां अभ्युदयापवर्गलक्षणानां सृतिं सरणं मार्गभूतां) ते (तव) भक्तिं (शुद्धभजनम्) उदस्य (त्यक्त्वा) केवलबोधलब्धये 332 |

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