भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1832, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1832

[ 23/41-46 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला व्यक्ति ही चमत्कृत होते हैं। किन्तु भक्ति-सिद्धान्तको जाननेवाले व्यक्ति उसे 'रतिका आभास' कहते हैं॥41॥ पाँच रसोंसे ही श्रीकृष्ण वशीभूत :— एइ पञ्च स्थायिभावे हय पञ्च 'रस'। ये-रसे भक्त 'सुखी', कृष्ण हय 'वश'॥42॥ अनुवाद—इन पाँच स्थायी भावोंमें पाँच रस होते हैं। जिस रसमें भक्त सुखी होता है, श्रीकृष्ण भी उसी रसमें ही उसके वशीभूत हो जाते हैं॥42॥ अनुभाष्य—'स्थायी भाव'—(भःरःसिः दःविः 5म लः प्रथम श्लोक)— “अविरुद्धान् विरुद्धांश्च भावान् यो वशतां नयन्। सु-राजेव विराजेत स स्थायी भाव उच्यते॥ स्थायी भावोऽत्र स प्रोक्तः श्रीकृष्णविषया रतिः।” अर्थात् “हास्यादि अविरुद्ध भाव और क्रोधादि विरुद्ध भावसमूहको जो भाव वशीभूत करके उत्तम राजाकी भाँति विराजित होता है, वही स्थायी भाव है। इस स्थानपर श्रीकृष्ण-विषयक रतिको ही 'स्थायी भाव' कहा जाता है॥”42॥ स्थायीभाव अथवा रतिके साथ सामग्रीके मिलनसे रसकी उत्पत्ति; रति ही रसका 'मूल' :— प्रेमादिक स्थायिभाव सामग्री-मिलने। कृष्णभक्तिरसरूपे पाय परिणामे॥43॥ अनुवाद—प्रेमादि स्थायी-भावके साथ सामग्रीके मिलनसे श्रीकृष्णभक्ति रसरूपमें परिणत हो जाती है॥43॥ चार प्रकारकी सामग्री :— विभाव, अनुभाव, सात्त्विक, व्यभिचारी। स्थायिभाव 'रस' हय एइ चारि मिलि'॥44॥ उपमा :— दधि येन खण्ड-मरिच-कर्पूर-मिलने। 'रसालाख्य' रस हय अपूर्वास्वादने॥45॥ अनुवाद—दही जिस प्रकार चीनी, काली मिर्च और कर्पूरके मिलानेपर अपूर्व आस्वादनीय 'रसाला' रूपी रस बन जाती है, स्थायीभाव भी उसी प्रकार विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी—इन चारोंसे मिलकर 'रस' बन जाता है॥44-45॥ अनुभाष्य—(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)— “अथास्याः केशवरतेर्लक्षिताया निगद्यते। सामग्रीपरिपोषेण परमा रसरूपता॥ विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः। स्वाद्यत्वं हृदि भक्तानामानीता श्रवणादिभिः। एषा कृष्णरतिः स्थायी भावो भक्तिरसो भवेत्॥” [अर्थात् “बादमें इस कृष्णरतिकी विभावादि सामग्रीके द्वारा परिपोषणके कारण जो परम रसरूपता प्राप्त होती है, उसे ही यहाँ कहा गया है। श्रवणादि साधनभक्तिके अङ्गोंके द्वारा भक्तोंके हृदयमें यह श्रीकृष्णरति-रूप स्थायी भाव—विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी भावोंके द्वारा आस्वादनीय होनेपर भक्तिरसमें परिणत होता है।”]॥43-44॥ रसके हेतु विभावके दो प्रकार— (1) आलम्बन और (2) उद्दीपन :— द्विविध 'विभाव',—आलम्बन, उद्दीपन। वंशीस्वरादि-उद्दीपन, कृष्णादि-आलम्बन॥46॥ अनुवाद—विभाव दो प्रकारके होते हैं—आलम्बन और उद्दीपन। श्रीकृष्णआदि आलम्बन और वंशीध्वनि आदि उद्दीपन कहलाते हैं॥46॥ अनुभाष्य—(भःरःसिः दःविः प्रथम लः श्लोक)— “तत्र ज्ञेया विभावास्तु रत्यास्वादन-हेतवः। ते द्विधालम्बना एके तथैवोद्दीपनाः परे॥” इस विषयमें अग्निपुराणमें— “विभाव्यते हि रत्यादिर्यत्र येन विभाव्यते। विभावो नाम स द्वेधालम्बनोद्दीपनात्मकः॥” अर्थात् “श्रीकृष्णरतिके आस्वादनके कारणको 'विभाव' कहते हैं; वह दो प्रकारका होता है—आलम्बन और 386 |

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