श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1834, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 23/48-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला इन सबके मिलनेपर अत्यन्त चमत्कारी 'रस' बनता अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 50-51 ॥ है॥ 48 ॥ अनुभाष्य—शान्तरसमें 'रति'की बढ़ते हुए 'प्रेम' अनुभाष्य—'निर्वेद-हर्षादि'—मध्यलीला 14/167 संख्या तक सीमा है। दास्यरसमें 'दास्यरति' स्नेह, मान, प्रणय देखें। और राग तक वर्द्धित होती है। सख्यरसमें 'सख्यरति' 'व्यभिचारी'—(भःरःसिः दःविः चतुर्थ लहरी प्रथम स्नेह, मान, प्रणय, राग और अनुराग तक बढ़ती है। श्लोक)— वात्सल्यरसमें 'वात्सल्यरति' स्नेह, मान, प्रणय, राग और “त्रयस्त्रिंशद्भावाः ये व्यभिचारिणः। अनुराग तक वर्द्धित होती है। विशेषता यह है कि विशेषेणाभिमुख्येन चरन्ति स्थायिनं प्रति। सख्यरसाश्रित होनेपर भी सुबलादिकी सख्यरति स्नेह, वागङ्गसत्त्वसूच्या ये ज्ञेयास्ते व्यभिचारिणः॥ मान, प्रणय, राग, अनुराग और भाव तक वर्द्धित होती सञ्चारयन्ति भावस्य गतिं सञ्चारिणोऽपि ते। है॥ 50-51 ॥ उन्मज्जन्ति निमज्जन्ति स्थायिन्यमृतवारिधौ। ऊर्मिवद्वर्द्धयन्त्येनं यान्ति तद्रूपताञ्च ते॥” शान्तादि पाँच रसोंके भेदकी विचित्रता :— अर्थात् “व्यभिचारी भावसमूह तैंतीस होते हैं। वे शान्तादि रसेर ‘योग’, ‘वियोग’—दुइ भेद। विशेषतः प्रधानरूपमें स्थायी-भावोंके प्रति विचरण करते सख्य-वात्सल्ये योगादिर अनेक विभेद॥ 52 ॥ हैं। वाक्य, अङ्ग (भ्रू-नेत्रादि) और सत्त्वसे उत्पन्न अनुभावके द्वारा व्यभिचारी भावसमूह भावकी गतिका अनुवाद—शान्तादि रसोंके दो भेद हैं—'योग' और सञ्चार करते हैं, इसलिये उन्हें 'सञ्चारी' कहा जाता 'वियोग'। सख्य और वात्सल्य रसमें योग-वियोगके है। ये स्थायी-भावरूपी अमृत-सागरमें निमग्न होकर अनेक भेद हैं॥ 52 ॥ तरङ्गकी भाँति उसे वर्द्धित कराके स्थायी-भावरूपताको अनुभाष्य—(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी 41 प्राप्त करते हैं॥”48॥ श्लोक)— पाँच प्रकारके रसोंका वर्णन :— “अयोगयोगावेतस्य प्रभेदौ कथितावुभौ” पञ्चविध रस—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य। अर्थात् “इस प्रीतिभक्तिरसके ‘अयोग और योग’—ये मधुर-रस शृङ्गार-भावेते प्राबल्य॥ 49 ॥ दो भेद कहे गये हैं।” अनुवाद—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और ‘अयोग’— मधुर—ये पाँच प्रकारके रस हैं। इन सबमेंसे शृङ्गारभाव “सङ्गाभावो हरेर्धीरेरयोग इति कथ्यते। ही प्रबल है॥ 49 ॥ अयोगे तन्मनस्कत्वं तद्गुणाद्यनुसन्धयः। 'प्रेम' तक शान्तरसके और 'राग' तत्प्राप्त्युपायचिन्ताद्याः सर्वेषां कथिताः क्रियाः॥” तक दास्यरसकी सीमा :— अर्थात् “पण्डितगण भगवान्के साथ सङ्गके अभावको शान्तरसे शान्ति-रति ‘प्रेम’ पर्यन्त हय। ‘अयोग’ कहते हैं। अयोगमें हरिमनस्कता अर्थात् हरिमें दास्य-रति ‘राग’ पर्यन्त क्रमेते बाड़य॥ 50 ॥ मनका समर्पण और हरिके गुणों आदिका अनुसन्धान ‘अनुराग’ तक सख्य और वात्सल्यकी सीमा; उनमेंसे किया जाता है। श्रीकृष्ण प्राप्तिके उपायका चिन्तनादि सुबलादि प्रियनर्म सखाओंकी भी ‘भाव’ तक सीमा :— दासादि सभी भक्तोंकी क्रिया कही जाती है।” सख्य-वात्सल्य-रति पाय ‘अनुराग’-सीमा। ‘योग’— सुबलाद्येर ‘भाव’ पर्यन्त प्रेमेर महिमा॥ 51 ॥ “कृष्णेन सङ्गमो यस्तु स योग इति कीर्त्त्यते” 388 ।