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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1838, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1838

[ 23/64–72 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ]


[बायाँ स्तम्भ]

श्रीराधिकाके आठ विशेषण :— बृहद्-गौतमीय तन्त्र-वाक्य— देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता। सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा ॥ 64 ॥

**अनुवाद—**श्रीराधा 'देवी', 'साक्षात्कृष्णमयी', 'राधिका', 'परदेवता', 'सर्वलक्ष्मीमयी', 'सर्वकान्ति', 'कृष्णसम्मोहिनी' और 'पराशक्ति' नामसे कही गयी हैं॥64॥

**अनुभाष्य—**आदिलीला 4/83 संख्या देखें ॥ 64 ॥

श्रीकृष्णके असंख्य सद्गुणोंमेंसे चौंसठ प्रधान गुण :— अनन्त कृष्णेर गुण, चौषष्टि—प्रधान। एक एक गुण शुनि' जुड़ाय भक्त-काण ॥ 65 ॥

**अनुवाद—**श्रीकृष्णके अनन्त गुणोंमेंसे उनके चौंसठ प्रधान गुण हैं। उन असंख्य गुणोंमेंसे एक-एक गुणके विषयमें सुनकर भक्तोंके कान तृप्त होते हैं॥65॥

चौंसठ गुणोंकी तालिका; पहले पचास गुणोंका वर्णन :— भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/23-29)— अयं नेता सुरम्याङ्गः सर्वसल्लक्षणान्वितः। रुचिरस्तेजसा युक्तो बलीयान् वयसान्वितः ॥ 66 ॥ विविधाद्भुतभाषावित् सत्यवाक्यः प्रियंवदः। वावदूकः सुपाण्डित्यो बुद्धिमान् प्रतिभान्वितः ॥ 67 ॥ विदग्धश्चतुरो दक्षः कृतज्ञः सुदृढ़व्रतः। देशकाल-सुपात्रज्ञः शास्त्रचक्षुः शुचिर्वशी ॥ 68 ॥ स्थिरो दान्तः क्षमाशीलो गम्भीरो धृतिमान् समः। वदान्यो धार्मिकः शूरः करुणो मान्यमानकृत् ॥ 69 ॥ दक्षिणो विनयी ह्रीमान् शरणागतपालकः। सुखी भक्तसुहृत् प्रेमवश्यः सर्वशुभङ्करः ॥ 70 ॥ प्रतापी कीर्त्तिमान् रक्तलोकः साधुसमाश्रयः। नारीगण-मनोहारी सर्वाराध्यः समृद्धिमान् ॥ 71 ॥ वरीयानीश्वरश्चेति गुणास्तस्यानुकीर्त्तिताः॥ समुद्रा इव पञ्चाशद्दुर्विगाहा हरेरमी ॥ 72 ॥


[दायाँ स्तम्भ]

**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 66-72 ॥

**अमृतप्रवाह भाष्य—**ये नायकरूपी श्रीकृष्ण—1) परम रमणीय अङ्गोंसे युक्त, 2) सब प्रकारके सुलक्षणोंसे युक्त, 3) सुन्दर, 4) महातेजवान्, 5) बलवान्, 6) किशोर अवस्थासे युक्त, 7) विविध अद्भुत भाषाओंको जाननेवाले, 8) सत्यवचन, 9) प्रियवचनोंसे युक्त, 10) वाक्पटु (बात करनेमें निपुण), 11) सुपाण्डित, 12) बुद्धिमान्, 13) प्रतिभायुक्त, 14) विदग्ध (निपुण), 15) चतुर, 16) दक्ष, 17) कृतज्ञ, 18) सुदृढ़व्रत, 19) देश-काल और पात्रको जाननेवाले, 20) शास्त्र दृष्टियुक्त, 21) शुचि (पवित्र), 22) स्वयंको वशमें रखनेवाले, 23) स्थिर, 24) दमनशील, 25) क्षमाशील, 26) गम्भीर, 27) धृतिमान्, 28) समसौम्यचरित्र, 29) वदान्य, 30) धार्मिक, 31) शूर, 32) करुण, 33) मान देनेवाले, 34) दक्षिण, 35) विनयी, 36) लज्जायुक्त, 37) शरणागतपालक, 38) सुखी, 39) भक्तबन्धु, 40) प्रेमवश्य, 41) सर्वशुभकारी, 42) प्रतापी, 43) कीर्त्तिमान्, 44) लोकानुरक्त, 45) साधुओंके समाश्रय, 46) नारीके मनका हरण करनेवाले, 47) सर्वाराध्य, 48) समृद्धिमान्, 49) श्रेष्ठ और 50) ऐश्वर्ययुक्त—इन पचास गुणोंसे युक्त हैं॥66-72॥

अनुभाष्य— अयं नेता (नायकः कृष्णः) सुरम्याङ्गः (परम-रमणीयाङ्ग-सन्निवेशयुक्तः) सर्वसल्लक्षणान्वितः (सामुद्रिक-शास्त्रोक्त-गुणोत्थद्वात्रिंशच्छुभचिह्नयुक्तः अङ्गोत्थषोडशरेखासमन्वितश्च) रुचिरः (लोचनानन्दिसौन्दर्यविशिष्टः) तेजसायुक्तः (तेजस्वी,) बलीयान् (बली), वयसान्वितः (नित्यकिशोरवयः) विविधाद्भुतभाषावित् (नानापूर्व-भावभाषाकुशलः) सत्यवाक्यः (ऋतगीः), प्रियम्वदः, वावदूकः (श्रुतिमधुररसालङ्कारादियुक्तवचन-प्रयोगक्षमः), सुपाण्डित्यः (अप्राकृतविद्यानिपुणः) प्रतिभान्वितः (नवनवप्रकाश-शालिनीबुद्धियुक्तः), विदग्धः (कलाविलासकुशलः), चतुरः (धीमान्), दक्षः (निपुणः), कृतज्ञः (भक्तप्रेमप्रतिदानकारी), सुदृढ़व्रतः (सत्यसन्धः), देशकालसुपात्रज्ञः (देशकालपात्रवित्), शास्त्रचक्षुः (वेददृक्), शुचिः, वशी (आत्मवशः), स्थिरः (अचलः आफलोदयकर्मकृत्), दान्तः (क्लेशसहिष्णुः), क्षमाशीलः


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