श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1839, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेइसवाँ अध्याय 23/66-75 ] (पराधसहिष्णुः), गम्भीरः, धृतिमान् (अवरुद्धसौरतः, जितेन्द्रियः), पचास गुण बूँद-बूँदरूपमें सभी जीवोंमें विद्यमान :- समः (रागद्वेषविहीनः), वदान्यः (उदारः), धार्मिकः, शूरः भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/30)— (समरे उत्साहान्वितः), करुणः (दयालु), मान्यमानकृत् जीवष्वेते वसन्तोऽपि बिन्दुबिन्दुतया क्वचित्। (माननीयजनेषु पूजकः), दक्षिणः (सरलोदारः), विनयी (अमानी), परिपूर्णतया भान्ति तत्रैव पुरुषोत्तमे॥73॥ ह्रीमान् (आत्मप्रशंसायां लज्जाशीलः), शरणागतपालकः (प्रपन्नरक्षकः), सुखी (नित्यामोदी), भक्तसुहृत् (सेवकबन्धुः), अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥73॥ प्रेमवश्यः (प्रेमबाध्यः), सर्वशुभङ्करः (सर्वेषां हितकारी), प्रतापी अमृतप्रवाह भाष्य—ये पचास गुण बिन्दु-बिन्दुरूपमें (प्रभावशाली), कीर्त्तिमान् (सुभद्रश्रवाः), लोक-रक्तः सभी जीवोंमें हैं, किन्तु परिपूर्ण-समुद्ररूपमें पुरुषोत्तम (लोकानुरागभाक्), साधुसमाश्रयः (जगति सज्जनपक्षाश्रितः), श्रीकृष्णमें विद्यमान हैं॥73॥ नारीगणमनोहारी (भुवनमनोमोहनः), सर्वाराध्यः (सर्वेश्वरः), समृद्धिमान् (वैभवशाली), वरीयान् (श्रेष्ठः), ईश्वरः (प्रभुः) च-इति अमी अनुभाष्य— पञ्चाशत् गुणाः समुद्राः (पाररहिताः सिन्धवः) इव दुर्विगाहाः एते गुणाः बिन्दुबिन्दुतया क्वचित् जीवेषु वसन्तः अपि (सम्यक् ज्ञातुम अशक्याः अगाधाः इत्यर्थः)। तत्रैव पुरुषोत्तमे परिपूर्णतया भान्ति। श्लोक-भावानुवाद—ये नायकरूपी श्रीकृष्ण—परमरमणीय श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥73॥ अङ्गोंसे युक्त, सामुद्रिक-शास्त्रमें कहे गये गुणोंसे उत्पन्न और भी पाँच अधिक गुणोंका वर्णन; बत्तीस शुभ चिह्नोंसे और अङ्गोंसे उत्पन्न सोलह रुद्रादि श्रेष्ठ-जीवोंमें ये पचपन गुण आंशिकरूपमें रेखाओंसे युक्त, नेत्रोंको आनन्द देनेवाले सौन्दर्यसे युक्त, और विष्णुमें पूर्णरूपमें नित्य विद्यमान :- तेजस्वी, बलवान्, नित्यकिशोर अवस्थाके, नाना अपूर्व भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/37-38)— भाव-भाषामें कुशल, सत्यवचन, प्रिय वचन कहनेवाले, अथ पञ्चगुणा ये स्युरंशेन गिरिशादिषु। सुननेमें मधुर रस-अलङ्कारादियुक्त वचनोंके प्रयोग करनेमें सदा स्वरूपसम्प्राप्तः सर्वज्ञो नित्यनूतनः ॥74॥ सक्षम, अप्राकृतविद्यामें निपुण, नव-नव प्रकाशशालिनी सच्चिदानन्दसान्द्राङ्गश्चिदानन्दघनाकृतिः। बुद्धिसे युक्त, कलाविलासमें कुशल, चतुर, निपुण, भक्तके प्रेमके प्रतिदानकारी, सुदृढ़व्रत, देश-काल-पात्रको स्ववशाखिलसिद्धिः स्यात् सर्वसिद्धिनिषेवितः ॥75॥ जाननेवाले, वेद-शास्त्रोंके पूर्ण ज्ञाता, पवित्र, आत्मवशकारी, अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥74-75॥ फलोदय होने तक कर्म करनेमें अटल, क्लेश सहनेमें अमृतप्रवाह भाष्य—उपरोक्त पचास गुणोंके ऊपर सहिष्णु, दूसरोंके अपराधके प्रति सहनशील, गम्भीर, और भी पाँच महागुण परिपूर्ण मात्रामें श्रीकृष्णमें जितेन्द्रिय, रागद्वेषविहीन, उदार, धार्मिक, युद्धमें उत्साहयुक्त, (विष्णुमें) और आंशिक रूपमें शिवादि-देवताओंमें दयालु, माननीयजनोंके पूजक, सरल और उदार, अपने विद्यमान हैं—(1) सदैव स्वरूपमें स्थित, (2) सर्वज्ञ, मानकी इच्छा नहीं करनेवाले, आत्मप्रशंसामें लज्जाशील, (3) नित्य-नवीन, (4) सच्चिदानन्दघनीभूतस्वरूप, शरणागतपालक, नित्य-आमोदी, सेवकबन्धु, प्रेमके वशीभूत, (5) समस्त प्रकारकी सिद्धियोंको वशमें रखनेवाले, सबके हितकारी, प्रभावशाली, कीर्तिमान्, लोगोंके अनुरागके इसलिये सभी सिद्धियोंके द्वारा भलीभाँति सेवित॥74-75॥ पात्र, साधुजनोंके आश्रय, त्रिभुवनके मनको मोहन करनेवाले, सर्वेश्वर, वैभवशाली, श्रेष्ठ, और प्रभु हैं। अनुभाष्य— उनके ये पचास गुण अपार सिन्धुके समान हैं जिन्हें अथ गिरिशादिषु (शिवादिषु) ये पञ्चगुणाः अंशेन (अपूर्णभावेन) सम्पूर्ण रूपसे जाननेमें कोई भी सक्षम नहीं है-यह स्युः (वर्त्तन्ते, ते उच्यन्ते);-सदास्वरूप-सम्प्राप्तः (मायया अर्थ है॥66-72॥ अनभिभाव्यानुभूतिविशिष्टः), सर्वज्ञः (अभिज्ञः, भूतभविष्यद्वर्त्तमानेति । 393