भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1840, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1840

[ 23/74-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला त्रिकालज्ञः), नित्यनूतनः (स्वमाधुरीभिः अननुभूतः इव नवनवायमानः), सच्चिदानन्दसान्द्राङ्गश्चिदानन्दघनाकृतिः (घन- सच्चिदानन्दविग्रहाकारः) सर्वसिद्धिनिषेवितः (सर्वैः प्राप्यफलैरर्चित- चरणः) स्ववशाखिलसिद्धिः स्यात् [पाठान्तरे, स्ववशेत्यादि- शेषद्विचरणयोरभावः]। श्लोक-भावानुवाद—[श्रीकृष्णमें (विष्णुमें) परिपूर्ण मात्रामें] अन्य पाँच महागुण आंशिक रूपमें शिवादि-देवताओंमें विद्यमान हैं—(1) मायाकार्यके वशीभूत नहीं हैं, (2) सर्वज्ञ अर्थात् भूत-वर्तमान-भविष्य-तीनों कालोंको जाननेवाले, (3) नित्य-नवीन अर्थात् जो अननुभूतके समान अपनी माधुरीके द्वारा चमत्कारिता सम्पादन करते हैं, (4) सच्चिदानन्दघनीभूतस्वरूप, (5) समस्त प्रकारकी सिद्धियाँ जिनकी सदा सेवा करती हैं, इसलिये वे समस्त सिद्धियोंको वशमें रखनेवाले हैं। [पाठान्तरमें—श्लोकमें स्ववशादि दो चरण नहीं हैं] ॥ 74-75 ॥ श्रीनारायणमें और भी पाँच अधिक गुण अर्थात् साठ गुण परिपूर्ण रूपमें अवस्थित :— भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/39-40)— अथोच्यन्ते गुणाः पञ्च ये लक्ष्मिशादि-वर्त्तिनः। अविचिन्त्यमहाशक्तिः कोटिब्रह्माण्डविग्रहः॥ 76 ॥ अवतारावलीबीजं हतारिगतिदायकः। आत्मारामगणाकर्षीत्यमी कृष्णे किलाद्भुताः॥ 77 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 76-77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—परव्योमनाथ श्रीनारायणादिमें और भी पाँच गुण विद्यमान हैं। वे श्रीकृष्णमें भी परिपूर्ण मात्रामें रहते हैं, किन्तु शिवादि देवताओं अथवा जीवोंमें नहीं हैं। (1) असीम महाशक्तिशाली, (2) करोड़ों ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त विग्रहवाले, (3) सब अवतारोंके बीज स्वरूप, (4) मारे गये शत्रुओंको भी सुगति प्रदान करनेवाले, (5) आत्मारामजनोंको (ब्रह्मभूत मुक्त परमहंसजनोंको) भी आकर्षित करनेवाले—ये पाँच गुण श्रीनारायणादिमें होनेपर भी श्रीकृष्णमें अद्भुतरूपमें विराजमान हैं॥ 76-77 ॥ अनुभाष्य— अथ लक्ष्मिशादिवर्त्तिनः (लक्ष्मीपति-नारायणादि-विग्रहे वर्त्तमानाः) ये पञ्चगुणाः, ते उच्यन्ते—अविचिन्त्य-महाशक्तिः (अपरिमेय-महाशक्तिशाली), कोटिब्रह्माण्डविग्रहः (कोटिब्रह्माण्ड- व्यापी विग्रहो यस्य सः), अवतारावलीबीजं (निखिलावतार-कारणं), हतारिगतिदायकः (निहतशत्रूणामपि मुक्तिदाता), आत्मारामगणाकर्षी (ब्रह्मभूतमुक्तपरमहंसानामपि आकर्षकः) इति अमी (गुणाः) कृष्णे अद्भुताः किल। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 76-77 ॥ स्वयं श्रीकृष्णमें श्रीनारायणकी अपेक्षा और भी चार निजी अधिक गुण अर्थात् कुल चौंसठ गुण परिपूर्णमात्रामें नित्य-विद्यमान :— भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/41-44)— सर्वाद्भुतचमत्कार-लीलाकल्लोलवारिधिः। अतुल्यमधुरप्रेम-मण्डितप्रियमण्डलः॥ 78 ॥ त्रिजगन्मानसाकर्षि-मुरलीकलकूजितः। असमानोर्ध्वरूपश्री-विस्मापितचराचरः॥ 79 ॥ लीला-प्रेम्णा प्रियाधिक्यं माधुर्यं वेणुरूपयोः। इत्यसाधारणं प्रोक्तं गोविन्दस्य चतुष्टयम्। एवं गुणाश्चतुर्भेदाश्चतुःषष्टिरुदाहृताः॥ 80 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78-80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इन साठ गुणोंके अतिरिक्त और भी चार गुण श्रीकृष्णमें प्रकाशित है; वे श्रीनारायणमें भी प्रकाशित नहीं हैं—(1) सभी लोगोंको चमत्कृत कर देनेवाली लीलाओंका कल्लोल-समुद्र, (2) शृङ्गाररसके अतुलनीय प्रेमकी शोभासे युक्त प्रियाओंके द्वारा सदा परिवेष्टित, (3) [गोलोक, परव्योम और देवीधाम, इन] तीनों लोकोंके चित्तको आकर्षित करनेवाली मुरलीके गीतका गान करनेवाले, (4) जिनके समान और जिनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है और जो चराचरको अपने सौन्दर्यसे विस्मित करते हैं। इस प्रकारकी (प्रेममयी) लीला, अति उत्कृष्ट प्रियाका सङ्ग (अर्थात् प्रेमिक-प्रियजनोंके प्रति वात्सल्य), रूपमाधुर्य और वेणुमाधुर्य—ये चार श्रीकृष्णके 394 ।