श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1843, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेइसवाँ अध्याय 23/90-99 ] अनुभावाध्वनि (अनुभव-मार्गे) कृष्णादिभिः विभावाद्यैः गतैः रस्यतां (रसत्वं) नीयमाना परां प्रौढ़ानन्दचमत्कारकाष्ठां (सान्द्रानन्दपराकाष्ठाम्) आपद्यते (प्राप्नोति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 90-93॥ यह चिन्मय अप्राकृत रसास्वादन-अद्वयज्ञान-श्रीकृष्णसे युक्त मुक्त श्रीकृष्ण-भक्तोंके लिये ही सम्भव, जड़ीय कुरसिकोंके पक्षमें असम्भव :- एइ रस आस्वाद नाहि अभक्तेर गणे। कृष्णभक्तगण करे रस आस्वादने॥ 94॥ अनुवाद—इन रसोंका आस्वादन अभक्तगण नहीं कर सकते, केवल श्रीकृष्णके शुद्धभक्त ही इन रसोंका आस्वादन करते हैं॥ 94॥ शास्त्रप्रमाण :- भक्तिरसामृतसिन्धु (2/5/131)— सर्वथैव दुरूहोऽयमभक्तैर्भगवद्रसः। तत्पादाम्बुजसर्वस्वैर्भक्तैरेवानुरस्यते॥ 95॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 95॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अभक्तोंके लिये यह भगवद्-रस सब प्रकारसे दुर्लभ है, श्रीकृष्ण-चरणकमल ही जिनके सर्वस्व हैं, भक्तिरस—उन्हींको ही प्राप्त होता है॥ 95॥ अनुभाष्य— अभक्तैः (भुक्तिमुक्तिपिपासुभिः हरिविमुखैः जनैः) अयं भगवद्रसः सर्वथा एव दुरूहः (दुर्लभः), किन्तु तत्पादाम्बुजसर्वस्वैः (ऐकान्तिकभक्तैः) एव अनुरुस्यते (आस्वाद्यः स्यात्)। श्लोक-भावानुवाद—भुक्ति-मुक्ति-पिपासु हरिविमुख- जनोंके लिये यह भगवद्-रस सर्वथा दुर्लभ है, किन्तु श्रीकृष्णके ऐकान्तिक भक्त ही उसका आस्वादन करते हैं॥ 95॥ प्रयोजन-तत्त्व-विचार संक्षेपमें वर्णित :- संक्षेपे कहिलुँ एइ 'प्रयोजन'-विवरण। पञ्चम-पुरुषार्थ—एइ 'कृष्णप्रेम' महाधन॥ 96॥ अनुवाद—मैंने 'प्रयोजन' तत्त्वका संक्षेपमें वर्णन किया है। श्रीकृष्ण प्रेमरूपी महाधन ही पञ्चम-पुरुषार्थ है॥ 96॥ पहले प्रयागमें दशाश्वमेध घाटपर श्रीरूपको श्रीकृष्णरसकी शिक्षा-प्रदान :- पूर्वे प्रयागे आमि रसेर विचारे। तोमार भाइ रूपे कैलुँ शक्तिसञ्चारे॥ 97॥ अनुवाद—मैंने कुछ समय पूर्व प्रयागमें तुम्हारे भाई रूपमें शक्तिका सञ्चार करके उसे रस-तत्त्वके विचारका श्रवण कराया था॥ 97॥ महाप्रभुके द्वारा वैष्णवाचार्य श्रीसनातनको आचार्योचित चार साम्प्रदायिक सेवाओंका दायित्व देना :- तुमिह करिह भक्तिशास्त्रेर प्रचार। मथुराय लुप्ततीर्थेर करिह उद्धार॥ 98॥ वृन्दावने कृष्णसेवा, वैष्णव-आचार। भक्तिस्मृतिशास्त्र करि' करिह प्रचार॥ "99॥ अनुवाद—तुम भी भक्ति-शास्त्रोंका प्रचार करना और मथुरामें लुप्त-तीर्थोंका उद्धार करना। वृन्दावनमें श्रीकृष्णकी सेवाको प्रकाशित करना और वैष्णव-आचार और भक्तिमूलक स्मृतिशास्त्रोंके द्वारा वैष्णवोंके लिये उचित आचरणका प्रचार करना॥ "98-99॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भक्ति-स्मृतिशास्त्र'— 'हरिभक्तिविलास'-ग्रन्थ॥ 99॥ अनुभाष्य—'भक्तिशास्त्रेर प्रचार'—श्रीदशम-स्कन्धकी टिप्पणी 'बृहद्-वैष्णवतोषणी' और बृहद्भागवतामृतादि ग्रन्थ प्रकाश करके (1) शुद्धभक्तिके सिद्धान्तका संस्थापन, (2) लुप्त तीर्थोंका उद्धार—वृन्दावनके कुण्डादि और अन्यअन्य स्थानोंका निरूपण, (3) वृन्दावनमें श्रीकृष्णसेवा— श्रीमूर्तिको प्रकट करके सेवाका प्रकाश, (4) वैष्णव- आचार—वैष्णव-स्मृतिग्रन्थका सङ्कलन करके वैष्णव- सदाचारका प्रवर्तन और प्रचार एवं वैष्णव-समाजमें । 397