भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1842

अभिज्ञा), विनीता (नम्रा), करुणापूर्णा (स्वाश्रित गोपी-दुःखसहने असमर्था, परम-दयामयी), विदग्धा (रतिकलाभिज्ञा) पाटवान्विता (कर्त्तव्य-कुशला), लज्जाशीला (स्वप्रशंसायां वीतस्पृहा), सुमर्यादा (कृष्ण-गौरविणी), धैर्या (धीरा) गाम्भीर्यशालिनी (अचञ्चला), सुविलासा (लीलामयी), महाभावपरमोत्कर्षतर्षिणी (महाभावस्य परमोत्कर्षविषये तृष्णान्विता), गोकुलप्रेमवसतिः (गोकुलवासिनां प्रेमास्पदं), जगच्छ्र लसन्ति यशांसि यस्याः सा), गुर्वर्पित-गुरुस्नेहा (गुरुजनानामधिक- स्नेह पात्री), सखीप्रणयितावशा (सखीनां प्रणयितस्य प्रणयभावस्य वशा वशीभूता), कृष्णप्रियावली-मुख्या (कृष्णप्रेष्ठा), सन्तताश्रवकेशवा (सन्ततं अविरतम् आश्रवः वशंवदः केशवः यस्याः सा)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 82-86 ॥

दो प्रकारके आलम्बन—(1) एकमात्र ‘विषय’ श्रीकृष्ण और (2) बहुत प्रकारके ‘आश्रय’, उनमेंसे श्रीराधाकी सर्वश्रेष्ठता :— नायक-नायिका,—दुइ रसेर ‘आलम्बन’। सेइ दुइ श्रेष्ठ,—राधा, व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 87 ॥

अनुवाद—नायक और नायिका,—ये दोनों रसके आलम्बन हैं। श्रीराधा और श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही सर्वश्रेष्ठ नायिका और नायक हैं॥ 87 ॥

शान्तके अतिरिक्त अन्य सेवकोंकी चार प्रकारके रसोंमें श्रीकृष्णसेवाका वर्णन :— एइमत दास्ये दास, सख्ये सखागण। वात्सल्ये माता पिता आश्रयालम्बन ॥ 88 ॥ एइ रस अनुभावे यैछे भक्त-गण। यैछे रस हय, शुन ताहार लक्षण ॥ 89 ॥

अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 88-89 ॥ अनुभाष्य—जिस प्रकार व्रजेन्द्रनन्दन और वृषभानु- कुमारी मधुर-रसमें दो श्रेष्ठ आलम्बन हैं, उसी प्रकार दास्यरसमें व्रजेन्द्रनन्दन और चित्रक, रक्तक, पत्रक आदि एवं सख्यरसमें व्रजेन्द्रनन्दन और श्रीदाम, सुदाम, सुबलादि सखा और वात्सल्यरसमें व्रजेन्द्रनन्दन और नन्द-यशोदादि ही श्रेष्ठ ‘आलम्बन’ हैं॥ 88-89 ॥

भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/7-10)— भक्तिनिर्धूत-दोषाणां प्रसन्नोज्ज्वलचेतसाम्। श्रीभागवतरक्तानां रसिकासङ्गरङ्गिणाम् ॥ 90 ॥ जीवनीभूत-गोविन्दपादभक्तिसुखाश्रियाम्। प्रेमान्तरङ्गभूतानि कृत्यान्येवानुतिष्ठताम् ॥ 91 ॥ भक्तानां हृदि राजन्ती संस्कारयुग्लोज्ज्वला। रतिरानन्दरूपैव नीयमाना तु रस्यताम् ॥ 92 ॥ कृष्णादिभिर्विभावाद्यैर्गतैरनुभवाध्वनि। प्रौढानन्दचमत्कारकाष्ठामपद्यते पराम् ॥ 93 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 90-93 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो भक्तिके द्वारा सम्पूर्णरूपसे धोये गये दोषोंसे मुक्त, प्रसन्न और उज्ज्वलचित्त, श्रीभागवतमें अनुरक्त, रसिकोंके सङ्गमें रङ्गयुक्त (आनन्दित), श्रीगोविन्दचरणोंकी भक्तिसुखश्री ही जिनका जीवनस्वरूप है, प्रेमके अन्तरङ्ग सभी कार्योंका अनुष्ठान करनेवाले उन भक्तोंके हृदयमें प्राचीन और आधुनिक संस्कारोंके द्वारा उज्ज्वला आनन्दरूपी रति रसता प्राप्त करके विराजमान होती है। वह श्रीकृष्णादि विभावादिके द्वारा अनुभवके पथपर प्रौढ़ानन्द-चमत्काररूपी पराकाष्ठाको प्राप्त होती है॥ 90-93 ॥

अनुभाष्य— भक्तिनिर्धूतदोषाणां (भक्त्या निर्धूताः क्षालिताः दोषाः येषां) प्रसन्नोज्ज्वलचेतसां (प्रसन्नम् उज्ज्वलं चेतः येषां) श्रीभागवतरक्तानां (श्रीभागवतार्थानां आस्वादने अनुरक्तानां) रसिकासङ्गरङ्गिणां (रसिकैः सह रसास्वादन-तत्पराणां) जीवनीभूत- गोविन्दपादभक्तिसुखश्रिया (जीवनीभूता गोविन्दपाद-भक्तिसुखश्रीः कृष्णसेवामुखसम्पत्तिः येषां) प्रेमान्तरङ्गभूतानि (प्रेम्णः अन्तरङ्ग- भूतानि) कृत्यानि (अनुष्ठानादीनि) अनुतिष्ठतां भक्तानां हृदि संस्कारयुग्लोज्ज्वला आनन्दरूपा रतिः एव राजन्ती। तु