श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1851, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेइसवाँ अध्याय 23/111-113 ] सफेद-काले केशोंका होना यह विष्णुकी शोभास्वरूप ही है, आयुका कोई परिणाम नहीं है। ‘भारहरण-रूप कार्यकी बात ही क्या, वह तो मेरे दो केश भी करनेमें समर्थ हैं’– इस बातको प्रकाश करते हुए और उसके साथ श्रीबलरामके और श्रीकृष्णके वर्णकी सूचना करते हुए उन्होंने उक्त केशोंको तोड़ा था, ऐसा जानना होगा। अन्यथा शास्त्रमें कहे गये पूर्व और बादके वाक्योंका परस्परमें विरोध उपस्थित होता है एवं ‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’– इस वाक्यसे भी विरोध होता है। इसलिये ‘सितकृष्णकेश’ (अर्थात् उज्ज्वलकृष्णकेश)– स्वयं भगवान् ही हैं, वे अपने अंश श्रीबलरामके साथ जन्म ग्रहण करते हैं। श्रीलघुभागवतामृतमें श्रीरूपगोस्वामि-कृत व्याख्या,– ‘कलया सितकृष्णकेशः’ (भाः 2/7/26) ‘कलया’ अर्थात् शिल्पमें विशेष निपुणताके द्वारा ‘सित’– बद्ध जो ‘कृष्णकेश’ हैं अर्थात् अति सुन्दर श्यामवर्ण केशयुक्त जो विग्रह वे ही श्रीकृष्ण हैं,–उनकी विशेष वैदग्धीके कारण इस प्रकारसे कहा गया है। अथवा जो ‘कलया’ अर्थात् एक अंश रूपमें ‘सितकृष्णकेशः’ अर्थात् श्वेतकृष्णकेश युक्त क्षीरोदकशायी विष्णु हैं, वे लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही यदुवंशमें आविर्भूत हुए हैं। सन्दर्भमें श्रील जीवगोस्वामि-कृत व्याख्या,– “अंशवो ये प्रकाशन्ते मम ते केशसंज्ञिता। सर्वज्ञाः केशवं तस्मान्नामाहुर्मुनिसत्तम॥” अर्थात् “हे मुनिश्रेष्ठतम! मेरा जो अंशसमूह (ज्योतिसमूह) प्रकाशित हो रहा है उसको ‘केश’–नामसे कहते हैं। इसलिये सर्वज्ञगण मुझको ‘केशव’ कहते हैं–इस महाभारत-वाक्यके अनुसार मेरे (अर्थात् क्षीरोकशायी विष्णुके) सिरपर धारण किये श्वेत और कृष्णवर्णकी दो ज्योतिरूप दो प्रभु अवतरित होंगे’, इसकी सूचना देनेके लिये ही (विष्णुपुराणमें) दो केशोंकी बात कही गयी है।” और भी विष्णुपुराण, महाभारतमें सब जगह ‘केश’-शब्दका ही मात्र प्रयोग दिखायी देता है, किन्तु उसके समानार्थक ‘चिकुर’, ‘कुन्तल’ आदि किसी शब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता। इसलिये (भाः 11/21/35)– “परोक्षवादा ऋषयः परोक्षञ्च मम प्रियः” अर्थात् “ऋषिगण परोक्षवादी हैं और परोक्ष ही मुझे (श्रीकृष्णको) प्रिय हैं”–इस प्रकारसे भगवान्की इच्छानुसार परोक्षवादी ऋषियोंके मनोभावको ही उन-उन वाक्योंमें समझना होगा, उनके वाक्योंका बाह्य अर्थ नहीं लेने होंगे आदि।’– (श्रीविश्वनाथ) ‘महिषीहरण’–(भाः 1/15/20)– “अध्वन्युरुक्रमपरिग्रहमङ्ग रक्षन् गोपैरसद्भिरबलेव विनिर्जितोऽस्मि॥” श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेके बाद द्वारकापुरीसे वापिस लौटे श्रीअर्जुन महाराज श्रीयुधिष्ठिरको श्रीकृष्णके विरहमें अनेक प्रकारसे विलाप करते करते कहने लगे,–“श्रीकृष्णविहीन होकर मैं इस प्रकार बलहीन हो गया हूँ कि उनकी (आठ प्रधान महिषियोंके अतिरिक्त अन्य) सोलह हजार स्त्रियोंकी रक्षा करते हुए जब मैं आ रहा था, तब मार्गमें कुछ नीच गोपोंके द्वारा मैं अबलाकी भाँति पराजित हो गया।” श्रीभगवान्के जो सखा हैं, उन प्रबल-पराक्रमशाली श्रीअर्जुनके निकटसे उनके सखाकी पत्नियोंका हरण नितान्त असम्भव है। वहाँपर रहस्य यह है कि,–‘उन अपनी प्रेयसियोंको (व्रजमें) अप्रकट-प्रकाशमें प्रवेश करानेके लिये उस- उस रूपमें भगवान्ने उनका आकर्षण किया, क्योंकि उनकी इस प्रकारसे अभिलाषा थी। जैसे (महिषियोंने द्रौपदीसे कहा था), (भाः 10/83/43)– “व्रजस्त्रियो यद् वाञ्छन्ति पुलिन्द्यस्तृणवीरुधः। गावश्चारयतो गोपाः पादस्पर्शं महात्मनः॥” “जिस प्रकार गोचारणशील श्रीकृष्णकी चरणरजको व्रजरमणियोंने, गोपगणोंने और यहाँतक कि तृण-लतासे संलग्न उस चरणरजको उठाकर पुलिन्द-रमणियोंने भी प्राप्त किया था, हमें भी उसकी चाह है।” महिषियोंके इस प्रकारके वाक्योंमें व्रजस्त्रियोंके द्वारा वाञ्छित भगवद्-स्वरूप ही (अर्थात् श्रीकृष्णका गोपस्वरूप ही) है। उनके मनोरथको जानकर भगवान्ने गोपरूपमें उनका आकर्षण किया था, अन्यथा वे | 405