श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1850, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 23/111-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हुए जीवके जैसे और अमर होनेपर भी मृत जीवके जैसे अपनेको प्रदर्शन करते हैं और ऋषिगणोंको भी उसी प्रकार तात्कालिक भावोंसे मोहित करके उनके द्वारा शास्त्रोंमें मोहजनक वाक्यजालका विस्तार करके अपने आपको शुद्धभक्तिरहित जीवोंसे गोपन रखते हैं।” (भाः 11/22/4)— “युक्तञ्च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा। मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्॥” “ऋषियोंने जिसको जिस रूपमें वर्णन किया है, वह उस रूपमें सत्य है, क्योंकि मेरी (श्रीकृष्णकी) मायासे मोहित होकर व्याख्या करनेवालोंके कोई भी वाक्य असम्भव नहीं हैं।” किन्तु सुमेधागण (अति बुद्धिमान व्यक्ति) उस प्रकारके वाक्योंसे भ्रमित नहीं होते हैं, जैसा श्रीउद्धवने श्रीविदुरसे कहा, (भाः 3/2/10)— “देवस्य मायया स्पृष्टा ये चान्यदसदाश्रिताः। भ्राम्यते धीर्न तद्वाक्यैरात्मन्युपाहृतात्मनो हरौ॥” “जो भगवान्की मायासे मुग्ध हैं और अन्य जो असत्-मतावलम्बी हैं, उनके वाक्योंसे परमात्मा श्रीहरिमें जिनका चित्त निविष्ट है, ऐसे मानवोंकी बुद्धि भ्रान्त नहीं होती है।” क्योंकि वे शास्त्रयुक्तिमें सुनिपुण हैं। शास्त्रोंमें स्थान-स्थानपर शुद्ध सिद्धान्त भी प्रकाशित हैं, जैसे स्कन्दपुराणमें कहा गया है,— “पृथिवीलोकसंत्यागो देहत्यागो हरेः स्मृतः। नित्यानन्दस्वरूपत्वादत्रैवोपलभ्यते॥” “श्रीहरिके ‘देहत्याग’-शब्दसे उनके पृथ्वीलोकके त्यागको ही कहा गया है (‘यस्य पृथिवी शरीरम्’—इस श्रुतिमें ही उसका प्रमाण है), क्योंकि वे नित्यानन्दस्वरूप हैं, इसलिये उनकी अन्य प्रकारके अर्थके द्वारा उपलब्धि नहीं होती।” इस प्रसङ्गमें श्रीचैतन्यभागवतमें आदिखण्डमें १४ अध्यायमें १०४ संख्यामें श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-कृत ‘गौड़ीय-भाष्य’ भी देखें। ‘केशावतार’—(भाः 1/2/28 में)—“कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्”—इस प्रकारसे श्रीकृष्णकी स्वयं भगवत्ता प्रमाणित हुई है। तथापि (भाः 2/7/26)—“भूमः सुरेतरवरूथ” श्लोकमें “क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः” अर्थात् श्वेत और कृष्णवर्ण केशवाले श्रीक्षीरोदशायी विष्णु अंशरूपमें पृथ्वीके क्लेश नाश करनेके लिये आविर्भूत होंगे, इस रूपसे इस ब्रह्मा-वाक्यमें जो आपातरूपसे श्रीकृष्णका श्रीविष्णुके केशावतार होना दिखायी देता है, वह मायाके द्वारा भ्रान्ति उत्पादन करके श्रीकृष्णकी असमोर्ध्व-महिमाको सङ्गोपन करनेके लिये ही है। किन्तु जैसा कृष्णसन्दर्भमें कहा है,—“यैस्तु यथाश्रुतमेवेदं व्याख्यातं ते न सम्यक् परामृष्टवन्तः अर्थात् जो श्लोकको जैसे सुना है, वैसे अर्थकी व्याख्या करते हैं, वे सम्पूर्ण रूपसे विचारपरायण नहीं हैं।” जैसे, विष्णुपुराणमें कहा गया है,—‘हे महामुने ! भगवान् परमेश्वरने अपने श्वेत और कृष्ण दो केशोंको तोड़ा और देवताओंको कहा,—मेरे ये दो केश पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर पृथ्वीका भार हरण करेंगे।’ और महाभारतमें भी उसी प्रकार कहा गया है,—‘उन श्रीविष्णुने दो केशोंको तोड़ा, उनमेंसे एक श्वेत और दूसरा कृष्णवर्णका था; वे दो केश ही यदुगणके कुलमें देवकी और रोहिणी—दो स्त्रियोंमें प्रविष्ट हुए थे। उनमेंसे एक जो श्वेतवर्ण-केश हैं, वे बलदेव हुए थे और दूसरे जो श्रीकृष्णवर्ण-केश हैं, वे श्रीकेशव-‘श्रीकृष्ण’-नामसे कहे गये थे।’ उस-उस स्थानपर जो अर्थ आपात प्रकट हुए, उनपर विचार करनेपर उनमें कोई सङ्गति दिखायी नहीं देती। क्योंकि, इनके द्वारा त्रिगुणातीत, अविकारी, चिदानन्दघन-विग्रह श्रीविष्णुकी आयुके परिणामस्वरूप सफेद और काले केश होना समझना होगा। परन्तु शास्त्रमें (भाः 3/28/17)—‘सन्तं वयसि कैशोरे’ इस रूपमें उनकी नित्य किशोर अवस्था ही दिखायी देती है। और फिर (भाः 1/3/28)—“कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्”—इस रूपसे श्रीकृष्णमें स्वयं भगवत्ता ही वर्णित है। इसलिये विद्वान लोग उसकी इस प्रकारसे व्याख्या करते हैं, जैसे, श्रीधरस्वामीपाद-कृत व्याख्या,—‘सितकृष्णकेशत्व’— 404 |