भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1849, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1849

तेइसवाँ अध्याय 23/111-113 ] उसकी वृद्धि हुई है। धर्मका ऐसी प्रबलता रहनेपर कलि किस प्रकारसे अधिकार प्राप्त कर सकेगा? क्योंकि धर्मका एक पैर मात्र बचनेपर ही कलिकी अधिकार प्राप्त करनेकी योग्यता होती है, — ऐसा नियम है। (यदि कहें,) 'कारणका नाश होनेपर कार्यका भी नाश होता है, इस न्यायके अनुसार जगत्में मेरे अप्रकट होनेपर वह चार पैरवाला धर्म भी लुप्त हो जायेगा' — ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि मेरी सर्वजगत्-पावनी महाकीर्ति सब समयके लिये जागरूक होकर वर्तमान रहती है। और मेरे अनुकूल, प्रतिकूल और तटस्थ लोगोंमें-से प्रतिकूल लोगोंका मेरे द्वारा संहार हुआ है। अब श्रीरामावतारके जैसे ही सभी लोगोंके समक्ष अपने धामवासियोंके साथ वैकुण्ठमें आरोहण करनेपर अनुकूल लोग दोगुना भक्त होंगे, अति-अनुकूल लोग परम उत्कण्ठायुक्त होकर सौगुना प्रेमवान् होंगे और तटस्थ लोग परम-आश्चर्यके दर्शनसे भक्त होंगे — इसके द्वारा धर्म अपितु और भी वृद्धि प्राप्त करेगा। ऐसा होनेपर किस प्रकारसे कलिका लेशमात्र भी प्रभुत्व सम्भव होगा? इसलिये धर्मको सङ्कुचित करनेके लिये अधर्म- मतको किसी प्रकारसे ऊपर उठाऊँगा। यहाँपर यही उपाय है, — मैं अपने निजलीला-परिकरों यदुगणोंके साथ द्वारकामें पहलेके जैसे विराजमान होऊँगा, किन्तु सब प्रापञ्चिक लोगोंके नेत्रोंके लिये अदृश्य रहूँगा। इधर प्रद्युम्न, साम्बादि मेरे नित्य परिकरोंमें उनके-उनके विभूति-स्वरूप कन्दर्प (कामदेव), कार्तिकेयादि जो देवतागण प्रविष्ट हुए हैं, उनको योगबलके प्रभावसे उन-उन देहोंसे अलक्षितरूपसे पृथक् करूँगा। तभी प्रद्युम्नादि रूपमें अभिमानकारी उन देवताओंको उस समय सभी लोगोंके सामने ही उन रूपोंमें ही प्रकाशित करके अन्य द्वारकावासियोंके साथ प्रभासमें भेजकर दान-ध्यान-मधुपानादि कराऊँगा। बादमें उन-उन अधिकारिक देवताओंको स्वर्गमें उनके-उनके अधिकारमें स्थापित करूँगा और मैं अपने नित्य परिकरोंके साथ श्रीदशरथनन्द श्रीरामचन्द्रकी भाँति वैकुण्ठमें प्रस्थान करूँगा। किन्तु लोगोंके नेत्रोंमें मायाका दोष प्रवेश होनेके कारण वे इस प्रकार सोचेंगे, — ब्राह्मणके शापसे ग्रस्त यदुवंशियोंने प्रभासमें जाकर मधुपान करके मत्त होकर एक-दूसरेपर प्रहार करके देह-त्याग किया है और परमेश्वर श्रीकृष्णने भी श्रीबलदेवके साथ मनुष्य देह त्याग करके निजधाममें आरोहण किया है। इस कारणसे कोई-कोई मुझको अनित्य और मायिक मनुष्य शरीरवाला कहकर व्याख्या करेंगे। इस प्रकारसे अवज्ञा करनेपर महा अपराध होगा, क्योंकि मैंने कहा है, (गीता 9/11) — “अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषीं तनुमाश्रितम्” [“मेरे चिन्मय विग्रहको देखकर भी मूर्ख व्यक्ति सोचते हैं कि मैंने यह प्राकृत मनुष्य शरीर धारण किया है।”] अन्य कुछ लोग कहेंगे कि जिस प्रकार कुरुवंशका विनाश हुआ है, उसी प्रकारसे श्रीकृष्ण वंशसहित प्रभासमें विनाशको प्राप्त हुए हैं, — इस प्रकार अधम, ज्ञानके अभिमानी दुर्जन लोगोंके कुमत सुनने, बोलने, अनुमोदन करने और प्रचारके द्वारा धर्म तुरन्त ही एक पैरका रह जायेगा। पित्तादि दोषयुक्त नेत्र जिस प्रकार उज्ज्वल श्वेत शङ्खको भी पीला और मलिनरूपमें देखते हैं, उसी प्रकार मायादोषसे दूषित मानव मेरी सच्चिदानन्दमयी निर्याणलीलाको भी दुर्गति और प्राकृत- रूपमें ही दर्शन करेंगे और मेरी भक्तिसे दूर होंगे। केवल प्राकृत लोग ही नहीं, किन्तु मेरे अंशसे प्रकटित अर्जुनादि भी और उसी प्रकारसे वैशम्पायन, पराशरादि मुनिगण भी मेरी मायासे मोहित होकर अपनी-अपनी संहितामें (यथाक्रमसे महाभारत, विष्णुपुराणमें) उसको वर्णन करेंगे।' इत्यादि। इसलिये देखा जाता है, (ब्रह्मपुराण) — “अजात-जातवद्विष्णुरमृत-मृतवत् तथा। मायया दर्शयेन्नित्यमज्ञानां मोहनाय च॥” “भगवान् विष्णु मायाबलसे अज्ञानी व्यक्तियोंको मोहित करनेके लिये अजन्मा होनेपर भी जन्म लिये । 403

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1849, कुल 2549 में से · BharatKosha