श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1848, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 23/111-113 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'केशावतार'-(भा: 2/7/26 देखें); विष्णुपुराणमें- “उज्जहारात्मनः केशौ सितकृष्णौ महाबल” महाभारतमें- “स चापि केशौ हरिरुच्चकर्त्त एकं शुक्लमपरञ्चापि कृष्णम्। तौ चापि केशावाविशतां यदूनां कुले स्त्रियो रोहिणीं देवकीञ्च॥ तयोरेको बलभद्रो बभूवः योऽसौ श्वेतस्तस्य देवस्य केशः। कृष्णो द्वितीयः केशवः संबभूव केशः योऽसौ वर्णतः कृष्ण उक्त इति॥” अर्थात् भागवत, विष्णुपुराण और महाभारतमें केशावतारका इस प्रकार उल्लेख है, - “श्रीहरिने अपने मस्तकसे शुक्लवर्ण (सफेद) और कृष्णवर्ण (काले)-दो केशोंको तोड़ा था। दो केश यदुकुलकी स्त्रियों रोहिणी और देवकीमें प्रविष्ट होनेपर पहले सफेद केशसे वर्णके अनुसार 'बलदेव' और दूसरे काले-केशसे 'श्रीकृष्ण' उत्पन्न हुए, ऐसा कहा जाता है। असुरोंके द्वारा रौंदी हुई पृथ्वीके क्लेश नाशके लिये जो अंशके द्वारा श्वेतकृष्ण हुए, वे हरि अवतीर्ण होकर अपनी महिमा दिखलानेवाले कार्य करेंगे॥” इस स्थानपर लघुभागवतामृतमें कृष्णामृत-नामक पूर्वखण्डकी 156-164 संख्यामें “श्रीकृष्ण-क्षीरोदशायीके केशके अवतार' इस पूर्वपक्षके खण्डनके लिये श्रीरूपप्रभुके और लघुभागवतामृतके टीकाकार श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभुके विचार और षट्-सन्दर्भके अन्तर्गत कृष्णसन्दर्भकी 29 संख्या और सर्वसम्वादिनीमें श्रीजीवप्रभुके विचार आलोच्य हैं॥112-113॥ तेइसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। अमृताणुकणा- 'मौषललीला, आर कृष्ण-अन्तर्धान'- मूसललीला और श्रीकृष्णके देह-त्यागादिकी लीला जो इन्द्रजालके समान भगवद्-मायाबलसे रचित है, यह बात भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने स्वयं ही अपने सारथी दारुकको बतलायी, (भा: 11/30/49)- “त्वं तु मद्धर्ममास्थाय ज्ञाननिष्ठ उपेक्षकः। मन्मायारचितामेतां विज्ञायोपशमं व्रज॥” अर्थात् “अभी लोगोंके प्राकृत-नेत्रोंके सामने प्रकाशित 'मूसल' और 'देहत्यागादि' समस्त लीलाएँ ही जो इन्द्रजालके समान मेरी मायाके द्वारा रचित हैं, इसे विशेषरूपसे जानकर तुम उसके प्रति उपेक्षाशील होवो।” 'तु'-शब्दसे यह कहा गया है कि मेरे विरोधी अन्य प्राकृत लोग उससे मुग्ध होते हों, तो हों, किन्तु तुम्हारा मोहित होना युक्तिसङ्गत नहीं है।'- (क्रमसन्दर्भ)। बादमें श्रीशुकदेव गोस्वामीने भी महाराज परीक्षितको यह रहस्य बतलाया। (भा: 11/31/11)- “राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा, मायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य।” अर्थात् “हे राजन्! नट अर्थात् ऐन्द्रजालिक जिस प्रकार रङ्गमञ्चपर सबके सामने काटने, जलाने, मूर्च्छा आदिके द्वारा अपने शरीरको त्याग करना दिखाकर सबका विश्वास उत्पन्न करता है, परन्तु नटका अपना देह धारण ही जैसे सत्य है और उसका अपना देहत्याग ही मिथ्या है, उसी प्रकार परतत्त्व श्रीकृष्णकी आविर्भाव-तिरोभाव-लीलाको भी मायाका अभिनय मात्र जानना होगा। अन्यथा वे यमलोकसे गुरुपुत्रको सशरीर लेकर आये थे, ब्रह्मास्त्रसे तुम्हारी भी रक्षा की थी, मृत्युञ्जय शङ्करको संग्राममें पराजित किया था और व्याधको सशरीर स्वर्गमें भेजा था, तो वे श्रीकृष्ण क्या अपनी रक्षा करनेमें असमर्थ हैं?” मूसललीला और उसके बाद श्रीकृष्ण-अन्तर्धानादि लीलाएँ किस प्रकार मायासे रचित हैं, उसे “एते घोराः” (भा: 11/30/5)-श्लोककी टीकामें श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुरने बतलाया है,-“कुरुक्षेत्र यात्रामें मुझसे (श्रीकृष्णसे) मिलनेके लिये अनेक दिशाओंमें स्थित देशोंसे आये हुए लोगोंके बीचमें अलक्षित रूपसे 'कलि' भी आया था और उसने मुझसे कहा था,- 'प्रभो! पृथ्वीपर मेरा अधिकार कब होगा?' उसके उत्तरमें मैंने कहा था,- 'मेरी लीला-समाप्तिके बाद ही मेरे द्वारा दिये गये अधिकारको प्राप्त करके तुम (कलि) पृथ्वीपर अधिकार करोगे।' किन्तु मेरे अवतारमें अभी इस धर्म चार-पैररूपमें ही है, यहाँ तक कि सत्ययुगकी अपेक्षा भी अधिकतर 402 |