श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1847, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपर्युपरि तत्रापि गतिस्तव तपोमयी। यां न विद्मो वयं सर्वे पृच्छन्तोऽपि पितामहम् ॥ ब्राह्मे तपसि युक्तानां ब्रह्मलोकः परा गतिः। गवामेव तु गोलोको दुरारोहा हि सा गतिः ॥ सः तु लोकस्त्वया कृष्ण सीदमानः कृतात्मना। धृतो धृतिम्रता वीर निघ्नतोपद्रवान् गवाम् ॥"
अर्थात् गोवर्धन-धारणके बाद इन्द्रने श्रीकृष्णका इस प्रकारसे स्तव किया था, — “मनुष्यलोकके उच्च भागमें पक्षियोंकी गति है। आकाशके ऊपर स्वर्गका प्रकाशमान सूर्यद्वार और स्वर्गके ऊपरी भागमें ब्रह्मर्षियोंके द्वारा सेवित ब्रह्मलोक है। देवीधामके ऊपरमें स्थित उस धाममें उमाके साथ शिव वर्तमान हैं; वह तेजःसम्पन्न ब्रह्मादि मुक्तपुरुषोंका आवास-स्थान है। वैकुण्ठके ऊपर गोलोक, वहाँ श्रीमती राधिकादि और नन्द-यशोदादि साध्यगण पालन करते हैं। वैकुण्ठादि धाम-गोलोककी तुलनामें स्वल्प-आकाश मात्र हैं; गोलोक ही महा- आकाश है। हम ब्रह्मासे जिज्ञासा करके भी आपकी तपोमयी गतिरूपा सर्वोपरि गोलोकपतिकी उपलब्धि नहीं कर पाये। श्रीनारायणके दास्यसे ही वैकुण्ठ-प्राप्ति होती है; किन्तु गो-गणोंके लोक उस गोलोक तक पहुँचना अत्यन्त कठिन है। हे कृष्ण, उसी गोलोकके साथ आप यहाँ अवतीर्ण हुए हो और मैंने जो उपद्रव किया है, वह मेरी मूर्खताका ही परिणाम है, उसीको मैं स्तवके द्वारा बतला रहा हूँ।"
इस स्थानपर नीलकण्ठने अपनी टीकामें लिखा है,— “तथा च मन्त्रवर्णः (ऋक् सं 1/21/154/6)- “ता वां वास्तुन्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः। अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि” इति। तानि वां युवयोः रामकृष्णयोर्वास्तूनि रम्यस्थानानि गमध्ये गन्तुम् उश्मसि उश्मः कामयामहे, न तु तत्र गन्तुं प्रभव्रामः, यत्र येषु वास्तुषु भूरिश्रृङ्गाः महाशृङ्गवत्यो गावः आयासः सञ्चरन्ति। अत्र भूलोके अह निश्चितं तत् गोलोकाख्यं परमं पदं भूरि अत्यन्तं मुख्यादपि विशिष्टम् अवभाति अत्यन्तं शोभते। वृष्णः आनन्दवर्षकस्य उरुगायस्य महाकीर्त्तेरित्यर्थः।
[अर्थात् “उस विषयमें वैदिक मन्त्रवर्ण प्रमाण हैं, जैसे ऋक्संहितामें “ता वां” आदि। आप दोनोंके अर्थात् श्रीराम-कृष्णके उस रम्य स्थानसमूहमें गमन करनेकी कामना की, किन्तु वहाँ जानेमें समर्थ नहीं हूँ। वहाँ अर्थात् जिस भूमिसमूहमें बड़े-बड़े सींगोंवाली गायें विचरण करती हैं। इस भूलोकमें निश्चितरूपसे वही गोलोक-नामक परमपद मूलधामसे भी अत्यन्त विशिष्ट रूपमें शोभित है। यह आनन्दवर्षण करनेवाले महाकीर्ति श्रीकृष्णका परम पद है-यह अर्थ है।"] ॥ 111 ॥
कुछ असुरमोहिनी अनित्य प्राकृत घटनाएँ :- मौषल-लीला, आर कृष्ण-अन्तर्धान। केशावतार, आर विरुद्ध व्याख्यान ॥ 112 ॥
महाप्रभुके द्वारा कही गयी मूसल-लीलादिके सम्बन्धमें वास्तविक सिद्धान्त-व्याख्या :- महिषी-हरण आदि, सब-मायामय। व्याख्या शिखाइल यैछे सुसिद्धान्त हय ॥ 113 ॥
अनुवाद-मूसल-लीला, श्रीकृष्णका अन्तर्धान होना, केशावतार और अन्यान्य विरुद्ध व्याख्यान, महिषी- हरणादि, ये सब मायामय हैं, इन सबकी महाप्रभुने व्याख्या करके श्रीसनातन गोस्वामीको सुसिद्धान्तकी शिक्षा प्रदान की ॥ 112-113 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'काककृष्णकेश'-रूपी श्रीकृष्ण- अवतार-यह जो विरुद्ध व्याख्यान हैं, उसे धिक्कार देकर 'क+ईश=केश' अर्थात् श्रीकृष्ण- 'ब्रह्माके ईश्वर' इस प्रकार शुद्ध व्याख्याकी शिक्षा दी ॥ 112 ॥
तेइसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य-महाभारतकी मूसल-लीला, श्रीकृष्णके अन्तर्धानकी लीला, केशावतार और महिषी-हरण आदि आख्यान,-सभी मिथ्या हैं, नित्य अप्राकृतलीला नहीं हैं। मूढ़मति प्रापञ्चिक विष्णुविद्वेषी असुर लोगोंके मोह और भ्रमको उत्पन्न करनेके उद्देश्यसे ही इन सबका वर्णन हुआ है।