भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1846

[ 23/106-111 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (व्यवस्थितचित्तः, एवम्भूतः यः मयि) भक्तिमान् नरः, सः मे प्रियः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 106-107 ॥ ये तु धर्मामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ 108 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो इस (गीताके बारहवें अध्यायके श्लोक 2 से 19 तक वर्णित) धर्मामृतमें श्रद्धायुक्त और मेरे परायण होकर उपासना करते हैं, वे मेरे भक्त हैं और मुझे अतिशय प्रिय हैं॥ 108 ॥ अनुभाष्य— ये (भक्ताः) यथोक्तं (उक्तप्रकारम्) इदं धर्मामृतं (धर्ममेवामृतम् अमृतसाधनत्वात्) पर्युपासते (अनुतिष्ठन्ति), श्रद्दधानाः (श्रद्धां कुर्वन्तः) मत्परमाः च (मन्निष्ठाः सन्तः) मद्भक्ताः ते मे अतीव प्रियाः [भवन्ति]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 108 ॥ भक्तिके अनुगामी शुद्ध-वैराग्य-मूलक-वाक्य :— श्रीमद्भागवत (2/2/5)में— चीराणि किं पथि न सन्ति दिशन्ति भिक्षां नैवाङ्घ्रिपाः परभृतः सरितोऽप्यशुष्यन्। रुद्धा गुहाः किमजितोऽवति नोपसन्नान् कस्माद्भजन्ति कवयो धनदुर्मदान्धान् ॥ 109 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 109 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अहो, क्या मार्गमें फटे-पुराने वस्त्र नहीं पड़े रहते, सभी वृक्ष क्या भिक्षा दान नहीं करते, क्या सब नदियाँ आदि सूख गयी हैं? गुफाएँ क्या बन्द हो गयी हैं? ईश्वर क्या शरणागत व्यक्तियोंका पालन नहीं करते? यदि ऐसा ही है, तो पण्डित लोग धनके दुर्मदमें अन्धे (नष्ट-विवेक) व्यक्तियोंका क्यों भजन करते हैं? ॥ 109 ॥ अनुभाष्य—श्रीशुकदेव परीक्षितको स्थूल-जगत्के धारणामय भोगके प्रति स्पृहाशून्य होकर अनासक्त भावसे जितनेमें निर्वाह हो जाय, उतनी ही वस्तुओंको ग्रहण करनेके युक्त-वैराग्यकी बात बतला रहे हैं,— पथि चीराणि (छिन्नवस्त्रखण्डानि) किं न सन्ति (त्यक्तानि, न वर्तन्ते)? परभृतः (परान् बिभ्रति फलादिभिः पुष्णन्ति ये तथाभूताः) अङ्घ्रिपाः (वृक्षाः) भिक्षां न एव दिशन्ति (न दास्यन्ति किम्)? सरितः (सरांसि नद्यः) अपि अशुष्यन् (शुष्काः किम्)? गुहाः (गिरिदर्यः) रुद्धाः किम्? अजितः (विष्णुः) उपसन्नान् (शरणागतान्) किं न अवति (रक्षति)? [यद्येवं, तदा] कवयः (हरिरसविदः पण्डिताः) कस्मात् (केन हेतुना) धनदुर्मदान्धान् (धनेन यः दुर्मदः तेन अन्धान् नष्ट-विवेकान्) भजन्ति (अनुगच्छन्ति)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 109 ॥ श्रीसनातनके परिप्रश्नके उत्तरमें महाप्रभुके द्वारा भागवतके गूढ़ सिद्धान्तका वर्णन :— तबे सनातन सब सिद्धान्त पुछिला। भागवत-गूढ़सिद्धान्त प्रभु सकलि कहिला॥ 110 ॥ हरिवंशे कहियाछे गोलोके नित्यस्थिति। इन्द्र आसिं करिल यबे श्रीकृष्णरे स्तुति॥ 111 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके मुखसे इन सब विचारोंको श्रवण करनेके बाद श्रीसनातन गोस्वामीने बहुतसे सिद्धान्तोंके विषयमें प्रश्न किये। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको श्रीमद्भागवतके समस्त गूढ़-सिद्धान्तोंका श्रवण कराया। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको हरिवंश नामक ग्रन्थमें इन्द्रके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति करते समय वर्णित गोलोककी नित्य स्थितिके विषयमें भी समझाया ॥ 110-111 ॥ अनुभाष्य—हरिवंशमें विष्णुपर्वके 19वें अध्यायमें— “मनुष्यलोकादूर्ध्वं तु खगानां गतिरुच्यते। आकाशस्योपरि रविर्द्वारं स्वर्गस्य भानुमान् ॥ स्वर्गादूर्ध्वं ब्रह्मलोको ब्रह्मर्षिगण-सेवितः। तत्र सोमगतिश्चैव ज्योतिषाञ्च महात्मनाम् ॥ तस्योपरि गवां लोकः साध्यास्तं पालयन्ति हि। स हि सर्वगतः कृष्णः महाकाशगतो महान्। 400 ।