भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

तेइसवाँ अध्याय 23/111-113 ] उसकी वृद्धि हुई है। धर्मका ऐसी प्रबलता रहनेपर कलि किस प्रकारसे अधिकार प्राप्त कर सकेगा? क्योंकि धर्मका एक पैर मात्र बचनेपर ही कलिकी अधिकार प्राप्त करनेकी योग्यता होती है, — ऐसा नियम है। (यदि कहें,) 'कारणका नाश होनेपर कार्यका भी नाश होता है, इस न्यायके अनुसार जगत्में मेरे अप्रकट होनेपर वह चार पैरवाला धर्म भी लुप्त हो जायेगा' — ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि मेरी सर्वजगत्-पावनी महाकीर्ति सब समयके लिये जागरूक होकर वर्तमान रहती है। और मेरे अनुकूल, प्रतिकूल और तटस्थ लोगोंमें-से प्रतिकूल लोगोंका मेरे द्वारा संहार हुआ है। अब श्रीरामावतारके जैसे ही सभी लोगोंके समक्ष अपने धामवासियोंके साथ वैकुण्ठमें आरोहण करनेपर अनुकूल लोग दोगुना भक्त होंगे, अति-अनुकूल लोग परम उत्कण्ठायुक्त होकर सौगुना प्रेमवान् होंगे और तटस्थ लोग परम-आश्चर्यके दर्शनसे भक्त होंगे — इसके द्वारा धर्म अपितु और भी वृद्धि प्राप्त करेगा। ऐसा होनेपर किस प्रकारसे कलिका लेशमात्र भी प्रभुत्व सम्भव होगा? इसलिये धर्मको सङ्कुचित करनेके लिये अधर्म- मतको किसी प्रकारसे ऊपर उठाऊँगा। यहाँपर यही उपाय है, — मैं अपने निजलीला-परिकरों यदुगणोंके साथ द्वारकामें पहलेके जैसे विराजमान होऊँगा, किन्तु सब प्रापञ्चिक लोगोंके नेत्रोंके लिये अदृश्य रहूँगा। इधर प्रद्युम्न, साम्बादि मेरे नित्य परिकरोंमें उनके-उनके विभूति-स्वरूप कन्दर्प (कामदेव), कार्तिकेयादि जो देवतागण प्रविष्ट हुए हैं, उनको योगबलके प्रभावसे उन-उन देहोंसे अलक्षितरूपसे पृथक् करूँगा। तभी प्रद्युम्नादि रूपमें अभिमानकारी उन देवताओंको उस समय सभी लोगोंके सामने ही उन रूपोंमें ही प्रकाशित करके अन्य द्वारकावासियोंके साथ प्रभासमें भेजकर दान-ध्यान-मधुपानादि कराऊँगा। बादमें उन-उन अधिकारिक देवताओंको स्वर्गमें उनके-उनके अधिकारमें स्थापित करूँगा और मैं अपने नित्य परिकरोंके साथ श्रीदशरथनन्द श्रीरामचन्द्रकी भाँति वैकुण्ठमें प्रस्थान करूँगा। किन्तु लोगोंके नेत्रोंमें मायाका दोष प्रवेश होनेके कारण वे इस प्रकार सोचेंगे, — ब्राह्मणके शापसे ग्रस्त यदुवंशियोंने प्रभासमें जाकर मधुपान करके मत्त होकर एक-दूसरेपर प्रहार करके देह-त्याग किया है और परमेश्वर श्रीकृष्णने भी श्रीबलदेवके साथ मनुष्य देह त्याग करके निजधाममें आरोहण किया है। इस कारणसे कोई-कोई मुझको अनित्य और मायिक मनुष्य शरीरवाला कहकर व्याख्या करेंगे। इस प्रकारसे अवज्ञा करनेपर महा अपराध होगा, क्योंकि मैंने कहा है, (गीता 9/11) — “अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषीं तनुमाश्रितम्” [“मेरे चिन्मय विग्रहको देखकर भी मूर्ख व्यक्ति सोचते हैं कि मैंने यह प्राकृत मनुष्य शरीर धारण किया है।”] अन्य कुछ लोग कहेंगे कि जिस प्रकार कुरुवंशका विनाश हुआ है, उसी प्रकारसे श्रीकृष्ण वंशसहित प्रभासमें विनाशको प्राप्त हुए हैं, — इस प्रकार अधम, ज्ञानके अभिमानी दुर्जन लोगोंके कुमत सुनने, बोलने, अनुमोदन करने और प्रचारके द्वारा धर्म तुरन्त ही एक पैरका रह जायेगा। पित्तादि दोषयुक्त नेत्र जिस प्रकार उज्ज्वल श्वेत शङ्खको भी पीला और मलिनरूपमें देखते हैं, उसी प्रकार मायादोषसे दूषित मानव मेरी सच्चिदानन्दमयी निर्याणलीलाको भी दुर्गति और प्राकृत- रूपमें ही दर्शन करेंगे और मेरी भक्तिसे दूर होंगे। केवल प्राकृत लोग ही नहीं, किन्तु मेरे अंशसे प्रकटित अर्जुनादि भी और उसी प्रकारसे वैशम्पायन, पराशरादि मुनिगण भी मेरी मायासे मोहित होकर अपनी-अपनी संहितामें (यथाक्रमसे महाभारत, विष्णुपुराणमें) उसको वर्णन करेंगे।' इत्यादि। इसलिये देखा जाता है, (ब्रह्मपुराण) — “अजात-जातवद्विष्णुरमृत-मृतवत् तथा। मायया दर्शयेन्नित्यमज्ञानां मोहनाय च॥” “भगवान् विष्णु मायाबलसे अज्ञानी व्यक्तियोंको मोहित करनेके लिये अजन्मा होनेपर भी जन्म लिये । 403

[ 23/111-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला हुए जीवके जैसे और अमर होनेपर भी मृत जीवके जैसे अपनेको प्रदर्शन करते हैं और ऋषिगणोंको भी उसी प्रकार तात्कालिक भावोंसे मोहित करके उनके द्वारा शास्त्रोंमें मोहजनक वाक्यजालका विस्तार करके अपने आपको शुद्धभक्तिरहित जीवोंसे गोपन रखते हैं।” (भाः 11/22/4)— “युक्तञ्च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा। मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्॥” “ऋषियोंने जिसको जिस रूपमें वर्णन किया है, वह उस रूपमें सत्य है, क्योंकि मेरी (श्रीकृष्णकी) मायासे मोहित होकर व्याख्या करनेवालोंके कोई भी वाक्य असम्भव नहीं हैं।” किन्तु सुमेधागण (अति बुद्धिमान व्यक्ति) उस प्रकारके वाक्योंसे भ्रमित नहीं होते हैं, जैसा श्रीउद्धवने श्रीविदुरसे कहा, (भाः 3/2/10)— “देवस्य मायया स्पृष्टा ये चान्यदसदाश्रिताः। भ्राम्यते धीर्न तद्वाक्यैरात्मन्युपाहृतात्मनो हरौ॥” “जो भगवान्‌की मायासे मुग्ध हैं और अन्य जो असत्-मतावलम्बी हैं, उनके वाक्योंसे परमात्मा श्रीहरिमें जिनका चित्त निविष्ट है, ऐसे मानवोंकी बुद्धि भ्रान्त नहीं होती है।” क्योंकि वे शास्त्रयुक्तिमें सुनिपुण हैं। शास्त्रोंमें स्थान-स्थानपर शुद्ध सिद्धान्त भी प्रकाशित हैं, जैसे स्कन्दपुराणमें कहा गया है,— “पृथिवीलोकसंत्‍यागो देहत्यागो हरेः स्मृतः। नित्यानन्दस्वरूपत्वादत्रैवोपलभ्यते॥” “श्रीहरिके ‘देहत्याग’-शब्दसे उनके पृथ्वीलोकके त्यागको ही कहा गया है (‘यस्य पृथिवी शरीरम्’—इस श्रुतिमें ही उसका प्रमाण है), क्योंकि वे नित्यानन्दस्वरूप हैं, इसलिये उनकी अन्य प्रकारके अर्थके द्वारा उपलब्धि नहीं होती।” इस प्रसङ्गमें श्रीचैतन्यभागवतमें आदिखण्डमें १४ अध्यायमें १०४ संख्यामें श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-कृत ‘गौड़ीय-भाष्य’ भी देखें। ‘केशावतार’—(भाः 1/2/28 में)—“कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्”—इस प्रकारसे श्रीकृष्णकी स्वयं भगवत्ता प्रमाणित हुई है। तथापि (भाः 2/7/26)—“भूमः सुरेतरवरूथ” श्लोकमें “क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः” अर्थात् श्वेत और कृष्णवर्ण केशवाले श्रीक्षीरोदशायी विष्णु अंशरूपमें पृथ्वीके क्लेश नाश करनेके लिये आविर्भूत होंगे, इस रूपसे इस ब्रह्मा-वाक्यमें जो आपातरूपसे श्रीकृष्णका श्रीविष्णुके केशावतार होना दिखायी देता है, वह मायाके द्वारा भ्रान्ति उत्पादन करके श्रीकृष्णकी असमोर्ध्व-महिमाको सङ्गोपन करनेके लिये ही है। किन्तु जैसा कृष्णसन्दर्भमें कहा है,—“यैस्तु यथाश्रुतमेवेदं व्याख्यातं ते न सम्यक् परामृष्टवन्तः अर्थात् जो श्लोकको जैसे सुना है, वैसे अर्थकी व्याख्या करते हैं, वे सम्पूर्ण रूपसे विचारपरायण नहीं हैं।” जैसे, विष्णुपुराणमें कहा गया है,—‘हे महामुने ! भगवान् परमेश्वरने अपने श्वेत और कृष्ण दो केशोंको तोड़ा और देवताओंको कहा,—मेरे ये दो केश पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर पृथ्वीका भार हरण करेंगे।’ और महाभारतमें भी उसी प्रकार कहा गया है,—‘उन श्रीविष्णुने दो केशोंको तोड़ा, उनमेंसे एक श्वेत और दूसरा कृष्णवर्णका था; वे दो केश ही यदुगणके कुलमें देवकी और रोहिणी—दो स्त्रियोंमें प्रविष्ट हुए थे। उनमेंसे एक जो श्वेतवर्ण-केश हैं, वे बलदेव हुए थे और दूसरे जो श्रीकृष्णवर्ण-केश हैं, वे श्रीकेशव-‘श्रीकृष्ण’-नामसे कहे गये थे।’ उस-उस स्थानपर जो अर्थ आपात प्रकट हुए, उनपर विचार करनेपर उनमें कोई सङ्गति दिखायी नहीं देती। क्योंकि, इनके द्वारा त्रिगुणातीत, अविकारी, चिदानन्दघन-विग्रह श्रीविष्णुकी आयुके परिणामस्वरूप सफेद और काले केश होना समझना होगा। परन्तु शास्त्रमें (भाः 3/28/17)—‘सन्तं वयसि कैशोरे’ इस रूपमें उनकी नित्य किशोर अवस्था ही दिखायी देती है। और फिर (भाः 1/3/28)—“कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्”—इस रूपसे श्रीकृष्णमें स्वयं भगवत्ता ही वर्णित है। इसलिये विद्वान लोग उसकी इस प्रकारसे व्याख्या करते हैं, जैसे, श्रीधरस्वामीपाद-कृत व्याख्या,—‘सितकृष्णकेशत्व’— 404 |

तेइसवाँ अध्याय 23/111-113 ] सफेद-काले केशोंका होना यह विष्णुकी शोभास्वरूप ही है, आयुका कोई परिणाम नहीं है। ‘भारहरण-रूप कार्यकी बात ही क्या, वह तो मेरे दो केश भी करनेमें समर्थ हैं’– इस बातको प्रकाश करते हुए और उसके साथ श्रीबलरामके और श्रीकृष्णके वर्णकी सूचना करते हुए उन्होंने उक्त केशोंको तोड़ा था, ऐसा जानना होगा। अन्यथा शास्त्रमें कहे गये पूर्व और बादके वाक्योंका परस्परमें विरोध उपस्थित होता है एवं ‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’– इस वाक्यसे भी विरोध होता है। इसलिये ‘सितकृष्णकेश’ (अर्थात् उज्ज्वलकृष्णकेश)– स्वयं भगवान् ही हैं, वे अपने अंश श्रीबलरामके साथ जन्म ग्रहण करते हैं। श्रीलघुभागवतामृतमें श्रीरूपगोस्वामि-कृत व्याख्या,– ‘कलया सितकृष्णकेशः’ (भाः 2/7/26) ‘कलया’ अर्थात् शिल्पमें विशेष निपुणताके द्वारा ‘सित’– बद्ध जो ‘कृष्णकेश’ हैं अर्थात् अति सुन्दर श्यामवर्ण केशयुक्त जो विग्रह वे ही श्रीकृष्ण हैं,–उनकी विशेष वैदग्धीके कारण इस प्रकारसे कहा गया है। अथवा जो ‘कलया’ अर्थात् एक अंश रूपमें ‘सितकृष्णकेशः’ अर्थात् श्वेतकृष्णकेश युक्त क्षीरोदकशायी विष्णु हैं, वे लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही यदुवंशमें आविर्भूत हुए हैं। सन्दर्भमें श्रील जीवगोस्वामि-कृत व्याख्या,– “अंशवो ये प्रकाशन्ते मम ते केशसंज्ञिता। सर्वज्ञाः केशवं तस्मान्नामाहुर्मुनिसत्तम॥” अर्थात् “हे मुनिश्रेष्ठतम! मेरा जो अंशसमूह (ज्योतिसमूह) प्रकाशित हो रहा है उसको ‘केश’–नामसे कहते हैं। इसलिये सर्वज्ञगण मुझको ‘केशव’ कहते हैं–इस महाभारत-वाक्यके अनुसार मेरे (अर्थात् क्षीरोकशायी विष्णुके) सिरपर धारण किये श्वेत और कृष्णवर्णकी दो ज्योतिरूप दो प्रभु अवतरित होंगे’, इसकी सूचना देनेके लिये ही (विष्णुपुराणमें) दो केशोंकी बात कही गयी है।” और भी विष्णुपुराण, महाभारतमें सब जगह ‘केश’-शब्दका ही मात्र प्रयोग दिखायी देता है, किन्तु उसके समानार्थक ‘चिकुर’, ‘कुन्तल’ आदि किसी शब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता। इसलिये (भाः 11/21/35)– “परोक्षवादा ऋषयः परोक्षञ्च मम प्रियः” अर्थात् “ऋषिगण परोक्षवादी हैं और परोक्ष ही मुझे (श्रीकृष्णको) प्रिय हैं”–इस प्रकारसे भगवान्‌की इच्छानुसार परोक्षवादी ऋषियोंके मनोभावको ही उन-उन वाक्योंमें समझना होगा, उनके वाक्योंका बाह्य अर्थ नहीं लेने होंगे आदि।’– (श्रीविश्वनाथ) ‘महिषीहरण’–(भाः 1/15/20)– “अध्वन्युरुक्रमपरिग्रहमङ्ग रक्षन् गोपैरसद्भिरबलेव विनिर्जितोऽस्मि॥” श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेके बाद द्वारकापुरीसे वापिस लौटे श्रीअर्जुन महाराज श्रीयुधिष्ठिरको श्रीकृष्णके विरहमें अनेक प्रकारसे विलाप करते करते कहने लगे,–“श्रीकृष्णविहीन होकर मैं इस प्रकार बलहीन हो गया हूँ कि उनकी (आठ प्रधान महिषियोंके अतिरिक्त अन्य) सोलह हजार स्त्रियोंकी रक्षा करते हुए जब मैं आ रहा था, तब मार्गमें कुछ नीच गोपोंके द्वारा मैं अबलाकी भाँति पराजित हो गया।” श्रीभगवान्‌के जो सखा हैं, उन प्रबल-पराक्रमशाली श्रीअर्जुनके निकटसे उनके सखाकी पत्नियोंका हरण नितान्त असम्भव है। वहाँपर रहस्य यह है कि,–‘उन अपनी प्रेयसियोंको (व्रजमें) अप्रकट-प्रकाशमें प्रवेश करानेके लिये उस- उस रूपमें भगवान्‌ने उनका आकर्षण किया, क्योंकि उनकी इस प्रकारसे अभिलाषा थी। जैसे (महिषियोंने द्रौपदीसे कहा था), (भाः 10/83/43)– “व्रजस्त्रियो यद् वाञ्छन्ति पुलिन्द्यस्तृणवीरुधः। गावश्चारयतो गोपाः पादस्पर्शं महात्मनः॥” “जिस प्रकार गोचारणशील श्रीकृष्णकी चरणरजको व्रजरमणियोंने, गोपगणोंने और यहाँतक कि तृण-लतासे संलग्न उस चरणरजको उठाकर पुलिन्द-रमणियोंने भी प्राप्त किया था, हमें भी उसकी चाह है।” महिषियोंके इस प्रकारके वाक्योंमें व्रजस्त्रियोंके द्वारा वाञ्छित भगवद्-स्वरूप ही (अर्थात् श्रीकृष्णका गोपस्वरूप ही) है। उनके मनोरथको जानकर भगवान्‌ने गोपरूपमें उनका आकर्षण किया था, अन्यथा वे | 405

[ 23/111-118 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपा महिषियाँ नीच व्यक्तिके स्पर्शके पहले ही अन्तर्धान हो जातीं। इसलिये दूसरे शब्दोंमें महिषियोंके द्वारा व्रजस्त्री रूपकी प्राप्ति ही जानना होगा। विष्णुपुराणमें और ब्रह्मपुराणमें भी इस प्रकारके तात्पर्यसे अवगत हुआ जाता है। जैसे, श्रीअर्जुनसे श्रीव्यासदेवने कहा,– “एवं तस्य मुनेः शापादष्टावक्रस्य केशवम्। भर्त्तारं प्राप्य ता याता दस्युहन्ताः वराङ्गनाः॥” “इस प्रकारसे उन अष्टावक्र मुनिके अभिशापसे वे वराङ्गनाएँ (सुन्दर अङ्गोंवाली) केशवको पतिरूपमें प्राप्त करके बादमें डाकुओंके हाथोंमें पड़ी थीं।” पूर्वकालमें देवियोंने एक समय अष्टावक्र-मुनिका स्तव करके उन्हें सन्तुष्ट किया और उन्होंने मुनिसे यह वर प्राप्त किया कि विष्णु उनके पति होंगे। बादमें मुनिवर जब उठे, तब उनके अङ्गोंको टेढ़ा देखकर वे देवियाँ हँसने लगीं, उससे रुष्ट होकर मुनिने शाप भी दिया कि ‘तुम डाकुओंके द्वारा अपहृत होगीगी।’ पुनः उन्होंने मुनिको प्रसन्न करके उक्त शापसे मुक्ति प्राप्त की थी। ऋषिवाक्य व्यर्थ नहीं होता, इसलिये उन्होंने विष्णुको पतिरूपमें प्राप्त किया और बादमें वे डाकुओंके द्वारा अपहृत हुई थीं। उनका डाकुओंके द्वारा अपहरण होना और (पुनः) पतिको प्राप्त करना सिद्धान्तके अनुसार ही हुआ था, क्योंकि उनके निजपति श्रीकृष्ण ही डाकुरूपमें आये थे। इस बातको श्रीव्यासने पुनः अन्य वाक्यके द्वारा बतलाया,— “तत् त्वया न हि कर्तव्यः शोकोऽल्पोपि हि पाण्डव। तेनाप्यखिलनाथेन सर्वं तदुपसंहतम्॥” “हे पाण्डव! इसलिये तुम्हारे लिये सामान्य शोक करना भी कर्त्तव्य नहीं है, क्योंकि उन अखिलनाथके द्वारा ही (डाकुरूपमें) महिषियोंका अपहरण हुआ था।”—यह व्याख्या जाननी होगी।’—(श्रीविश्वनाथ) अर्थात् श्रीकृष्ण स्वयं ही गोप-डाकूके रूपमें उन महिषियोंका हरण करके युगपत् (एक साथ ही) महिषियोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये व्रजमें आकर्षण, ऋषिवाक्यकी रक्षा और लोगोंकी आँखोंके सामने मायाजाल फैलाकर अपनी लीलाकी महिमाके सर्वोत्कर्षको सङ्गोपन करना—सबका एकसाथ उन्होंने साधन किया था। गोप-डाकुरूपमें स्वयं श्रीकृष्ण ही आये थे, इसलिये अमित बलशाली गाण्डीव धनुर्धारी श्रीअर्जुन निष्प्रभ (निस्तेज) हो गये थे, अन्यथा उनकी बलहीनता कल्पनासे परे है॥111-112॥ महाप्रभुके चरणोंमें श्रीसनातनका दैन्य और प्रार्थना :— तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया। निवेदन करे दन्ते तृण-गुच्छ लञा॥114॥ “नीचजाति, नीचसेवी, मुञि—सुपामर। सिद्धान्त शिखाइला,—येह ब्रह्मार अगोचर॥115॥ तुमि ये कहिला, एइ सिद्धान्तामृत-सिन्धु। मोर मन छुँइते नारे इहार एक बिन्दु॥116॥ अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर दाँतोंमें तृणका गुच्छा लेकर उनसे निवेदन करने लगे,—“हे प्रभो! मैं नीच जातिका हूँ, मैंने नीच लोगोंकी ही सेवा की है और मैं अत्यन्त अधम हूँ, किन्तु तब भी आपने मुझे उन सब सिद्धान्तोंकी शिक्षा प्रदान की है, जो ब्रह्माके लिये भी अगोचर हैं। आपने जो कुछ वर्णन किया है, वह तो सिद्धान्तरूपी अमृतका सिन्धु है। मेरा मन तो इसके एक बिन्दुको भी नहीं छू सकता॥114-116॥ पङ्गु नाचाइते यदि हय तोमार मन। वर देह’ मोर माथे धरिया चरण॥117॥ उल्लिखित भक्तिसिद्धान्तवाणीकी स्फूर्तिकी प्राप्तिके लिये महाप्रभुके निकट वरकी याचना :— ‘मुञि ये शिखाइ तोरे स्फुरुक सकल।’ एइ तोमार वर हैते हवे मोर बल॥”118॥ अनुवाद—यदि इस पङ्गुको (लँगड़ेको) नचानेकी 406 ।

तेइसवाँ अध्याय 23/117-122 ] आपके मनमें इच्छा हो, तब आप मेरे सिरपर अपने चरण रखकर मुझे यह वर प्रदान कीजिये कि 'मैंने तुम्हें जो भी सिखाया है, वह सब तुम्हारे हृदयमें स्फुरित हो।' आपके द्वारा दिये गये इस वरदानसे ही मुझे बलकी प्राप्ति होगी जिससे मैं इसका वर्णन कर सकूँगा॥" 117-118॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको वरदान :- तबे महाप्रभु ताँर शिरे धरि' करे। वर दिला—'एइ सब स्फुरुक तोमारे ॥' 119 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीके सिरपर अपना हाथ रखकर वर दिया—'ये सब शिक्षाएँ तुममें स्फुरित हों ॥' 119 ॥ श्रीकृष्णप्रेमरूपी प्रयोजनतत्त्व और महाप्रभुकी कृपाका आख्यान संक्षेपमें वर्णित :- संक्षेपे कहिलुँ—'प्रेम' प्रयोजन-संवाद। विस्तारि' कहन ना याय प्रभुर प्रसाद ॥ 120 ॥ अनुवाद—श्रील कविराज गोस्वामी कह रहे हैं कि मैंने महाप्रभु और श्रीसनातन गोस्वामीके बीच हुए 'प्रेम' रूपी प्रयोजनके संवादका संक्षेपमें ही वर्णन किया है, क्योंकि महाप्रभुकी कृपाका विस्तारसे वर्णन करना मेरे लिये सम्भवपर नहीं है॥ 120॥ महाप्रभुके उपदेशामृतके श्रवणसे आत्माकी चिद्वृत्ति श्रीकृष्णसेवाका ज्ञानोदय और प्रेमकी प्राप्ति :- प्रभुर उपदेशामृत शुने येइ जन। अचिरात् मिलये ताँरे कृष्णप्रेमधन ॥ 121 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीको दिये गये महाप्रभुके इस उपदेशामृतका जो कोई भी श्रवण करता है, उसे बहुत शीघ्र ही श्रीकृष्णप्रेमरूपी धनकी प्राप्ति होती है॥ 121॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 122 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे प्रेमप्रयोजन- विचारो नाम त्रयोविंशः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 122॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें प्रेमप्रयोजन-विचार नामक तेइसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। 407

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 408 ।

चौबीसवाँ अध्याय कथासार-श्रीसनातनकी प्रार्थनाके अनुसार महाप्रभुने “आत्मारामश्च मुनयः” इस श्लोकके 61 प्रकारके अर्थ किये। पृथक्-पृथक् पदोंकी व्याख्या करते हुए ‘च’ और ‘अपि’—इन दो शब्दोंके अर्थोंके संयोगसे ये सब अर्थ निष्पन्न किये। अन्तमें महाप्रभुने इस श्लोककी व्याख्यामें इस निश्चित अर्थको स्थिर कर दिया कि ज्ञानी, कर्मी और योगी, सभी अपने-अपने दोषोंका परित्याग करके साधुसङ्गमें श्रीकृष्णभजन करते हैं। व्याख्याके बीचमें श्रीनारद और व्याधके एक संवादमें साधुसङ्गके माहात्म्यका वर्णन किया। श्रीनारदने श्रीपर्वत मुनिको लाकर व्याधकी हरिभक्ति दिखलायी। इसके बाद महाप्रभुने श्रीसनातनका स्तव सुनकर श्रीमद्भागवतका तात्पर्य और माहात्म्य प्रकाशित किया। अन्तमें श्रीसनातनकी इच्छानुसार महाप्रभुने हरिभक्तिविलासके सूत्रोंको बतला दिया। —(अमृतप्रवाह भाष्य) “आत्मारामश्च”-श्लोकमें कुतर्कका हरण करनेवाले श्रीगौरके आशीर्वादकी याचना :- आत्मारामेति पद्यार्कस्यार्थांशून् यः प्रकाशयन्। जगत्तमो जहाराव्यात् स चैतन्योदयाचलः ॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने “आत्मारामेति” पद्यरूपी सूर्यकी अर्थरूपी समस्त किरणोंको प्रकाशित करके जगत्के अन्धकारका हरण किया था, वे उदयाचल-श्रीचैतन्य जगत्का पालन करें ॥1॥ अनुभाष्य— यः (श्रीचैतन्यदेवः) आत्मारामेति ('आत्मारामश्च' इति भागवतस्य) पद्यार्कस्य (श्लोकसूर्यस्य) अर्थांशून् (अर्थाः एव अंशवः किरणास्तान्) प्रकाशयन् (प्रकटयन्) जगत्तमः (कुसिद्धान्तान्धकारं) जहार (नाशयामास), स चैतन्योदयाचलः (श्रीकृष्णचैतन्य एव उदयाचलः, अर्कस्य उदयस्थलत्वात्) अव्यात् (अवतु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥2॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो ॥2॥ श्रीसनातनकी महाप्रभुके श्रीचरणोंमें प्रार्थना :- तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया। पुनरपि कहे किछु विनय करिया ॥3॥ पहले सार्वभौमको सुनायी “आत्मारामश्च” श्लोककी अठारह प्रकारकी व्याख्या सुननेकी अभिलाषा :- “पूर्वे शुनियाछौं, तुमि सार्वभौम-स्थाने। एक श्लोकेर आठार अर्थ कैराछ व्याख्याने ॥4॥ अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर पुनः विनयपूर्वक कहा,—“मैंने सुना है कि आपने पहले श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको आत्माराम श्लोकके अठारह प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या करके सुनायी थी ॥3-4॥ श्रीमद्भागवत (1/7/10)— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥5॥ अनुवाद—आत्मामें ही जिनकी रति है, ऐसे वासना-ग्रन्थियोंसे शून्य सभी मुनि भी बृहत्कर्मा श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं; क्योंकि, जगत्के चित्तहारी हरिका एक ऐसा ही एक गुण है ॥5॥ । 409

[ 24/5-15 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य-मध्यलीला 6/186 संख्या देखें॥5॥ आश्चर्य शुनिया मोर उत्कण्ठित मन। कृपा करि' कह यदि, जुड़ाय श्रवण॥” 6॥ अनुवाद-यह सुनकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था और उन अर्थोंको सुननेके लिये मेरा मन भी उत्कण्ठित हो रहा है। यदि आप कृपा करके मुझे उस श्लोककी व्याख्या सुनायें तो मेरे कानोंको आनन्द मिलेगा॥”6॥ महाप्रभुके द्वारा स्वयंकी अप्राकृत पागल-कहकर दैन्यके आवरणमें आत्मगोपनकी चेष्टा :- प्रभु कहे,—“आमि वातुल, आमार वचने। सार्वभौम वातुलता सत्य करि' माने॥7॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,–“मैं एक पागल हूँ और सार्वभौम भट्टाचार्य दूसरे पागल हैं, इसलिये वे मेरी बातोंको सत्य मानते हैं॥7॥ कीर्तनकारी महाप्रभुका उपयुक्त श्रोता श्रीसनातनको आदर देते हुए पहलेवाले अठारह प्रकारके अर्थोंको छोड़कर नयी व्याख्या करना :- किवा प्रलापिलाङ, तार नाहि किछु मने। तोमार सङ्ग-बले यदि किछु हय मने॥8॥ सहजे आमार किछु अर्थ नाहि भासे। तोमा-सबार सङ्ग-बले ये किछु प्रकाशे॥9॥ अनुवाद-मैंने तब क्या कहा था, मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है, किन्तु यदि तुम्हारे सङ्गके प्रभावसे मुझे कुछ स्मरण आयेगा, तो मैं वह कहूँगा। प्रायः मैं अपने आपसे कोई व्याख्या नहीं कर पाता, किन्तु आप लोगोंके सङ्गके प्रभावसे मेरे मनमें कुछ प्रकाशित हो सकता है॥8-9॥ “आत्मारामश्च” श्लोकमें कुल ग्यारह पद :- एकादश पद एइ श्लोके सुनिर्मल। पृथक् पृथक् नाना अर्थ पदे करे झलमल॥10॥ अनुवाद-इस श्लोकमें ग्यारह पद तो स्पष्ट हैं, किन्तु अलग-अलग विचार करनेपर सभी पदोंके अनेक अर्थ जगमगाते हैं॥10॥ अनुभाष्य-‘एकादश पद'-(1) आत्मारामः, (2) च, (3) मुनयः, 4) निर्ग्रन्थाः, (5) अपि, (6) उरुक्रमे, (7) कुर्वन्ति, (8) अहैतुकीं, (9) भक्तिं, (10) इत्थम्भूतगुणः, (11) हरिः॥10॥ (1) 'आत्मा'-शब्दके सात अर्थ :- 'आत्मा'-शब्दे ब्रह्म, देह, मन, यत्न, धृति। बुद्धि, स्वभाव,-एइ सात अर्थ-प्राप्ति॥11॥ अनुवाद-‘आत्मा'-शब्दके-ब्रह्म, देह, मन, यत्न, धृति, बुद्धि और स्वभाव-ये सात अर्थ प्राप्त होते हैं॥11॥ प्रमाण :- विश्वप्रकाश-कोशमें- “आत्मा देहमनोब्रह्मस्वभावधृतिबुद्धिषु। प्रयत्न चे" इति॥12॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥12॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘आत्म'-शब्दसे-देह, मन, ब्रह्म, स्वभाव, धृति, बुद्धि और यत्नको समझना चाहिये॥12॥ 'आत्मा'-शब्दके अर्थको लेकर सात प्रकारके आत्माराम :- एइ साते रमे येइ, सेइ आत्मारामगण। आत्मारामगणेर आगे करिये गणन॥13॥ अनुवाद-इन सातोंमें जो रमण करते हैं, वे आत्मारामगण हैं। आत्मारामोंकी बादमें गणना करूँगा॥13॥ (2) ‘मुनि'-शब्दके सात अर्थ :- 'मुनि'-आदि शब्देर अर्थ शुन, सनातन। पृथक् पृथक् अर्थ करि, पाछे करिब मिलन॥14॥ 'मुनि'-शब्दे मननशील, आर कहे मौनी। तपस्वी, व्रती, यति, आर ऋषि, मुनि॥15॥ 410 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/14-21 ] अनुवाद—हे सनातन, अब तुम 'मुनि'-आदि शब्दोंके अर्थ सुनो। पहले मैं इन सबके पृथक्-पृथक् अर्थ बतला रहा हूँ, बादमें इनको मिलाकर अर्थ बतलाऊँगा। मुनि शब्दके मननशील, मौनी, तपस्वी, व्रती, यति (संन्यासी), ऋषि और मुनि—ये सात अर्थ होते हैं॥14-15॥ (3) 'निर्ग्रन्थ'-शब्दके अर्थ :— 'निर्ग्रन्थ'-शब्दे कहे, अविद्या-ग्रन्थि-हीन। विधि-निषेध-वेदशास्त्र-ज्ञानादि-विहीन॥ 16॥ मूर्ख, नीच, म्लेच्छ आदि शास्त्ररिक्तगण। धनसञ्चयी—निर्ग्रन्थ, आर ये निर्धन॥17॥ अनुवाद—'निर्ग्रन्थ'-शब्दका एक तात्पर्य उस व्यक्तिसे है जो अविद्याकी ग्रन्थियोंसे मुक्त है। निर्ग्रन्थका दूसरा तात्पर्य उस व्यक्तिसे है जो वेदशास्त्रोंके नियम अर्थात् विधि-निषेधको नहीं मानता है। जो ज्ञान-विहीन है, उसे भी निर्ग्रन्थ कहा जाता है। इनके अतिरिक्त निर्ग्रन्थ-शब्दसे मूर्ख, नीच, म्लेच्छादि शास्त्र-ज्ञानरहित, धनका सञ्चय करनेवाले और निर्धनको समझना चाहिये॥16-17॥ 'निर्' उपसर्ग और 'ग्रन्थ'-शब्दके अर्थोंका प्रमाण :— विश्वप्रकाश-कोशमें— निर्निश्चये निष्क्रमार्थे विनिर्माण-निषेधयोः। ग्रन्थो धनेऽथ सन्दर्भे वर्णसंग्रहणेऽपि च॥18॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥18॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'निर्' उपसर्गका निश्चयमें, क्रम-अर्थमें, निर्माणमें, निषेधमें व्यवहार होता है। 'ग्रन्थ'-शब्दके अर्थ धन-सम्पत्ति, सन्दर्भ, वर्ण-संग्रह (अक्षर-योजन) हैं॥18॥ (4) 'उरुक्रम' (उरु+क्रम) शब्दका अर्थ :— 'उरुक्रम'-शब्दे कहे, बड़ याँर क्रम। 'क्रम'-शब्दे कहे, एइ पादविक्षेपण॥19॥ शक्ति कम्पयुक्त परिपाट्ये आक्रमण। चरण-चालने काँपाइल त्रिभुवन॥20॥ अनुवाद—'उरुक्रम'-शब्दसे उसे लक्ष्य करते हैं जिसका क्रम बड़ा है। 'क्रम'-शब्दके अर्थ—एक पगका माप, शक्ति, कम्पनयुक्त, परिपाटी (पद्धति) और आक्रमण हैं। इसलिये 'उरुक्रम'-शब्दका मुख्य अर्थ है—श्रीवामन भगवान् जिन्होंने अपने चरणोंको बढ़ाकर त्रिभुवनको कँपा दिया था॥19-20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उरुक्रम'-शब्दके 'उरु'-शब्दसे बड़े-बड़े और 'क्रम'-शब्दसे—पग धरना एवं (शक्ति आदिके कारण-भूत) कम्पनादि। इसलिये उरुक्रम-शब्दसे वामन-आकारके विष्णुको समझना है, क्योंकि बड़े-बड़े चरणोंके पगके द्वारा उन्होंने ही जगतको कँपा दिया था॥19-20॥ प्राकृत सर्वश्रेष्ठ सूक्ष्मतम परमाणुको गिननेवालेके लिये भी श्रीवामनके वीर्यको मापना असम्भव :— श्रीमद्भागवत (2/7/40) में— विष्णोर्नु वीर्यगणनां कतमोऽर्हतीह यः पार्थिवान्यपि कविर्विममे रजांसि। चस्कम्भ यः स्वरंहसास्खलता त्रिपृष्ठं यस्मात् त्रिसाम्यसदनादुरु कम्पयानम्॥ 21॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥21॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पृथ्नीके धूलिकणोंकी गणना करना सम्भव हो सकता है, किन्तु विष्णुके पराक्रमोंकी कौन गणना कर सकता है? उन्होंने वामनरूपमें अपने चरणोंके प्रबल वेगसे त्रिगुणमयी प्रकृतिके मूलसे सत्यलोक तकको कम्पित करके धारण किया था॥21॥ अनुभाष्य—ब्रह्मा अपने शिष्य देवर्षि नारदको भगवान् विष्णुके लीलावतार-समूहकी चेष्टा, प्रयोजन और विभूतिकी कथाका वर्णन करके भगवान् वामनदेवके अपरिमेय (असीम) पराक्रमकी महिमाका वर्णन कर रहे हैं,— इह (अस्मिन् संसारे) यः कविः (पण्डितः) पार्थिवानि रजांसि (पृथिव्यां परमाणून् अपि) विममे (विगणितवान्, तादृशः अपि) कतमः नु (प्रश्ने) विष्णोः वीर्यगणनां [कर्त्तुं] अर्हति (समर्थो भवति?—न कोऽपीत्यर्थः), यः (विष्णुः) । 411

[ 24/21-28 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला यस्मात् [कारणात् त्रिविक्रमावतारे] अस्खलता (प्रतिघातशून्येन) स्वरंहसा (स्वपादवेगेन) त्रिसाम्यसदनात् (त्रिगुणसाम्यरूपं सदनम् अधिष्ठानं प्रधानं तस्मात् आरभ्य) उरुकम्पयानम् (अधिककम्पमानं) त्रिपृष्ठं (सत्यलोकं) चस्कम्भ (धृतवान्)।-मन्त्रः (ऋग्वेदे प्रथम मः 154 सूः प्रथम श्लोक)-“ॐ विष्णोर्नु वीर्याणि कं प्रावोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि। योऽस्कम्भयदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः” इति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (ऋग्वेद मन्त्र)-जो पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोकको बनानेवाले हैं, जो देवताओंके निवास स्थान द्युलोकको स्थिर कर देते हैं, जो तीन पगोंसे तीनों लोकोंमें विचरण करनेवाले हैं (अथवा उन्हें मापनेवाले हैं), उन विष्णुके वीरतापूर्ण कार्योंका कहाँ तक वर्णन करें?॥21॥ स्वरूप और माया-शक्तिवैभव-तीनों धामोंमें शक्ति अथवा पराक्रमका विभिन्न परिचय :- विभूरूपे व्यापे, शक्त्ये धारण-पोषण। माधुर्यशक्त्ये गोलोक, ऐश्वर्ये परव्योम॥22॥ मायाशक्त्ये ब्रह्माण्डादि-परिपाटी-सृजन। ‘उरुक्रम’-शब्देर एइ अर्थ निरूपण॥23॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें। भगवान् ‘उरुक्रम’-शब्दका यही अर्थ है॥22-23॥ अनुभाष्य-भगवान् विभूरूपमें त्रिभुवनमें व्याप्त रहते हैं और शक्तिके द्वारा उन्हें धारण तथा उनका पोषण करते हैं। वे माधुर्यशक्तिके द्वारा गोलोकको धारण और पोषण करते हैं। ऐश्वर्यशक्तिके द्वारा परव्योमको धारण और पोषण करते हैं। और मायाशक्तिके द्वारा ब्रह्माण्डादिका परिपाटीरूपसे सृजन करते हैं॥22-23॥ क्रमशब्दका समानार्थक शब्द :- विश्वप्रकाशमें- “क्रमः शक्तौ परिपाट्यां क्रमचालनकम्पयोः॥”24॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥24॥ अमृतप्रवाह भाष्य-क्रम-शब्दका अर्थ-शक्ति, परिपाटी, चालन और कम्पन है॥24॥ (5) ‘कुर्वन्ति’-क्रियाके परस्मैपदका कारण :- ‘कुर्वन्ति’-पद-एइ परस्मैपद हय। कृष्णसुखनिमित्त भजने तात्पर्य कहय॥25॥ अनुवाद-‘कुर्वन्ति’-पद परस्मैपदरूपमें व्यवहार किया गया है। वे श्रीकृष्णके सुखके लिये ही भजन करते हैं, इसलिये परस्मैपद व्यवहार करनेका यही तात्पर्य है॥25॥ अनुभाष्य-‘कुर्वन्ति’-पद-परस्मैपद रूपमें प्रयोग किया गया है; (फलकी प्राप्ति) कर्त्ताका अभिप्राय होनेपर ‘आत्मनेपद’का प्रयोग होता है। किन्तु यहाँपर श्रीकृष्णके सुखके लिये वे भजन करते हैं, ऐसा तात्पर्य व्यवहार हुआ है, इसलिये यहाँपर ‘कुर्वन्ति’का परस्मैपदीय प्रयोग है॥25॥ प्रमाण :- पाणिनिमें 1/3/72; सिद्धान्त-कौमुदीमें भ्वादि-प्रकरणमें- “स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले॥”26॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥26॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उभयपदी (दो पदवाली) धातुका उच्चरित स्वर और ञ ‘इत’ होता है। क्रियाका फल यदि कर्त्ताका अभिप्राय होता है, तब वहाँ ‘आत्मनेपद’ होता है। इस स्थानपर ऐसा नहीं होनेके कारण ‘परस्मैपद’का प्रयोग हुआ है॥26॥ (6) ‘अहैतुकी’-शब्दके अन्तर्गत ‘हेतु’-शब्दके तीन प्रकारके दार्शनिक अर्थ :- हेतु’-शब्दे कहे-भुक्ति-आदि वाञ्छान्तरे। भुक्ति, सिद्धि, मुक्ति-मुख्य एइ तिन प्रकारे॥27॥ भुक्ति, सिद्धि और मुक्तिमें अन्तर :- एक भुक्ति कहे, भोग-अनन्त प्रकार। सिद्धि-अष्टादश, मुक्ति-पञ्चविधाकार॥28॥ अनुवाद-‘हेतु’-शब्दसे भुक्ति आदिकी इच्छाओंको कहा जाता है। मुख्य रूपसे ये इच्छाएँ भुक्ति, सिद्धि 412 ।

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

चौबीसवाँ अध्याय 24/27-37 ] [बायाँ स्तम्भ] और मुक्ति—इन तीन प्रकारकी होती हैं। पहली है भुक्ति जो अनन्त प्रकारकी है। सांसारिक भोगोंको ही भुक्ति कहते हैं। सिद्धि—ये अठारह प्रकारकी और मुक्ति—पाँच प्रकारकी होती है॥ 27-28॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'सिद्धि'—अणिमादि अठारह प्रकारकी सिद्धियाँ (भा: 11/15 अध्याय देखें)॥ 28॥ 'अहैतुकी'-शब्दका अर्थ :— एइ याँहा नाहि, सेइ भक्ति—'अहैतुकी'। याहा हैते वश हय श्रीकृष्ण कौतुकी॥ 29॥ अनुवाद—भुक्ति, सिद्धि और मुक्ति—इन तीनोंकी कामना जहाँपर नहीं है, उस भक्तिको 'अहैतुकी' कहते हैं, जिसके द्वारा लीलामय श्रीकृष्ण वशीभूत हो जाते हैं॥ 29॥ (7) 'भक्ति'-शब्दका अर्थ; दस प्रकारके भेद :— 'भक्ति'-शब्देर अर्थ हय दशविधाकार। एक—'साधन', 'प्रेमभक्ति'—नव प्रकार॥ 30॥ 'रति'-लक्षणा, 'प्रेम'-लक्षणा, इत्यादि प्रचार। भावरूपा, महाभाव-लक्षणरूपा आर॥ 31॥ अनुवाद—'भक्ति'-शब्दका अर्थ दस प्रकारका होता है। साधनभक्ति एक प्रकारकी और प्रेमभक्ति नौ प्रकारकी होती है। नौ प्रकारकी प्रेमभक्ति 'रति'-लक्षणासे आरम्भ करके 'प्रेम'-लक्षणा आदिसे बढ़ती हुई भावरूपा और महाभाव-लक्षणरूपा भक्ति तक बढ़ती है॥ 30-31॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमभक्ति—नव प्रकार'—रति, प्रेम, स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव—ये नौ प्रकारकी प्रेमभक्ति है॥ 30॥ अनुभाष्य—साधन भक्तिका एक प्रकारका लक्षण और प्रेम-भक्तिके नौ प्रकारके लक्षण हैं, जैसे रति (भावभक्ति)-लक्षणा, प्रेम-लक्षणा, स्नेह-लक्षणा, मान- लक्षणा, प्रणय-लक्षणा, राग-लक्षणा, अनुराग-लक्षणा, भाव-लक्षणा और महाभाव-लक्षणा॥ 30-31॥ [दायाँ स्तम्भ] शान्त और दास्यरसमें भक्तिकी सीमा :— शान्त-भक्तेर रति बाड़े 'प्रेम' पर्यन्त। दास्य-भक्तेर रति हय 'राग'दशा-अन्त॥ 32॥ सख्य और वात्सल्य-रसमें भक्तिकी सीमा :— सखागणेर रति हय 'अनुराग' पर्यन्त। पितृ-मातृ-स्नेह आदि 'अनुराग'-अन्त॥ 33॥ मधुररसमें भक्तिकी सीमा :— कान्तागणेर रति पाय 'महाभाव'-सीमा। 'भक्ति'-शब्दे कहिलूँ एइ अर्थेर महिमा॥ 34॥ अनुवाद—शान्तरसके भक्तोंकी रति 'प्रेम' तक ही बढ़ती है। दास्यरसके भक्तोंकी रति 'राग'-दशा तक बढ़ती है। सखाओंकी रति 'अनुराग' तक बढ़ती है। पिता-माताका स्नेहादि 'अनुराग'की अन्तिम सीमा तक बढ़ता है। व्रजगोपियोंकी रति 'महाभाव' तक बढ़ती है। ये कुछ 'भक्ति'-शब्दके महिमामय अर्थ हैं॥ 32-34॥ (8) 'इत्थम्भूतगुण' (इत्थम्भूत + गुण) शब्दके अर्थकी व्याख्या :— 'इत्थम्भूतगुणः'-शब्देर शुनह व्याख्यान। 'इत्थम्भूत'-शब्देर भिन्न अर्थ, 'गुण'-शब्देर आन॥ 35॥ 'इत्थम्भूत'-शब्दका अर्थ :— 'इत्थम्भूत'-शब्देर अर्थ—पूर्णानन्दमय। याँर आगे ब्रह्मानन्द तृणप्राय हय॥ 36॥ अनुवाद—अब 'इत्थम्भूतगुणः' शब्दकी व्याख्या श्रवण करो। इसमेंसे 'इत्थम्भूत'-शब्दके अर्थ 'गुण'-शब्दके अर्थसे भिन्न हैं। 'इत्थम्भूत'-शब्दका अर्थ पूर्णानन्दमय है, जिसके आगे ब्रह्मानन्द तृणकी भाँति प्रतीत होता है॥ 35-36॥ हरिभक्तिसुधोदय (14/36)में— त्वत्साक्षात्कारणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य मे। सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो॥ 37॥ अनुवाद—हे जगद्गुरो! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार । 413

[ 24/37-45 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है, वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे जो गड़्ढा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है॥ ३७॥ अनुभाष्य-आदिलीला 7/98 संख्या देखें॥ ३७॥ अपने रूपमाधुर्यके द्वारा सभीको बलपूर्वक वशमें करनेवाले :- सर्वार्कषक, सर्वाह्वादक, महारसायन। आपनार बले करे सर्वविस्मरण॥ ३८॥ अनुवाद-पूर्णानन्दमय भगवान् सभीको आकर्षित करनेवाले, सभीको आनन्दित करनेवाले, महारसायन अर्थात् समस्त चिन्मय रसोंके आश्रय हैं। वे अपने बलसे सबके अन्य सभी सुखोंको भुला देनेवाले हैं॥ ३८॥ श्रीकृष्णकृपाके प्रभावसे कैतव-नाश :- भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-सुख छाड़य यार गन्धे। अलौकिक शक्ति-गुणे श्रीकृष्णकृपाय बान्धे॥ ३९॥ शास्त्रयुक्ति नाहि इँहा सिद्धान्त-विचार। एड स्वभाव-गुणे, याते माधुर्येर सार॥ ४०॥ अनुवाद-शुद्धभक्तिकी गन्धमात्रके प्रभावसे भुक्ति, मुक्ति और सिद्धिके सुखोंकी वासना दूर हो जाती है। शुद्धभक्त श्रीकृष्णकी अलौकिक शक्ति, गुणों और कृपासे बँध जाते हैं। शुद्धभक्तको शास्त्रयुक्ति और सिद्धान्तके विचारकी अपेक्षा नहीं होती, क्योंकि श्रीकृष्णका स्वाभाविक गुण ही माधुर्यका सार है॥ ३९-४०॥ 'गुण' शब्दके अर्थ; श्रीकृष्णके अनन्तगुणोंका अतुलनीय अमोघ प्रभाव :- 'गुण'-शब्देर अर्थ-कृष्णेर गुण अनन्त। सच्चिद्रूप-गुण सर्व-पूर्णानन्द॥ ४१॥ ऐश्वर्य-माधुर्य-कारुण्ये स्वरूप-पूर्णता। भक्तवात्सल्य, आत्मा पर्यन्त वदान्यता॥ ४२॥ अनुवाद-'गुण'-शब्दका तात्पर्य श्रीकृष्णके अनन्त गुणोंसे है। श्रीकृष्णके गुण नित्य और चिन्मय हैं और सभी गुण पूर्णानन्द-स्वरूप हैं। श्रीकृष्णके ऐश्वर्य, माधुर्य, कारुण्यादि चिन्मय गुण स्वरूपतः पूर्ण हैं। श्रीकृष्णका भक्त-वात्सल्य ऐसा है कि वे स्वयं तकको भी भक्तको दान करनेवाले दयालु हैं॥ ४१-४२॥ एक-एक गुण एक-एक विशेष भक्तको वशीभूत करनेवाला :- अलौकिक रूप, रस, सौरभादि गुण। कारो मन कोन गुणे करे आकर्षण॥ ४३॥ चरणकमलोंकी सुगन्धसे चतुःसनको और लीला-माधुर्यसे शुकदेवको आकर्षित करना :- सनकादिर मन हरिल सौरभादि गुणे। शुकदेवेर मन हरिल लीला-श्रवणे॥ ४४॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण अपने अलौकिक रूप, रस, सुगन्धादि गुणोंसे भक्तोंके मनको आकर्षित करते हैं। वे भक्त भिन्न-भिन्न रसोंमें स्थित होते हैं, इसलिये श्रीकृष्ण सर्वाकर्षक हैं। श्रीकृष्णने अपने श्रीचरणोंमें अर्पित तुलसीकी सुगन्धसे चतुःसनके (सनक, सनन्दन, सनातन ओर सनत्के) मनका हरण किया था। अपनी लीलाका श्रवण कराके उन्होंने शुकदेव गोस्वामीके मनका हरण किया था॥ ४३-४४॥ श्रीमद्भागवत (3/15/43)में- तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः॥ ४५॥ अनुवाद-उन कमल-नेत्र-भगवान्‌के पदकमलोंकी पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि

414 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/45-49 ] चार कुमारोंकी नासिकाके छिद्रके माध्यमसे अन्दर जाकर निर्विशेष-ब्रह्मपरायण उनके चित्त और देहमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया था॥45॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 17/142 संख्या देखें॥45॥ श्रीमद्भागवत (2/1/9)में— परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्ये उत्तमःश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान्॥ 46॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 46॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे राजर्षे! निर्गुण ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होनेपर भी श्रीकृष्णलीलाके प्रति आकर्षित होकर मैंने श्रीमद्भागवतका पाठ किया था॥46॥ अनुभाष्य—'मुमूर्षु (मरणासन्न) व्यक्तिके लिये क्या करना उचित है?' परीक्षितके इस प्रश्नका आदर करते हुए श्रील शुकदेव श्रीहरिकीर्तन और हरिकथा कीर्तनमय श्रीमद्भागवतके माहात्म्यका वर्णन करके श्रीहरिके गुणोंके प्रभावका वर्णन कर रहे हैं— हे राजर्षे, नैर्गुण्ये (निर्गुणे ब्रह्मणि) परिनिष्ठितः (स्थितधीः) अपि [अहं वैयासकिः] उत्तमःश्लोकलीलया (कृष्णमाधुर्य्येण) गृहीतचेताः (आकृष्टचित्तः सन्) यत् आख्यानं (भागवताख्यम्) अधीतवान्, [तदहं तेऽभिधास्यामीति परेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें, [इसका अगले श्लोकके 'तदहं तेऽभिधास्यामि'के साथ अन्वय करें।]॥ 46॥ अङ्गमाधुर्यके द्वारा गोपियोंका और रूप-गुण-माधुर्यसे रुक्मिणीके मनका हरण :— श्रीअङ्ग-रूपे हरे गोपिकार मन। रूप-गुण-श्रवणे रुक्मण्यादिर आकर्षण॥ 47॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण अपने अङ्गोंके रूप-सौन्दर्यसे गोपियोंके मनको हरण करते हैं। श्रीकृष्णके रूप और गुणोंके विषयमें सुनकर रुक्मिणी आदि द्वारकाकी महिषियोंका मन उनके प्रति आकर्षित हो गया॥ 47॥ श्रीकृष्णके अङ्ग, मुख और हास्यके माधुर्यसे मुग्ध गोपियोंके द्वारा आत्मनिवेदन :— श्रीमद्भागवत (10/29/39)में— वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्। दत्ताभयञ्च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणंञ्च भवाम दास्यः॥ 48॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 48॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे कृष्ण! आपका अलकाओंसे आवृत मुख, कपोलोंपर कुण्डलोंकी शोभा, अमृतयुक्त अधरपर मन्द हास्यके साथमें देखना, अभय प्रदान करनेवाली दो भुजाएँ और एकमात्र श्रीके द्वारा शोभित वक्षको देखकर ही हम आपकी दासी बनी हैं॥ 48॥ अनुभाष्य—पूर्णिमाकी चाँदनीमें स्नान की हुई शारदीय रात्रिमें श्रीकृष्णकी वंशी-ध्वनिसे पूर्ण आकृष्ट होकर गोपवधुएँ मोहित होकर श्रीकृष्णके समीप उपस्थित हुई, श्रीकृष्णने उनके अनुरागको और भी अधिक वर्धित करनेके लिये उन्हें घर लौट जानेके लिये कहा, तब अपने प्राणोंको श्रीकृष्णमें समर्पित कर देनेवाली गोपियाँ दुःखित होकर रुद्धकण्ठसे गद्गद वचनोंसे श्रीकृष्णसे कह रही हैं,— [हे पुरुषभूषण,] तव अलकावृतमुखं (केशदामैः आवृतमुखं) कुण्डलश्रीमण्डस्थलाधरसुधं (कुण्डलयोः श्रीर्ययो ते गण्डस्थले यस्मिन् अधरे सुधा यस्मिन् तच्च मुखं) हसितावलोकं (हसितेन सह अवलोकं यस्मिन् तच्च मुखं) वीक्ष्य (दृष्ट्वा) दत्ताभयं (दत्तम् अभयं येन तत्) भुजदण्डयुगं (बाहुद्वयं) श्रियैकरमणं (श्रियाः लक्ष्मयाः एकं मुख्यं एव रमणं रतिजनकं तत्) वक्षः च विलोक्य वयं दास्यः एव भवाम। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 48॥ श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट रुक्मिणीका आत्मनिवेदन :— श्रीमद्भागवत (10/52/37)में— श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्। रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे॥ 49॥ । 415

[ 24/49-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥49॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भुवनसुन्दर! तुम्हारे गुणसमूह श्रवण करनेवाले व्यक्तियोंके कानोंके छिद्रोंमें प्रविष्ट होकर उनके अङ्गोंके तापका नाश करते हैं। नेत्रधारी व्यक्तिको तुम्हारे रूपके दर्शनसे समस्त पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। हे अच्युत, तुम्हारे उन्हीं समस्त गुणोंको श्रवण करके मेरा चित्त निर्लज्ज होकर आपमें प्रवेश कर रहा है॥49॥ अनुभाष्य-परीक्षितके प्रश्नके उत्तरमें श्रीशुक भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्मक-कन्या महालक्ष्मी-स्वरूपिणी श्रीमती रुक्मिणीके परिणयके वृत्तान्तका वर्णन कर रहे हैं। लोगोंके मुखसे श्रीकृष्णके सद्गुणोंका श्रवण करके मन-ही-मनमें उन्हें अपने पतिरूपमें वरण करनेपर भी श्रीकृष्णद्वेषी ज्येष्ठ भ्राता रुक्मी चेदि-नरेश शिशुपालको उनका वर बनाना चाहता है, ऐसा सुनकर रुक्मिणीने निर्जनमें एक प्रेमपत्र लिखकर उसे एक विश्वसनीय ब्राह्मणको देकर तुरन्त श्रीकृष्णके पास भेजा। ब्राह्मणके द्वारकामें उपस्थित होनेपर श्रीकृष्णने उनका यथाविधि सत्कार किया। उसके बाद श्रीकृष्णसे अनुमति लेकर वे ब्राह्मण रुक्मिणीके उस प्रेमपत्रको पढ़ने लगे- हे अच्युत, हे भुवनसुन्दर, शृण्वतां (श्रोतृवर्गाणां) कर्णविवरैः (अन्तः प्रविश्य) अङ्गतपं हरतः ते (तव) गुणान्, दृशिमतां (चक्षुष्मतां) दृशां (चक्षुषाम्) अखिलार्थलाभं (सर्वसारार्थप्रदं) रूपं च श्रुत्वा मे (मम) चित्तम् अपत्रपं (अपगता त्रपा यस्मात् तत्, लज्जाविहीनं सत्) त्वयि आविशति (आसज्जते, अनुसन्धान-राहित्येन मग्नं भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥49॥ वंशीगानसे श्रीनारायणी लक्ष्मीको और वेणु और विग्रहके माधुर्यसे समस्त कान्ताओंको आकर्षित करना :- वंशी-गीते हरे कृष्ण लक्ष्म्यादिर मन। योग्यभावे जगतेर यत युवतीर गण॥50॥ अनुवाद-अपनी वंशीके गानसे श्रीकृष्ण लक्ष्मी आदिके मनको हरण करते हैं। श्रीकृष्ण न केवल गोपियों और लक्ष्मियोंके चित्तको हरण करते हैं, अपितु त्रिभुवनकी समस्त कान्ताओंको आकर्षित करते हैं॥50॥ श्रीमद्भागवत (10/16/36)में- कस्यान्‌नुभावोऽस्य न देव विद्महे तवाङ्घ्रिरेणुस्पर्शवाधिकारः। यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाऽचरत्तपो विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता॥51॥ अनुवाद-हे देव! जिनकी चरणरजको प्राप्त करनेकी वासनासे लक्ष्मीने बहुत समय तक समस्त प्रकारके विषय-भोगोंका परित्याग करके दृढ़व्रत धारण करके तपस्या की थी, उस चरणरजको इस कालिय-नागने किस सुकृतिके द्वारा लाभ करनेका अधिकार प्राप्त किया, उसे हम नहीं जानतीं॥51॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/146 संख्या देखें॥51॥ श्रीमद्भागवत (10/29/40)- का स्त्र्यङ्ग ते कलपदामृतवेणुगीत- सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत् त्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदञ्च निरीक्ष्य रूपं यद्गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन्॥52॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥52॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कृष्ण! तुम्हारे अमृतमय वेणुगीतके द्वारा सम्मोहित होकर त्रिभुवनमें कौन-सी स्त्री आर्यचरितसे (धर्मसे) विचलित नहीं होती? त्रिभुवनके सौभाग्य-स्वरूप तुम्हारे इस रूपको देखकर समस्त गैयाएँ, पक्षी, वृक्ष और हिरण भी पुलक-धारण किया करते हैं॥52॥ अनुभाष्य-चाँदनीसे आप्लावित शारदीय-रात्रिमें श्रीकृष्णकी मुरलीकी ध्वनिसे आकृष्ट गोपियोंके मोहित होकर श्रीकृष्णके निकट उपस्थित होनेपर श्रीकृष्णने उनके अनुरागको और भी वर्धित करनेके अभिप्रायसे उन्हें अपने-अपने घर लौट जानेके लिये कहा, तब 416 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/52-57 ] श्रीकृष्णमें समर्पित चित्तवाली गोपियाँ दुःखित होकर रुद्धकण्ठसे गद्गद वाक्योंसे श्रीकृष्णसे कह रही हैं,— हे अङ्ग (कृष्ण), त्रिलोक्यां (त्रिभुवनमध्ये) का सा स्त्री (नारी गोपीत्यर्थः),—या ते (तव) कलपदामृतवेणुगीत-सम्मोहिता (कलानि मधुराणि पदानि यस्मिन् तत् च अमृतं तन्मयम् एव वेणुगीतं तेन, कलपदायतमूर्च्छितेनेति पाठे—कलानि पदानि यस्मिन् तत् आयतं दीर्घं मूर्च्छितं स्वरालापभेदः तेन सम्मोहिता आकृष्टहृदया सती) त्रैलोक्यसौभगं (त्रैलोक्यस्य ऊर्ध्वाधोमध्यवर्त्तमानस्र्य यावल्लोकस्य सौभगं मनोहरं तव सुन्दरम्) इदं रूपञ्च—यत् गोद्विज-द्रुममृगाः (सर्वे स्थावर-जङ्गमजीवाः) पुलकानि अविभ्रन् (अविभरुः), तत्—निरीक्ष्य (दृष्ट्वा) आर्य्यचरितात् (निज-निजविधिधर्मात्) न चलेत् (भ्रश्येत्)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। ‘कलपदामृत’—इस पाठके स्थानपर ‘कलपदायत’ पाठ भी देखा जाता है। हे प्रिय श्रीकृष्ण ! इन तीनों लोकोंमें ऐसी कौन-सी स्त्री है जो तुम्हारी कलपद और आयत अर्थात् मधुर वंशीध्वनिको सुनकर मोहित न हो जाय? इस अर्थमें कलपदायत। आयत अर्थात् दीर्घमूर्च्छना (स्वरालापका भेद) ॥ 52 ॥ वात्सल्यरसमें मातृगणको और सख्य-दास्यादि-रसमें पुरुषरूपी सखाओं और दासोंको आकर्षित करना :- गुरुतुल्य स्त्रीगणेरे वात्सल्ये आकर्षण। दास्य-सख्यादि-भावे पुरुषादि गण ॥ 53 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण मातृ-तुल्य स्त्रियोंको वात्सल्यके द्वारा आकर्षित करते हैं और दास्य-सख्यादि-भावसे पुरुषोंको आकर्षित करते हैं ॥ 53 ॥ शान्तरसमें धाममें स्थित समस्त स्थावर-जङ्गमको आकर्षित करना :- पक्षी, मृग, वृक्ष, लता, चेतनाचेतन। प्रेमे मत्त करि’ आकर्षये कृष्णगुण ॥ 54 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके गुण पक्षियों, हिरणों, वृक्षों, लताओं और चेतन-अचेतन सभी जीवोंको प्रेममें मत्त करके आकर्षित कर लेते हैं ॥ 54 ॥ (9) 'हरि'-शब्दके अर्थ; दो प्रकारका हरण— (क) गौण और (ख) मुख्य लक्षण :— ‘हरि:’-शब्दे नानार्थ, दुइ मुख्यतम। सर्व अमङ्गल हरे, प्रेम दिया हरे मन ॥ 55 ॥ अनुवाद—यद्यपि 'हरि'-शब्दके अनेक अर्थ हैं, तथापि उनमेंसे दो मुख्यतम हैं—(1) जो सभीके अमङ्गलका हरण करनेवाले हैं और (2) जो प्रेम-प्रदान करके मनका हरण करनेवाले हैं ॥ 55 ॥ (1) जीवके आवरण-रूपी अनर्थको हरनेका गुण— (क) समस्त प्रकारके तापोंका विनाश :— यैछे तैछे योहि कोहि करये स्मरण। चारिविध ताप तार करे संहरण ॥ 56 ॥ अनुवाद—जिस किसी प्रकारसे जो कोई भी श्रीहरिका स्मरण करता है, श्रीहरि उसके चार प्रकारके तापोंको सम्पूर्ण रूपसे हरण कर लेते हैं ॥ 56 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘चारिविध ताप’—चार प्रकारके पातकोंके (पापोंके) ताप—(1) पातक (पाप), (2) उरुपातक (बहुत बड़ा पाप), (3) महापातक (उरुपातकसे भी बड़ा पाप), (4) अतिपातक (सबसे बड़ा पाप) ॥ 56 ॥ श्रीकृष्णभक्ति—पाप, पापबीज और अविद्या, इन तीन प्रकारके क्लेशोंका अन्त करनेवाली :— श्रीमद्भागवत (11/14/19) में— यथाग्निः सुसमृद्धार्च्चिः करोत्येधांसि भस्मसात्। तथा मद्विषया भक्तिरुद्धवैनांसि कृत्स्नशः ॥ 57 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 57 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे उद्धव ! प्रज्ज्वलित अग्नि जैसे लकड़ीके ढेरको जलाकर भस्म बना देती है, वैसे ही मेरी भक्ति भी जीवोंके सब प्रकारके [प्रारब्ध- अप्रारब्ध] पापोंको सम्पूर्णरूपसे नष्ट कर देती है ॥ 57 ॥ अनुभाष्य—सब प्रकारके कल्याणके साधनोंमें श्रेष्ठ भक्तियोगके सम्बन्धमें और भी अधिक जाननेकी इच्छा । 417

[ 24/57–64 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करनेपर भगवान् श्रीउद्धवसे कह रहे हैं, - हे उद्धव, यथा सुसमृद्धाचिः (सुसमृद्धा अर्चिः यस्य सः) अग्निः एधांसि (काष्ठानि) भस्मसात् करोति (विनाशयति), तथा मद्विषया भक्तिः कृत्स्नशः (सर्वाणि) एनांसि (पापानि-प्रारब्धाप्रारब्धानि च विधुनोति)। श्लोक-भावानुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 57 ॥ (ख) अज्ञान और अविद्याका विनाश; तब श्रीकृष्णकी प्रसन्नताकी कामनासे श्रवण-कीर्तनादि शुद्ध-चित्तमें स्वयं प्रकाशित नित्यसिद्ध श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- तबे करे भक्तिबाधक कर्म-अविद्या-नाश। श्रवणाद्येर फल 'प्रेमा' करये प्रकाश ॥ 58 ॥ अनुवाद - तब श्रीकृष्ण भक्तिमें बाधा देनेवाले कर्मों और अविद्याका नाश करते हैं तथा श्रवणादिके फल 'प्रेम' को प्रकाशित कर देते हैं ॥ 58 ॥ (2) अनावृत शुद्ध जीवके स्वरूपको प्रेमसे आकर्षण :- निज-गुणे तबे हरे देहेन्द्रिय मन। ऐछे कृपालु कृष्ण, ऐछे ताँर गुण ॥ 59 ॥ अनुवाद - तब श्रीकृष्ण अपने गुणोंके द्वारा भक्तके देह, इन्द्रियों और मनका हरण कर लेते हैं। श्रीकृष्ण ऐसे कृपामय हैं, ऐसे उनके अद्भुत गुण हैं ॥ 59 ॥ हरि अथवा हरिप्रेम चतुर्वर्ग-धिक्कारी और सभीके चित्तको हरण करनेवाला :- चारि पुरुषार्थ छाड़ाय, हरे सबार मन। 'हरि'-शब्देर एइ मुख्य कहिलुँ लक्षण ॥ 60 ॥ अनुवाद - श्रीकृष्ण धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी चारों पुरुषार्थोंको छुड़ाकर सबके मनका हरण करते हैं। इस प्रकार मैंने तुम्हें 'हरि'-शब्दके मुख्य लक्षणको बतलाया ॥ 60 ॥ अनुभाष्य - भगवान् श्रीहरि जीवोंके धर्म, अर्थ, काम और मोक्षात्मक चार पुरुषार्थोंको प्राप्त करनेकी पिपासाको छुड़ा देते हैं और सभीके मनका हरण करके अपने प्रेमके प्रति आकृष्ट करते हैं ॥ 60 ॥ (10) च-शब्द और (11) अपि-शब्दके अर्थ :- 'अपि' 'च', दुइ शब्द ताते 'अव्यय' हय। येइ अर्थ लागाइये, सेइ अर्थ हय ॥ 61 ॥ च-शब्दके सात और अपि-शब्दके सात अर्थ :- तथापि च-कारेरे कहे मुख्य अर्थ सात। अपि-शब्दे मुख्य अर्थ सात विख्यात ॥ 62 ॥ अनुवाद - 'च' और 'अपि'-इस श्लोकमें ये दो शब्द 'अव्यय' हैं। यद्यपि इन दोनोंके द्वारा श्लोकका जो जैसा अर्थ करना चाहता है, श्लोकका वैसा अर्थ हो जाता है। तथापि च-कार (शब्द) के सात मुख्य अर्थ हैं और 'अपि'-शब्दके भी सात प्रसिद्ध मुख्य अर्थ हैं ॥ 61-62 ॥ च-शब्दका प्रयोगस्थल; प्रमाण :- विश्वप्रकाशमें- चान्वाचये समाहारेऽन्योऽन्यार्थे च समुच्चये। यत्नान्तरे तथा पादपूरणेऽप्यवधारणे ॥ 63 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - अन्वाचयमें अर्थात् अनुगम्य-समूहके (पीछे चलनेवालेके) अर्थमें, समाहारमें (समूहमें), अन्य-अन्य अर्थमें, समुच्चयमें (सामूहिकमें), यत्नान्तरमें (दूसरे यत्नमें), पादपूर्णमें (श्लोकको पूर्ण करनेमें) और अवधारणमें अर्थात् निश्चयके अर्थमें 'च'-शब्दका प्रयोग होता है ॥ 63 ॥ अपि-शब्दका प्रयोगस्थल, प्रमाण :- विश्वप्रकाशमें- अपि सम्भावना-प्रश्न-शङ्का-गर्हा समुच्चये। तथा युक्तपदार्थेषु कामचारक्रियासु च ॥ 64 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 64 ॥ 418 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/64-70 ]

अमृतप्रवाह भाष्य—'अपि' शब्द सम्भावना, प्रश्न, शङ्का, गर्हा (निन्दा या दुर्वचन कहना), समुच्चय (सामूहिक), युक्त-पदार्थ (यथोचित प्रयोग), कामचार (उच्छृङ्खलता)-क्रियामें व्यवहार होता है॥64॥

यहाँ तक पदोंके अर्थ निर्णीत; अब उनके द्वारा श्लोकके अर्थोंका निर्णय :- एइ त' एकादश पदेर अर्थ-निर्णय। एबे श्लोकार्थ करि, यथा ये लागय॥65॥

अनुवाद—इस प्रकार मैंने इस श्लोकके ग्यारह पदोंके अर्थ बतलाये हैं। अब पदोंके यथायोग्य अर्थोंका प्रयोग करके मैं सम्पूर्ण श्लोकके अर्थका वर्णन करता हूँ॥65॥

सर्वप्रथम 'आत्माराम'-पदके अन्तर्गत 'आत्मा'-शब्दकी (1) 'ब्रह्म'-अर्थके द्वारा व्याख्या :- 'ब्रह्म'-शब्देर अर्थ-तत्त्व सर्व-बृहत्तम। स्वरूप-ऐश्वर्य करि' नाहि याँर सम॥66॥

अनुवाद—'ब्रह्म'-शब्दका अर्थ—जो 'सबसे बृहत्तम (बड़ा) तत्त्व' है। जिनके स्वरूप और ऐश्वर्यके समान किसी अन्यका स्वरूप और ऐश्वर्य नहीं है॥66॥

ब्रह्मकी संज्ञा; शास्त्र-प्रमाण :- विष्णुपुराण (1/12/57)में— बृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च तद्ब्रह्म परमं विदुः। तस्मै नमस्ते सर्वात्मन् योगिचिन्ताविकारी यत्॥67॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥

अमृतप्रवाह भाष्य—बृहत्त्व (सर्वव्यापकता) होनेके कारण, बृंहणत्व अर्थात् वृद्धिकारकत्व (सम्वर्धक और पोषक) होनेके कारण उस तत्त्वको 'परमब्रह्म' कहते हैं। हे सर्वात्मन्, योगिचिन्ताविकारी (विद्वानोंको मोहित करनेवाले) जो आप हैं, आपको प्रणाम है॥67॥

अनुभाष्य— [बुधाः] बृहत्त्वाद् (सर्वव्यापकत्वात्) बृंहणत्वाच्च (सम्वर्द्धकत्वात्, पोषकत्वात् वा) तत् परं ब्रह्म विदुः (जानन्ति); हे सर्वात्मन्, ते (तव) यत् योगिचिन्ताविकारी (सूरिजनमोहनं स्वरूपं) तस्मैः नमः।

श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥

आत्मा-शब्दका सर्वव्यापक-तत्त्व ही ब्रह्मतत्त्व :- श्रीमद्भागवत (11/2/45) श्लोककी व्याख्यामें श्रीधरस्वामि-उद्धृत तन्त्र-वाक्य— आततत्वाच्च मातृत्वादात्मा हि परमो हरिः॥68॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥68॥

अमृतप्रवाह भाष्य—सर्वव्यापक और सबकी सृष्टि करनेवाले होनेके कारण हरि ही परमात्मा हैं॥68॥

अनुभाष्य— आततत्त्वात् (सर्वव्यापकत्वात्) मातृत्वात् (सर्वप्रसवितृत्वात्) च हरिः हिः परमः आत्मा।

श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥68॥

'ब्रह्म'-शब्दकी अभिधा-वृत्तिसे पूर्ण-प्रतीतिमय भगवान् :- सेइ 'ब्रह्म'-शब्दे कहे स्वयं भगवान्। अद्वितीय-ज्ञान, याँहा बिना नाहि आन॥69॥

अनुवाद—उस 'ब्रह्म'-शब्दका अर्थ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण है। उनके अतिरिक्त अद्वितीय-ज्ञान [अर्थात् सजातीय-विजातीय-स्वगत भेदरहित अद्वय-ज्ञान; आदिलीला 2/11की अमृताणुकणिका टीका देखें] अन्य किसीमें भी नहीं है॥69॥

शास्त्र-प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (1/2/11)में— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥70॥

अनुवाद—तत्त्वको जाननेवाले विज्ञगण अद्वयज्ञानको तत्त्व कहते हैं। उसी अद्वयज्ञानकी प्रथम प्रतीति ब्रह्म, द्वितीय प्रतीति परमात्मा और तृतीय प्रतीति भगवान् हैं॥70॥

। 419

[ 24/70-79 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य-आदिलीला 2/11 संख्या देखें ॥ 70 ॥ श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान् और त्रिकालसत्य वस्तु :- सेइ अद्वयतत्त्व कृष्ण-स्वयं भगवान्। तिनकाले सत्य तिँहो-शास्त्र-प्रमाण ॥ 71 ॥ अनुवाद-वे अद्वय-तत्त्व श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान-इन तीनों कालोंमें सत्य हैं, इस विषयमें शास्त्र ही प्रमाण है ॥ 71 ॥ सृष्टिसे पहले और बादमें श्रीकृष्णका नित्य अधिष्ठान :- श्रीमद्भागवत (2/9/32)में- अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत् सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत् सोऽस्म्यहम् ॥ 72 ॥ अनुवाद-इस जगत्की सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत् और अनिर्वचनीय निर्विशेष ब्रह्म तक कुछ भी मुझसे पृथक् रूपसे नहीं था। सृष्टि होनेके बाद इस सम्पूर्ण-स्वरूपमें मैं ही हूँ और सृष्टिकी प्रलय होनेके बाद भी एकमात्र मैं ही अवशिष्ट रहूँगा ॥ 72 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/53 संख्या देखें ॥ 72 ॥ आत्मा-शब्दका अर्थ विभु श्रीकृष्ण :- 'आत्मा'-शब्दे कहे कृष्ण बृहत्त्वस्वरूप। सर्वव्यापक, सर्वसाक्षी, परमस्वरूप ॥ 73 ॥ अनुवाद-'आत्मा'-शब्दसे श्रीकृष्णका बृहत्-स्वरूप कहा गया है। वे सर्वव्यापक, सबके साक्षी और परम स्वरूपसे युक्त हैं ॥ 73 ॥ श्रीमद्भागवत (11/2/45) श्लोककी व्याख्यामें श्रीधरस्वामि-उद्धृत तन्त्र-वचन :- आततत्वाच्च मातृत्वादात्मा हि परमो हरिः ॥ 74 ॥ अनुवाद-सर्वव्यापक और सबकी सृष्टि करनेवाले होनेके कारण हरि ही परमात्मा हैं ॥ 74 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/68 संख्या देखें ॥ 74 ॥ तीन प्रकारके अभिधेयमें श्रीकृष्णकी तीन प्रकारकी प्रतीति-ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् :- सेइ कृष्णप्राप्ति-हेतु त्रिविध 'साधन'। ज्ञान, योग, भक्ति,-तिनेर पृथक् लक्षण ॥ 75 ॥ तिन साधने भगवान् तिन स्वरूपे भासे। ब्रह्म, परमात्मा, भगवान्-त्रिविध-प्रकाशे ॥ 76 ॥ अनुवाद-ज्ञान, योग और भक्ति-ये तीन प्रकारके 'साधन' उन श्रीकृष्णकी प्राप्तिके कारण स्वरूप हैं और तीनोंके अलग-अलग लक्षण हैं। भगवान् इन तीन प्रकारके साधनोंके अनुरूप ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्-इन तीन रूपोंमें प्रकाशित होते हैं ॥ 75-76 ॥ श्रीमद्भागवत (1/2/11)में- वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ 77 ॥ अनुवाद-तत्त्वको जाननेवाले विज्ञगण अद्वयज्ञानको तत्त्व कहते हैं। उसी अद्वयज्ञानकी प्रथम प्रतीति ब्रह्म, द्वितीय प्रतीति परमात्मा और तृतीय प्रतीति भगवान् हैं ॥ 77 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/11 संख्या देखें ॥ 77 ॥ 'ब्रह्म-आत्मा'-शब्दे यदि कृष्णेरे कहय। 'रूढ़ि-वृत्त्ये' निर्विशेष अन्तर्यामी कय ॥ 78 ॥ अनुवाद-यद्यपि 'ब्रह्म' और 'आत्मा'-शब्द श्रीकृष्णको ही सूचित करते हैं, तथापि रूढ़िवृत्तिसे (प्रत्यक्षरूपसे) इन शब्दोंका अर्थ क्रमशः निर्विशेष ब्रह्म और अन्तर्यामी (परमात्मा) सूचित होता है ॥ 78 ॥ ज्ञानमार्गमें चिन्मात्र ब्रह्म, योगमार्गमें सचिन्मय परमात्म-प्रतीति :- ज्ञानमार्गे-निर्विशेष-ब्रह्म प्रकाशे। योगमार्गे-अन्तर्यामि-स्वरूपेते भासे ॥ 79 ॥ अनुवाद-अद्वयज्ञान श्रीकृष्ण ज्ञानमार्गके साधकोंके 420 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/79-84 ]

लिये निर्विशेष-ब्रह्मके रूपमें और योगमार्गके साधकोंके समक्ष अन्तर्यामी-परमात्माके स्वरूपमें ही प्रकाशित होते हैं॥ 79॥

दो प्रकारकी भक्ति (रागमयी और वैधी)के द्वारा दो प्रकारके भगवद्-स्वरूप (स्वयं श्रीकृष्ण और उनके प्रकाश)की प्राप्ति :- रागभक्ति, विधिभक्ति हय दुइरूप। 'स्वयं-भगवत्ता', 'प्रकाश'-दुइत' स्वरूप ॥ 80 ॥

रागानुगा-भक्तिकी सिद्धि होनेपर व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन, वैधीभक्तिकी सिद्धि होनेपर वैकुण्ठमें श्रीनारायणका दास्य :- रागभक्त्ये व्रजे स्वयं-भगवाने पाय। विधिभक्त्ये पार्षददेहे वैकुण्ठके याय ॥ 81 ॥

अनुवाद - भक्ति दो प्रकारकी होती है-रागभक्ति और वैधीभक्ति। रागभक्तिके द्वारा साधक 'स्वयं-भगवान्' और वैधीभक्तिके द्वारा साधक 'भगवद्-प्रकाश' - इन दो स्वरूपोंको प्राप्त करते हैं। रागभक्तिके पालनसे साधकको व्रजमें स्वयं-भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है। वैधीभक्तिके पालनसे साधक पार्षद-देह प्राप्त करके वैकुण्ठमें जाता है॥ 80-81॥

श्रीमद्भागवत (10/9/21) में- नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः। ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥ 82 ॥

अनुवाद-यशोदानन्दन भगवान् श्रीकृष्ण भक्तिमान् देहधारियोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, आत्मभूत ज्ञानियोंके लिये वैसे नहीं हैं॥ 82 ॥

अनुभाष्य-मध्यलीला 8/227 संख्या देखें ॥ 82 ॥

श्रीमद्भागवत (3/15/25)में- यच्च व्रजन्त्यनिमिषामृषभानुवृत्त्या दूरे-यमा ह्युपरि नः स्पृहणीयशीलाः। भर्तुर्मिथः सुयशसः कथनानुराग- वैक्लव्यवाष्पकलया पुलकीकृताङ्गाः ॥ 83 ॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 83 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य-परस्पर श्रीकृष्णकथाके वर्णनमें जिनके अनुरागसे विवश होकर अश्रु बहते हैं और अङ्ग पुलकित हो जाते हैं, वे देवादिदेव (देवोंके भी आदि देव) श्रीकृष्णका अनुसरण करते हुए यम-नियमादिको दूर फेंककर स्पृहाशील होकर हमारे (सत्यलोकके) ऊपर स्थित वैकुण्ठमें गमन करते हैं॥ 83 ॥

अनुभाष्य-व्यास-सखा श्रीमैत्रेय ऋषि श्रीविदुरको दितिके गर्भसे भयभीत देवताओंके निकट ब्रह्माके द्वारा दितिके गर्भमें स्थित दो असुरोंके पूर्व-वृत्तान्तको बतलाते हुए चतुःसनादिके वैकुण्ठ-गमनके उपाख्यानके वर्णनके प्रसङ्गमें वैकुण्ठके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं,-

अनिमिषां (कालानधीनानां देवानाम्) ऋषभानुवृत्त्या (ऋषभस्य श्रेष्ठस्य श्रीहरेः अनुवृत्त्या अनुसरणेन) दूरे-यमाः (दूरे यमः येषां ते, यद्वा, दूरीकृतयमनियमाः) स्पृहणीयशीलाः (स्पृहणीयं कारुण्यादि शीलं येषां ते) भर्तुः (हरेः) सुयशसः (सुमङ्गल- लीलागुणस्य) मिथः (परस्परं) कथानुरागवैक्लव्यवाष्पकलया (कथने वर्णने यः अनुरागः, तेन वैक्लव्य वैवश्यः तेन वाष्पकला अश्रुबिन्दुः तया सह) पुलकीकृताङ्गाः (पुलकीकृतं रोमाञ्चितम् अङ्गं येषां ते तथाभूताः) च नः (अस्माकम्) उपरि (उपरिस्थितं) यत् च [वैकुण्ठं] व्रजन्ति (गच्छन्ति) [तत् विकुण्ठमुपेत्य मुनयः परां मुदमापुरिति परेणान्वयः]।

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [इस श्लोकका अगले श्लोकके तीसरे और चौथे चरणके साथ अन्वय करें।]॥ 83 ॥

तीन प्रकारके उपासक :- सेइ उपासक हय त्रिविध प्रकार। अकाम, मोक्षकाम, सर्वकाम आर ॥ 84 ॥

अनुवाद-वे उपासक (साधक) भी तीन प्रकारके होते हैं-अकाम (सभी प्रकारकी स्वसुख कामनाओंसे रहित), मोक्षकाम (मोक्षकी कामनासे युक्त) और सर्वकाम (सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त) ॥ 84 ॥

। 421

[ 24/85-89 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीमद्भागवत (2/3/10)में— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥ 85॥ अनुवाद—पहले कोई 'अकाम' अर्थात् सर्वकामनाओंसे रहित हो अथवा 'सर्वकाम' अर्थात् सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्षकी कामना करनेवाला ही क्यों न हो, उदार-बुद्धि होने मात्रसे ही मनुष्य तीव्र शुद्धभक्तियोगसे परमपुरुष श्रीकृष्णका भजन करेंगे॥ 85॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/36 संख्या देखें ॥ 85 ॥ 'उदारधी' शब्दका अर्थ :— बुद्धिमान्—अर्थे—यदि विचारज्ञ हय। निज-काम लागिह तबे कृष्णेरे भजय ॥ 86 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 86 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस श्लोकमें यदि कोई उदारधी अर्थात् बुद्धिमान् अर्थात् विचारवान् हो, तो वह कामना-वासनाके रहनेपर भी श्रीकृष्णका ही भजन करेगा ॥ 86 ॥ सब प्रकारके साधन ही भक्ति-सापेक्ष, भक्ति ही केवल निरपेक्ष :— भक्ति बिना कोन साधन दिते नारे फल। सब फल देय भक्ति स्वतन्त्र प्रबल ॥ 87 ॥ अनुवाद—भक्तिके बिना कोई भी साधन फल प्रदान नहीं कर सकता, किन्तु भक्ति अन्यान्य साधनोंकी अपेक्षासे रहित स्वतन्त्र और बहुत अधिक बलशाली है॥ 87 ॥ भक्तिके आश्रयके बिना अन्य साधन, सभी निष्फल :— अजागलस्तन-न्याय अन्य साधन। अतएव हरि भजे बुद्धिमान् जन ॥ 88 ॥ अनुवाद—जिस प्रकार बकरेके गलेके पास लटकते स्तन (मांसके पिण्ड) दूध देनेमें असमर्थ होते हैं, उसी प्रकार भक्तिके अतिरिक्त अन्य समस्त साधन भी किसी फलको प्रदान करनेमें समर्थ नहीं हैं। इसलिये बुद्धिमान व्यक्ति भगवान् श्रीहरिका ही भजन करते हैं ॥ 88 ॥ अनुभाष्य—भक्तिके अतिरिक्त अन्य प्रकारके साधन पूर्णतया निष्फल हैं, वे कभी भी फल प्रदान नहीं कर सकते। क्योंकि बकरेके गलेमें लटके हुए स्तन जिस प्रकार दूध नहीं दे सकते, केवलमात्र अनभिज्ञ लोगोंके झूठे भ्रमका ही विषय होते हैं, उसी प्रकार भक्तिके अतिरिक्त ज्ञान और कर्मके साधनका कोई फल नहीं होता॥ 88 ॥ भोगकामी और मोक्षकामीके भेदसे चार प्रकारके अनर्थयुक्त सुकृतिवान् लोग; वैसा होनेपर भी ये चार प्रकारकी कामनाएँ निष्काम भक्तिका कारण नहीं :— श्रीमद्भगवद्गीता (7/16)में— चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ 89 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 89 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अर्जुन! आर्त्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी—ये चार प्रकारके लोग भक्ति- उन्मुखी सुकृतिवान् होनेपर, उन-उन कामनाओंका परित्याग करके मेरा भजन करते हैं ॥ 89 ॥ अनुभाष्य— हे अर्जुन, हे भरतर्षभ, सुकृतिनः (वर्णाश्रमाचारलक्षण-धर्मपराः) जनाः मां भजन्ते; ते च चतुर्विधाः—आर्त्तः (क्लिष्टः आपद्ग्रस्तः— गजेन्द्रादिः), जिज्ञासुः (आत्मस्वरूपज्ञानेच्छुः—शौनकादिः), अर्थार्थी (सुखसम्पदिच्छुः ध्रुवादि,—एते सकामाः), ज्ञानी (लब्ध-बोधः— शुकादिः, अयं तु निष्कामः) च। श्लोक-भावानुवाद—हे अर्जुन, हे भरतर्षभ, सुकृतिवान् अर्थात् वर्णाश्रम-धर्मपरायण लोग मेरा भजन करते हैं; वे चार प्रकारके होते हैं—आर्त्ति (दुःखी या विपदाग्रस्त—गजेन्द्रादि), जिज्ञासु (आत्मस्वरूपको जाननेके इच्छुक—शौनकादि), अर्थार्थी (सुख-सम्पत्तिके इच्छुक— ध्रुवादि) और ज्ञानी (ज्ञान-प्राप्त—शुकदेवादि, ये निष्काम होते हैं) ॥ 89 ॥ 422 ।