श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1855, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय कथासार-श्रीसनातनकी प्रार्थनाके अनुसार महाप्रभुने “आत्मारामश्च मुनयः” इस श्लोकके 61 प्रकारके अर्थ किये। पृथक्-पृथक् पदोंकी व्याख्या करते हुए ‘च’ और ‘अपि’—इन दो शब्दोंके अर्थोंके संयोगसे ये सब अर्थ निष्पन्न किये। अन्तमें महाप्रभुने इस श्लोककी व्याख्यामें इस निश्चित अर्थको स्थिर कर दिया कि ज्ञानी, कर्मी और योगी, सभी अपने-अपने दोषोंका परित्याग करके साधुसङ्गमें श्रीकृष्णभजन करते हैं। व्याख्याके बीचमें श्रीनारद और व्याधके एक संवादमें साधुसङ्गके माहात्म्यका वर्णन किया। श्रीनारदने श्रीपर्वत मुनिको लाकर व्याधकी हरिभक्ति दिखलायी। इसके बाद महाप्रभुने श्रीसनातनका स्तव सुनकर श्रीमद्भागवतका तात्पर्य और माहात्म्य प्रकाशित किया। अन्तमें श्रीसनातनकी इच्छानुसार महाप्रभुने हरिभक्तिविलासके सूत्रोंको बतला दिया। —(अमृतप्रवाह भाष्य) “आत्मारामश्च”-श्लोकमें कुतर्कका हरण करनेवाले श्रीगौरके आशीर्वादकी याचना :- आत्मारामेति पद्यार्कस्यार्थांशून् यः प्रकाशयन्। जगत्तमो जहाराव्यात् स चैतन्योदयाचलः ॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने “आत्मारामेति” पद्यरूपी सूर्यकी अर्थरूपी समस्त किरणोंको प्रकाशित करके जगत्के अन्धकारका हरण किया था, वे उदयाचल-श्रीचैतन्य जगत्का पालन करें ॥1॥ अनुभाष्य— यः (श्रीचैतन्यदेवः) आत्मारामेति ('आत्मारामश्च' इति भागवतस्य) पद्यार्कस्य (श्लोकसूर्यस्य) अर्थांशून् (अर्थाः एव अंशवः किरणास्तान्) प्रकाशयन् (प्रकटयन्) जगत्तमः (कुसिद्धान्तान्धकारं) जहार (नाशयामास), स चैतन्योदयाचलः (श्रीकृष्णचैतन्य एव उदयाचलः, अर्कस्य उदयस्थलत्वात्) अव्यात् (अवतु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥2॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो ॥2॥ श्रीसनातनकी महाप्रभुके श्रीचरणोंमें प्रार्थना :- तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया। पुनरपि कहे किछु विनय करिया ॥3॥ पहले सार्वभौमको सुनायी “आत्मारामश्च” श्लोककी अठारह प्रकारकी व्याख्या सुननेकी अभिलाषा :- “पूर्वे शुनियाछौं, तुमि सार्वभौम-स्थाने। एक श्लोकेर आठार अर्थ कैराछ व्याख्याने ॥4॥ अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर पुनः विनयपूर्वक कहा,—“मैंने सुना है कि आपने पहले श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको आत्माराम श्लोकके अठारह प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या करके सुनायी थी ॥3-4॥ श्रीमद्भागवत (1/7/10)— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥5॥ अनुवाद—आत्मामें ही जिनकी रति है, ऐसे वासना-ग्रन्थियोंसे शून्य सभी मुनि भी बृहत्कर्मा श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं; क्योंकि, जगत्के चित्तहारी हरिका एक ऐसा ही एक गुण है ॥5॥ । 409