श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 24/5-15 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य-मध्यलीला 6/186 संख्या देखें॥5॥ आश्चर्य शुनिया मोर उत्कण्ठित मन। कृपा करि' कह यदि, जुड़ाय श्रवण॥” 6॥ अनुवाद-यह सुनकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था और उन अर्थोंको सुननेके लिये मेरा मन भी उत्कण्ठित हो रहा है। यदि आप कृपा करके मुझे उस श्लोककी व्याख्या सुनायें तो मेरे कानोंको आनन्द मिलेगा॥”6॥ महाप्रभुके द्वारा स्वयंकी अप्राकृत पागल-कहकर दैन्यके आवरणमें आत्मगोपनकी चेष्टा :- प्रभु कहे,—“आमि वातुल, आमार वचने। सार्वभौम वातुलता सत्य करि' माने॥7॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,–“मैं एक पागल हूँ और सार्वभौम भट्टाचार्य दूसरे पागल हैं, इसलिये वे मेरी बातोंको सत्य मानते हैं॥7॥ कीर्तनकारी महाप्रभुका उपयुक्त श्रोता श्रीसनातनको आदर देते हुए पहलेवाले अठारह प्रकारके अर्थोंको छोड़कर नयी व्याख्या करना :- किवा प्रलापिलाङ, तार नाहि किछु मने। तोमार सङ्ग-बले यदि किछु हय मने॥8॥ सहजे आमार किछु अर्थ नाहि भासे। तोमा-सबार सङ्ग-बले ये किछु प्रकाशे॥9॥ अनुवाद-मैंने तब क्या कहा था, मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है, किन्तु यदि तुम्हारे सङ्गके प्रभावसे मुझे कुछ स्मरण आयेगा, तो मैं वह कहूँगा। प्रायः मैं अपने आपसे कोई व्याख्या नहीं कर पाता, किन्तु आप लोगोंके सङ्गके प्रभावसे मेरे मनमें कुछ प्रकाशित हो सकता है॥8-9॥ “आत्मारामश्च” श्लोकमें कुल ग्यारह पद :- एकादश पद एइ श्लोके सुनिर्मल। पृथक् पृथक् नाना अर्थ पदे करे झलमल॥10॥ अनुवाद-इस श्लोकमें ग्यारह पद तो स्पष्ट हैं, किन्तु अलग-अलग विचार करनेपर सभी पदोंके अनेक अर्थ जगमगाते हैं॥10॥ अनुभाष्य-‘एकादश पद'-(1) आत्मारामः, (2) च, (3) मुनयः, 4) निर्ग्रन्थाः, (5) अपि, (6) उरुक्रमे, (7) कुर्वन्ति, (8) अहैतुकीं, (9) भक्तिं, (10) इत्थम्भूतगुणः, (11) हरिः॥10॥ (1) 'आत्मा'-शब्दके सात अर्थ :- 'आत्मा'-शब्दे ब्रह्म, देह, मन, यत्न, धृति। बुद्धि, स्वभाव,-एइ सात अर्थ-प्राप्ति॥11॥ अनुवाद-‘आत्मा'-शब्दके-ब्रह्म, देह, मन, यत्न, धृति, बुद्धि और स्वभाव-ये सात अर्थ प्राप्त होते हैं॥11॥ प्रमाण :- विश्वप्रकाश-कोशमें- “आत्मा देहमनोब्रह्मस्वभावधृतिबुद्धिषु। प्रयत्न चे" इति॥12॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥12॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘आत्म'-शब्दसे-देह, मन, ब्रह्म, स्वभाव, धृति, बुद्धि और यत्नको समझना चाहिये॥12॥ 'आत्मा'-शब्दके अर्थको लेकर सात प्रकारके आत्माराम :- एइ साते रमे येइ, सेइ आत्मारामगण। आत्मारामगणेर आगे करिये गणन॥13॥ अनुवाद-इन सातोंमें जो रमण करते हैं, वे आत्मारामगण हैं। आत्मारामोंकी बादमें गणना करूँगा॥13॥ (2) ‘मुनि'-शब्दके सात अर्थ :- 'मुनि'-आदि शब्देर अर्थ शुन, सनातन। पृथक् पृथक् अर्थ करि, पाछे करिब मिलन॥14॥ 'मुनि'-शब्दे मननशील, आर कहे मौनी। तपस्वी, व्रती, यति, आर ऋषि, मुनि॥15॥ 410 ।