भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1857

चौबीसवाँ अध्याय 24/14-21 ] अनुवाद—हे सनातन, अब तुम 'मुनि'-आदि शब्दोंके अर्थ सुनो। पहले मैं इन सबके पृथक्-पृथक् अर्थ बतला रहा हूँ, बादमें इनको मिलाकर अर्थ बतलाऊँगा। मुनि शब्दके मननशील, मौनी, तपस्वी, व्रती, यति (संन्यासी), ऋषि और मुनि—ये सात अर्थ होते हैं॥14-15॥ (3) 'निर्ग्रन्थ'-शब्दके अर्थ :— 'निर्ग्रन्थ'-शब्दे कहे, अविद्या-ग्रन्थि-हीन। विधि-निषेध-वेदशास्त्र-ज्ञानादि-विहीन॥ 16॥ मूर्ख, नीच, म्लेच्छ आदि शास्त्ररिक्तगण। धनसञ्चयी—निर्ग्रन्थ, आर ये निर्धन॥17॥ अनुवाद—'निर्ग्रन्थ'-शब्दका एक तात्पर्य उस व्यक्तिसे है जो अविद्याकी ग्रन्थियोंसे मुक्त है। निर्ग्रन्थका दूसरा तात्पर्य उस व्यक्तिसे है जो वेदशास्त्रोंके नियम अर्थात् विधि-निषेधको नहीं मानता है। जो ज्ञान-विहीन है, उसे भी निर्ग्रन्थ कहा जाता है। इनके अतिरिक्त निर्ग्रन्थ-शब्दसे मूर्ख, नीच, म्लेच्छादि शास्त्र-ज्ञानरहित, धनका सञ्चय करनेवाले और निर्धनको समझना चाहिये॥16-17॥ 'निर्' उपसर्ग और 'ग्रन्थ'-शब्दके अर्थोंका प्रमाण :— विश्वप्रकाश-कोशमें— निर्निश्चये निष्क्रमार्थे विनिर्माण-निषेधयोः। ग्रन्थो धनेऽथ सन्दर्भे वर्णसंग्रहणेऽपि च॥18॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥18॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'निर्' उपसर्गका निश्चयमें, क्रम-अर्थमें, निर्माणमें, निषेधमें व्यवहार होता है। 'ग्रन्थ'-शब्दके अर्थ धन-सम्पत्ति, सन्दर्भ, वर्ण-संग्रह (अक्षर-योजन) हैं॥18॥ (4) 'उरुक्रम' (उरु+क्रम) शब्दका अर्थ :— 'उरुक्रम'-शब्दे कहे, बड़ याँर क्रम। 'क्रम'-शब्दे कहे, एइ पादविक्षेपण॥19॥ शक्ति कम्पयुक्त परिपाट्ये आक्रमण। चरण-चालने काँपाइल त्रिभुवन॥20॥ अनुवाद—'उरुक्रम'-शब्दसे उसे लक्ष्य करते हैं जिसका क्रम बड़ा है। 'क्रम'-शब्दके अर्थ—एक पगका माप, शक्ति, कम्पनयुक्त, परिपाटी (पद्धति) और आक्रमण हैं। इसलिये 'उरुक्रम'-शब्दका मुख्य अर्थ है—श्रीवामन भगवान् जिन्होंने अपने चरणोंको बढ़ाकर त्रिभुवनको कँपा दिया था॥19-20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उरुक्रम'-शब्दके 'उरु'-शब्दसे बड़े-बड़े और 'क्रम'-शब्दसे—पग धरना एवं (शक्ति आदिके कारण-भूत) कम्पनादि। इसलिये उरुक्रम-शब्दसे वामन-आकारके विष्णुको समझना है, क्योंकि बड़े-बड़े चरणोंके पगके द्वारा उन्होंने ही जगतको कँपा दिया था॥19-20॥ प्राकृत सर्वश्रेष्ठ सूक्ष्मतम परमाणुको गिननेवालेके लिये भी श्रीवामनके वीर्यको मापना असम्भव :— श्रीमद्भागवत (2/7/40) में— विष्णोर्नु वीर्यगणनां कतमोऽर्हतीह यः पार्थिवान्यपि कविर्विममे रजांसि। चस्कम्भ यः स्वरंहसास्खलता त्रिपृष्ठं यस्मात् त्रिसाम्यसदनादुरु कम्पयानम्॥ 21॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥21॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पृथ्नीके धूलिकणोंकी गणना करना सम्भव हो सकता है, किन्तु विष्णुके पराक्रमोंकी कौन गणना कर सकता है? उन्होंने वामनरूपमें अपने चरणोंके प्रबल वेगसे त्रिगुणमयी प्रकृतिके मूलसे सत्यलोक तकको कम्पित करके धारण किया था॥21॥ अनुभाष्य—ब्रह्मा अपने शिष्य देवर्षि नारदको भगवान् विष्णुके लीलावतार-समूहकी चेष्टा, प्रयोजन और विभूतिकी कथाका वर्णन करके भगवान् वामनदेवके अपरिमेय (असीम) पराक्रमकी महिमाका वर्णन कर रहे हैं,— इह (अस्मिन् संसारे) यः कविः (पण्डितः) पार्थिवानि रजांसि (पृथिव्यां परमाणून् अपि) विममे (विगणितवान्, तादृशः अपि) कतमः नु (प्रश्ने) विष्णोः वीर्यगणनां [कर्त्तुं] अर्हति (समर्थो भवति?—न कोऽपीत्यर्थः), यः (विष्णुः) । 411