श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1861, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/45-49 ] चार कुमारोंकी नासिकाके छिद्रके माध्यमसे अन्दर जाकर निर्विशेष-ब्रह्मपरायण उनके चित्त और देहमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया था॥45॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 17/142 संख्या देखें॥45॥ श्रीमद्भागवत (2/1/9)में— परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्ये उत्तमःश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान्॥ 46॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 46॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे राजर्षे! निर्गुण ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होनेपर भी श्रीकृष्णलीलाके प्रति आकर्षित होकर मैंने श्रीमद्भागवतका पाठ किया था॥46॥ अनुभाष्य—'मुमूर्षु (मरणासन्न) व्यक्तिके लिये क्या करना उचित है?' परीक्षितके इस प्रश्नका आदर करते हुए श्रील शुकदेव श्रीहरिकीर्तन और हरिकथा कीर्तनमय श्रीमद्भागवतके माहात्म्यका वर्णन करके श्रीहरिके गुणोंके प्रभावका वर्णन कर रहे हैं— हे राजर्षे, नैर्गुण्ये (निर्गुणे ब्रह्मणि) परिनिष्ठितः (स्थितधीः) अपि [अहं वैयासकिः] उत्तमःश्लोकलीलया (कृष्णमाधुर्य्येण) गृहीतचेताः (आकृष्टचित्तः सन्) यत् आख्यानं (भागवताख्यम्) अधीतवान्, [तदहं तेऽभिधास्यामीति परेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें, [इसका अगले श्लोकके 'तदहं तेऽभिधास्यामि'के साथ अन्वय करें।]॥ 46॥ अङ्गमाधुर्यके द्वारा गोपियोंका और रूप-गुण-माधुर्यसे रुक्मिणीके मनका हरण :— श्रीअङ्ग-रूपे हरे गोपिकार मन। रूप-गुण-श्रवणे रुक्मण्यादिर आकर्षण॥ 47॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण अपने अङ्गोंके रूप-सौन्दर्यसे गोपियोंके मनको हरण करते हैं। श्रीकृष्णके रूप और गुणोंके विषयमें सुनकर रुक्मिणी आदि द्वारकाकी महिषियोंका मन उनके प्रति आकर्षित हो गया॥ 47॥ श्रीकृष्णके अङ्ग, मुख और हास्यके माधुर्यसे मुग्ध गोपियोंके द्वारा आत्मनिवेदन :— श्रीमद्भागवत (10/29/39)में— वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्। दत्ताभयञ्च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणंञ्च भवाम दास्यः॥ 48॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 48॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे कृष्ण! आपका अलकाओंसे आवृत मुख, कपोलोंपर कुण्डलोंकी शोभा, अमृतयुक्त अधरपर मन्द हास्यके साथमें देखना, अभय प्रदान करनेवाली दो भुजाएँ और एकमात्र श्रीके द्वारा शोभित वक्षको देखकर ही हम आपकी दासी बनी हैं॥ 48॥ अनुभाष्य—पूर्णिमाकी चाँदनीमें स्नान की हुई शारदीय रात्रिमें श्रीकृष्णकी वंशी-ध्वनिसे पूर्ण आकृष्ट होकर गोपवधुएँ मोहित होकर श्रीकृष्णके समीप उपस्थित हुई, श्रीकृष्णने उनके अनुरागको और भी अधिक वर्धित करनेके लिये उन्हें घर लौट जानेके लिये कहा, तब अपने प्राणोंको श्रीकृष्णमें समर्पित कर देनेवाली गोपियाँ दुःखित होकर रुद्धकण्ठसे गद्गद वचनोंसे श्रीकृष्णसे कह रही हैं,— [हे पुरुषभूषण,] तव अलकावृतमुखं (केशदामैः आवृतमुखं) कुण्डलश्रीमण्डस्थलाधरसुधं (कुण्डलयोः श्रीर्ययो ते गण्डस्थले यस्मिन् अधरे सुधा यस्मिन् तच्च मुखं) हसितावलोकं (हसितेन सह अवलोकं यस्मिन् तच्च मुखं) वीक्ष्य (दृष्ट्वा) दत्ताभयं (दत्तम् अभयं येन तत्) भुजदण्डयुगं (बाहुद्वयं) श्रियैकरमणं (श्रियाः लक्ष्मयाः एकं मुख्यं एव रमणं रतिजनकं तत्) वक्षः च विलोक्य वयं दास्यः एव भवाम। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 48॥ श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट रुक्मिणीका आत्मनिवेदन :— श्रीमद्भागवत (10/52/37)में— श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्। रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे॥ 49॥ । 415