श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1862, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/49-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥49॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भुवनसुन्दर! तुम्हारे गुणसमूह श्रवण करनेवाले व्यक्तियोंके कानोंके छिद्रोंमें प्रविष्ट होकर उनके अङ्गोंके तापका नाश करते हैं। नेत्रधारी व्यक्तिको तुम्हारे रूपके दर्शनसे समस्त पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। हे अच्युत, तुम्हारे उन्हीं समस्त गुणोंको श्रवण करके मेरा चित्त निर्लज्ज होकर आपमें प्रवेश कर रहा है॥49॥ अनुभाष्य-परीक्षितके प्रश्नके उत्तरमें श्रीशुक भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्मक-कन्या महालक्ष्मी-स्वरूपिणी श्रीमती रुक्मिणीके परिणयके वृत्तान्तका वर्णन कर रहे हैं। लोगोंके मुखसे श्रीकृष्णके सद्गुणोंका श्रवण करके मन-ही-मनमें उन्हें अपने पतिरूपमें वरण करनेपर भी श्रीकृष्णद्वेषी ज्येष्ठ भ्राता रुक्मी चेदि-नरेश शिशुपालको उनका वर बनाना चाहता है, ऐसा सुनकर रुक्मिणीने निर्जनमें एक प्रेमपत्र लिखकर उसे एक विश्वसनीय ब्राह्मणको देकर तुरन्त श्रीकृष्णके पास भेजा। ब्राह्मणके द्वारकामें उपस्थित होनेपर श्रीकृष्णने उनका यथाविधि सत्कार किया। उसके बाद श्रीकृष्णसे अनुमति लेकर वे ब्राह्मण रुक्मिणीके उस प्रेमपत्रको पढ़ने लगे- हे अच्युत, हे भुवनसुन्दर, शृण्वतां (श्रोतृवर्गाणां) कर्णविवरैः (अन्तः प्रविश्य) अङ्गतपं हरतः ते (तव) गुणान्, दृशिमतां (चक्षुष्मतां) दृशां (चक्षुषाम्) अखिलार्थलाभं (सर्वसारार्थप्रदं) रूपं च श्रुत्वा मे (मम) चित्तम् अपत्रपं (अपगता त्रपा यस्मात् तत्, लज्जाविहीनं सत्) त्वयि आविशति (आसज्जते, अनुसन्धान-राहित्येन मग्नं भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥49॥ वंशीगानसे श्रीनारायणी लक्ष्मीको और वेणु और विग्रहके माधुर्यसे समस्त कान्ताओंको आकर्षित करना :- वंशी-गीते हरे कृष्ण लक्ष्म्यादिर मन। योग्यभावे जगतेर यत युवतीर गण॥50॥ अनुवाद-अपनी वंशीके गानसे श्रीकृष्ण लक्ष्मी आदिके मनको हरण करते हैं। श्रीकृष्ण न केवल गोपियों और लक्ष्मियोंके चित्तको हरण करते हैं, अपितु त्रिभुवनकी समस्त कान्ताओंको आकर्षित करते हैं॥50॥ श्रीमद्भागवत (10/16/36)में- कस्यान्नुभावोऽस्य न देव विद्महे तवाङ्घ्रिरेणुस्पर्शवाधिकारः। यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाऽचरत्तपो विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता॥51॥ अनुवाद-हे देव! जिनकी चरणरजको प्राप्त करनेकी वासनासे लक्ष्मीने बहुत समय तक समस्त प्रकारके विषय-भोगोंका परित्याग करके दृढ़व्रत धारण करके तपस्या की थी, उस चरणरजको इस कालिय-नागने किस सुकृतिके द्वारा लाभ करनेका अधिकार प्राप्त किया, उसे हम नहीं जानतीं॥51॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/146 संख्या देखें॥51॥ श्रीमद्भागवत (10/29/40)- का स्त्र्यङ्ग ते कलपदामृतवेणुगीत- सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत् त्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदञ्च निरीक्ष्य रूपं यद्गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन्॥52॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥52॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कृष्ण! तुम्हारे अमृतमय वेणुगीतके द्वारा सम्मोहित होकर त्रिभुवनमें कौन-सी स्त्री आर्यचरितसे (धर्मसे) विचलित नहीं होती? त्रिभुवनके सौभाग्य-स्वरूप तुम्हारे इस रूपको देखकर समस्त गैयाएँ, पक्षी, वृक्ष और हिरण भी पुलक-धारण किया करते हैं॥52॥ अनुभाष्य-चाँदनीसे आप्लावित शारदीय-रात्रिमें श्रीकृष्णकी मुरलीकी ध्वनिसे आकृष्ट गोपियोंके मोहित होकर श्रीकृष्णके निकट उपस्थित होनेपर श्रीकृष्णने उनके अनुरागको और भी वर्धित करनेके अभिप्रायसे उन्हें अपने-अपने घर लौट जानेके लिये कहा, तब 416 ।