भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1863, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1863

चौबीसवाँ अध्याय 24/52-57 ] श्रीकृष्णमें समर्पित चित्तवाली गोपियाँ दुःखित होकर रुद्धकण्ठसे गद्गद वाक्योंसे श्रीकृष्णसे कह रही हैं,— हे अङ्ग (कृष्ण), त्रिलोक्यां (त्रिभुवनमध्ये) का सा स्त्री (नारी गोपीत्यर्थः),—या ते (तव) कलपदामृतवेणुगीत-सम्मोहिता (कलानि मधुराणि पदानि यस्मिन् तत् च अमृतं तन्मयम् एव वेणुगीतं तेन, कलपदायतमूर्च्छितेनेति पाठे—कलानि पदानि यस्मिन् तत् आयतं दीर्घं मूर्च्छितं स्वरालापभेदः तेन सम्मोहिता आकृष्टहृदया सती) त्रैलोक्यसौभगं (त्रैलोक्यस्य ऊर्ध्वाधोमध्यवर्त्तमानस्र्य यावल्लोकस्य सौभगं मनोहरं तव सुन्दरम्) इदं रूपञ्च—यत् गोद्विज-द्रुममृगाः (सर्वे स्थावर-जङ्गमजीवाः) पुलकानि अविभ्रन् (अविभरुः), तत्—निरीक्ष्य (दृष्ट्वा) आर्य्यचरितात् (निज-निजविधिधर्मात्) न चलेत् (भ्रश्येत्)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। ‘कलपदामृत’—इस पाठके स्थानपर ‘कलपदायत’ पाठ भी देखा जाता है। हे प्रिय श्रीकृष्ण ! इन तीनों लोकोंमें ऐसी कौन-सी स्त्री है जो तुम्हारी कलपद और आयत अर्थात् मधुर वंशीध्वनिको सुनकर मोहित न हो जाय? इस अर्थमें कलपदायत। आयत अर्थात् दीर्घमूर्च्छना (स्वरालापका भेद) ॥ 52 ॥ वात्सल्यरसमें मातृगणको और सख्य-दास्यादि-रसमें पुरुषरूपी सखाओं और दासोंको आकर्षित करना :- गुरुतुल्य स्त्रीगणेरे वात्सल्ये आकर्षण। दास्य-सख्यादि-भावे पुरुषादि गण ॥ 53 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण मातृ-तुल्य स्त्रियोंको वात्सल्यके द्वारा आकर्षित करते हैं और दास्य-सख्यादि-भावसे पुरुषोंको आकर्षित करते हैं ॥ 53 ॥ शान्तरसमें धाममें स्थित समस्त स्थावर-जङ्गमको आकर्षित करना :- पक्षी, मृग, वृक्ष, लता, चेतनाचेतन। प्रेमे मत्त करि’ आकर्षये कृष्णगुण ॥ 54 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके गुण पक्षियों, हिरणों, वृक्षों, लताओं और चेतन-अचेतन सभी जीवोंको प्रेममें मत्त करके आकर्षित कर लेते हैं ॥ 54 ॥ (9) 'हरि'-शब्दके अर्थ; दो प्रकारका हरण— (क) गौण और (ख) मुख्य लक्षण :— ‘हरि:’-शब्दे नानार्थ, दुइ मुख्यतम। सर्व अमङ्गल हरे, प्रेम दिया हरे मन ॥ 55 ॥ अनुवाद—यद्यपि 'हरि'-शब्दके अनेक अर्थ हैं, तथापि उनमेंसे दो मुख्यतम हैं—(1) जो सभीके अमङ्गलका हरण करनेवाले हैं और (2) जो प्रेम-प्रदान करके मनका हरण करनेवाले हैं ॥ 55 ॥ (1) जीवके आवरण-रूपी अनर्थको हरनेका गुण— (क) समस्त प्रकारके तापोंका विनाश :— यैछे तैछे योहि कोहि करये स्मरण। चारिविध ताप तार करे संहरण ॥ 56 ॥ अनुवाद—जिस किसी प्रकारसे जो कोई भी श्रीहरिका स्मरण करता है, श्रीहरि उसके चार प्रकारके तापोंको सम्पूर्ण रूपसे हरण कर लेते हैं ॥ 56 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘चारिविध ताप’—चार प्रकारके पातकोंके (पापोंके) ताप—(1) पातक (पाप), (2) उरुपातक (बहुत बड़ा पाप), (3) महापातक (उरुपातकसे भी बड़ा पाप), (4) अतिपातक (सबसे बड़ा पाप) ॥ 56 ॥ श्रीकृष्णभक्ति—पाप, पापबीज और अविद्या, इन तीन प्रकारके क्लेशोंका अन्त करनेवाली :— श्रीमद्भागवत (11/14/19) में— यथाग्निः सुसमृद्धार्च्चिः करोत्येधांसि भस्मसात्। तथा मद्विषया भक्तिरुद्धवैनांसि कृत्स्नशः ॥ 57 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 57 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे उद्धव ! प्रज्ज्वलित अग्नि जैसे लकड़ीके ढेरको जलाकर भस्म बना देती है, वैसे ही मेरी भक्ति भी जीवोंके सब प्रकारके [प्रारब्ध- अप्रारब्ध] पापोंको सम्पूर्णरूपसे नष्ट कर देती है ॥ 57 ॥ अनुभाष्य—सब प्रकारके कल्याणके साधनोंमें श्रेष्ठ भक्तियोगके सम्बन्धमें और भी अधिक जाननेकी इच्छा । 417