भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1864, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1864

[ 24/57–64 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करनेपर भगवान् श्रीउद्धवसे कह रहे हैं, - हे उद्धव, यथा सुसमृद्धाचिः (सुसमृद्धा अर्चिः यस्य सः) अग्निः एधांसि (काष्ठानि) भस्मसात् करोति (विनाशयति), तथा मद्विषया भक्तिः कृत्स्नशः (सर्वाणि) एनांसि (पापानि-प्रारब्धाप्रारब्धानि च विधुनोति)। श्लोक-भावानुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 57 ॥ (ख) अज्ञान और अविद्याका विनाश; तब श्रीकृष्णकी प्रसन्नताकी कामनासे श्रवण-कीर्तनादि शुद्ध-चित्तमें स्वयं प्रकाशित नित्यसिद्ध श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- तबे करे भक्तिबाधक कर्म-अविद्या-नाश। श्रवणाद्येर फल 'प्रेमा' करये प्रकाश ॥ 58 ॥ अनुवाद - तब श्रीकृष्ण भक्तिमें बाधा देनेवाले कर्मों और अविद्याका नाश करते हैं तथा श्रवणादिके फल 'प्रेम' को प्रकाशित कर देते हैं ॥ 58 ॥ (2) अनावृत शुद्ध जीवके स्वरूपको प्रेमसे आकर्षण :- निज-गुणे तबे हरे देहेन्द्रिय मन। ऐछे कृपालु कृष्ण, ऐछे ताँर गुण ॥ 59 ॥ अनुवाद - तब श्रीकृष्ण अपने गुणोंके द्वारा भक्तके देह, इन्द्रियों और मनका हरण कर लेते हैं। श्रीकृष्ण ऐसे कृपामय हैं, ऐसे उनके अद्भुत गुण हैं ॥ 59 ॥ हरि अथवा हरिप्रेम चतुर्वर्ग-धिक्कारी और सभीके चित्तको हरण करनेवाला :- चारि पुरुषार्थ छाड़ाय, हरे सबार मन। 'हरि'-शब्देर एइ मुख्य कहिलुँ लक्षण ॥ 60 ॥ अनुवाद - श्रीकृष्ण धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी चारों पुरुषार्थोंको छुड़ाकर सबके मनका हरण करते हैं। इस प्रकार मैंने तुम्हें 'हरि'-शब्दके मुख्य लक्षणको बतलाया ॥ 60 ॥ अनुभाष्य - भगवान् श्रीहरि जीवोंके धर्म, अर्थ, काम और मोक्षात्मक चार पुरुषार्थोंको प्राप्त करनेकी पिपासाको छुड़ा देते हैं और सभीके मनका हरण करके अपने प्रेमके प्रति आकृष्ट करते हैं ॥ 60 ॥ (10) च-शब्द और (11) अपि-शब्दके अर्थ :- 'अपि' 'च', दुइ शब्द ताते 'अव्यय' हय। येइ अर्थ लागाइये, सेइ अर्थ हय ॥ 61 ॥ च-शब्दके सात और अपि-शब्दके सात अर्थ :- तथापि च-कारेरे कहे मुख्य अर्थ सात। अपि-शब्दे मुख्य अर्थ सात विख्यात ॥ 62 ॥ अनुवाद - 'च' और 'अपि'-इस श्लोकमें ये दो शब्द 'अव्यय' हैं। यद्यपि इन दोनोंके द्वारा श्लोकका जो जैसा अर्थ करना चाहता है, श्लोकका वैसा अर्थ हो जाता है। तथापि च-कार (शब्द) के सात मुख्य अर्थ हैं और 'अपि'-शब्दके भी सात प्रसिद्ध मुख्य अर्थ हैं ॥ 61-62 ॥ च-शब्दका प्रयोगस्थल; प्रमाण :- विश्वप्रकाशमें- चान्वाचये समाहारेऽन्योऽन्यार्थे च समुच्चये। यत्नान्तरे तथा पादपूरणेऽप्यवधारणे ॥ 63 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - अन्वाचयमें अर्थात् अनुगम्य-समूहके (पीछे चलनेवालेके) अर्थमें, समाहारमें (समूहमें), अन्य-अन्य अर्थमें, समुच्चयमें (सामूहिकमें), यत्नान्तरमें (दूसरे यत्नमें), पादपूर्णमें (श्लोकको पूर्ण करनेमें) और अवधारणमें अर्थात् निश्चयके अर्थमें 'च'-शब्दका प्रयोग होता है ॥ 63 ॥ अपि-शब्दका प्रयोगस्थल, प्रमाण :- विश्वप्रकाशमें- अपि सम्भावना-प्रश्न-शङ्का-गर्हा समुच्चये। तथा युक्तपदार्थेषु कामचारक्रियासु च ॥ 64 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 64 ॥ 418 ।