भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1865

चौबीसवाँ अध्याय 24/64-70 ]

अमृतप्रवाह भाष्य—'अपि' शब्द सम्भावना, प्रश्न, शङ्का, गर्हा (निन्दा या दुर्वचन कहना), समुच्चय (सामूहिक), युक्त-पदार्थ (यथोचित प्रयोग), कामचार (उच्छृङ्खलता)-क्रियामें व्यवहार होता है॥64॥

यहाँ तक पदोंके अर्थ निर्णीत; अब उनके द्वारा श्लोकके अर्थोंका निर्णय :- एइ त' एकादश पदेर अर्थ-निर्णय। एबे श्लोकार्थ करि, यथा ये लागय॥65॥

अनुवाद—इस प्रकार मैंने इस श्लोकके ग्यारह पदोंके अर्थ बतलाये हैं। अब पदोंके यथायोग्य अर्थोंका प्रयोग करके मैं सम्पूर्ण श्लोकके अर्थका वर्णन करता हूँ॥65॥

सर्वप्रथम 'आत्माराम'-पदके अन्तर्गत 'आत्मा'-शब्दकी (1) 'ब्रह्म'-अर्थके द्वारा व्याख्या :- 'ब्रह्म'-शब्देर अर्थ-तत्त्व सर्व-बृहत्तम। स्वरूप-ऐश्वर्य करि' नाहि याँर सम॥66॥

अनुवाद—'ब्रह्म'-शब्दका अर्थ—जो 'सबसे बृहत्तम (बड़ा) तत्त्व' है। जिनके स्वरूप और ऐश्वर्यके समान किसी अन्यका स्वरूप और ऐश्वर्य नहीं है॥66॥

ब्रह्मकी संज्ञा; शास्त्र-प्रमाण :- विष्णुपुराण (1/12/57)में— बृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च तद्ब्रह्म परमं विदुः। तस्मै नमस्ते सर्वात्मन् योगिचिन्ताविकारी यत्॥67॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥

अमृतप्रवाह भाष्य—बृहत्त्व (सर्वव्यापकता) होनेके कारण, बृंहणत्व अर्थात् वृद्धिकारकत्व (सम्वर्धक और पोषक) होनेके कारण उस तत्त्वको 'परमब्रह्म' कहते हैं। हे सर्वात्मन्, योगिचिन्ताविकारी (विद्वानोंको मोहित करनेवाले) जो आप हैं, आपको प्रणाम है॥67॥

अनुभाष्य— [बुधाः] बृहत्त्वाद् (सर्वव्यापकत्वात्) बृंहणत्वाच्च (सम्वर्द्धकत्वात्, पोषकत्वात् वा) तत् परं ब्रह्म विदुः (जानन्ति); हे सर्वात्मन्, ते (तव) यत् योगिचिन्ताविकारी (सूरिजनमोहनं स्वरूपं) तस्मैः नमः।

श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥

आत्मा-शब्दका सर्वव्यापक-तत्त्व ही ब्रह्मतत्त्व :- श्रीमद्भागवत (11/2/45) श्लोककी व्याख्यामें श्रीधरस्वामि-उद्धृत तन्त्र-वाक्य— आततत्वाच्च मातृत्वादात्मा हि परमो हरिः॥68॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥68॥

अमृतप्रवाह भाष्य—सर्वव्यापक और सबकी सृष्टि करनेवाले होनेके कारण हरि ही परमात्मा हैं॥68॥

अनुभाष्य— आततत्त्वात् (सर्वव्यापकत्वात्) मातृत्वात् (सर्वप्रसवितृत्वात्) च हरिः हिः परमः आत्मा।

श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥68॥

'ब्रह्म'-शब्दकी अभिधा-वृत्तिसे पूर्ण-प्रतीतिमय भगवान् :- सेइ 'ब्रह्म'-शब्दे कहे स्वयं भगवान्। अद्वितीय-ज्ञान, याँहा बिना नाहि आन॥69॥

अनुवाद—उस 'ब्रह्म'-शब्दका अर्थ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण है। उनके अतिरिक्त अद्वितीय-ज्ञान [अर्थात् सजातीय-विजातीय-स्वगत भेदरहित अद्वय-ज्ञान; आदिलीला 2/11की अमृताणुकणिका टीका देखें] अन्य किसीमें भी नहीं है॥69॥

शास्त्र-प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (1/2/11)में— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥70॥

अनुवाद—तत्त्वको जाननेवाले विज्ञगण अद्वयज्ञानको तत्त्व कहते हैं। उसी अद्वयज्ञानकी प्रथम प्रतीति ब्रह्म, द्वितीय प्रतीति परमात्मा और तृतीय प्रतीति भगवान् हैं॥70॥

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