भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1860

[ 24/37-45 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है, वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे जो गड़्ढा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है॥ ३७॥ अनुभाष्य-आदिलीला 7/98 संख्या देखें॥ ३७॥ अपने रूपमाधुर्यके द्वारा सभीको बलपूर्वक वशमें करनेवाले :- सर्वार्कषक, सर्वाह्वादक, महारसायन। आपनार बले करे सर्वविस्मरण॥ ३८॥ अनुवाद-पूर्णानन्दमय भगवान् सभीको आकर्षित करनेवाले, सभीको आनन्दित करनेवाले, महारसायन अर्थात् समस्त चिन्मय रसोंके आश्रय हैं। वे अपने बलसे सबके अन्य सभी सुखोंको भुला देनेवाले हैं॥ ३८॥ श्रीकृष्णकृपाके प्रभावसे कैतव-नाश :- भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-सुख छाड़य यार गन्धे। अलौकिक शक्ति-गुणे श्रीकृष्णकृपाय बान्धे॥ ३९॥ शास्त्रयुक्ति नाहि इँहा सिद्धान्त-विचार। एड स्वभाव-गुणे, याते माधुर्येर सार॥ ४०॥ अनुवाद-शुद्धभक्तिकी गन्धमात्रके प्रभावसे भुक्ति, मुक्ति और सिद्धिके सुखोंकी वासना दूर हो जाती है। शुद्धभक्त श्रीकृष्णकी अलौकिक शक्ति, गुणों और कृपासे बँध जाते हैं। शुद्धभक्तको शास्त्रयुक्ति और सिद्धान्तके विचारकी अपेक्षा नहीं होती, क्योंकि श्रीकृष्णका स्वाभाविक गुण ही माधुर्यका सार है॥ ३९-४०॥ 'गुण' शब्दके अर्थ; श्रीकृष्णके अनन्तगुणोंका अतुलनीय अमोघ प्रभाव :- 'गुण'-शब्देर अर्थ-कृष्णेर गुण अनन्त। सच्चिद्रूप-गुण सर्व-पूर्णानन्द॥ ४१॥ ऐश्वर्य-माधुर्य-कारुण्ये स्वरूप-पूर्णता। भक्तवात्सल्य, आत्मा पर्यन्त वदान्यता॥ ४२॥ अनुवाद-'गुण'-शब्दका तात्पर्य श्रीकृष्णके अनन्त गुणोंसे है। श्रीकृष्णके गुण नित्य और चिन्मय हैं और सभी गुण पूर्णानन्द-स्वरूप हैं। श्रीकृष्णके ऐश्वर्य, माधुर्य, कारुण्यादि चिन्मय गुण स्वरूपतः पूर्ण हैं। श्रीकृष्णका भक्त-वात्सल्य ऐसा है कि वे स्वयं तकको भी भक्तको दान करनेवाले दयालु हैं॥ ४१-४२॥ एक-एक गुण एक-एक विशेष भक्तको वशीभूत करनेवाला :- अलौकिक रूप, रस, सौरभादि गुण। कारो मन कोन गुणे करे आकर्षण॥ ४३॥ चरणकमलोंकी सुगन्धसे चतुःसनको और लीला-माधुर्यसे शुकदेवको आकर्षित करना :- सनकादिर मन हरिल सौरभादि गुणे। शुकदेवेर मन हरिल लीला-श्रवणे॥ ४४॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण अपने अलौकिक रूप, रस, सुगन्धादि गुणोंसे भक्तोंके मनको आकर्षित करते हैं। वे भक्त भिन्न-भिन्न रसोंमें स्थित होते हैं, इसलिये श्रीकृष्ण सर्वाकर्षक हैं। श्रीकृष्णने अपने श्रीचरणोंमें अर्पित तुलसीकी सुगन्धसे चतुःसनके (सनक, सनन्दन, सनातन ओर सनत्के) मनका हरण किया था। अपनी लीलाका श्रवण कराके उन्होंने शुकदेव गोस्वामीके मनका हरण किया था॥ ४३-४४॥ श्रीमद्भागवत (3/15/43)में- तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः॥ ४५॥ अनुवाद-उन कमल-नेत्र-भगवान्‌के पदकमलोंकी पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि

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