श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1869, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/90-95 ] आर्त्त और अर्थार्थी-भोगकामी; जिज्ञासु और ज्ञानी-मुक्तिकामी :- आर्त्त, अर्थार्थी, - दुइ सकाम-भितरे गणि। जिज्ञासु, ज्ञानी, - दुइ मोक्षक़ामी मानि ॥ 90 ॥ अनुवाद-मैं आर्त्त और अर्थार्थी-इन दोनोंको सकाम भक्त तथा जिज्ञासु और ज्ञानी-इन दोनोंको मोक्षकी कामना करनेवाला मानता हूँ ॥ 90 ॥ चार प्रकारकी कामनाओंको छोड़नेसे ही शुद्धभक्तिको प्राप्त करनेकी योग्यता :- एइ चारि सुकृति हय महाभाग्यवान्। तत्तत्कामादि छाड़ि' हय शुद्धभक्तिमान् ॥ 91 ॥ अनुवाद-ये चारों प्रकारके सुकृतिशाली व्यक्ति महाभाग्यशाली होते हैं। सुकृतिके प्रभावसे वे धीरे-धीरे अपनी-अपनी कामनाओंको छोड़कर शुद्धभक्त बन जाते हैं ॥ 91 ॥ चार प्रकारकी कामनाएँ ही दुःसङ्ग, साधुगुरु-श्रीकृष्णकी कृपासे दुःसङ्गका दूर होना :- साधुसङ्ग-कृपा किंवा कृष्णेर कृपाय। कामादि 'दुःसङ्ग' छाड़ि' शुद्धभक्ति पाय ॥ 92 ॥ अनुवाद-साधुसङ्ग-कृपा अथवा श्रीकृष्णकी कृपासे वे कामनाओंरूपी 'दुःसङ्ग'को छोड़कर शुद्धभक्ति प्राप्त करते हैं॥ 92 ॥ सत्सङ्गका प्रभाव :- श्रीमद्भागवत (1/10/11)में- सत्सङ्गान्मुक्त-दुःसङ्गो हातुं नोत्सहते बुधः। कीर्त्यमानं यशो यस्य सकृदाकर्ण्य रोचनम् ॥ 93 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 93 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सत्सङ्ग करते हुए दुःसङ्गका परित्याग करके पण्डित-व्यक्ति भगवान्के कीर्तन करने योग्य और रुचिकर यशको एकबार सुनकर उन्हें कभी भी परित्याग नहीं कर सकते ॥ 93 ॥ अनुभाष्य-धर्मराज युधिष्ठिरका राज्य-अभिषेक करनेके बाद कुछ मास हस्तिनापुरमें रहनेके बाद श्रीकृष्ण द्वारका जानेकी अभिलाषा करके कुरु-पाण्डव कुलके स्त्री-पुरुष सभीका यथाविधि यथायोग्य अभिवादन करके उनसे विदायी लेकर रथपर चढ़े, शौनकादि ऋषियोंको श्रीसूत हस्तिनापुरवासियोंके श्रीकृष्ण-विरहमें अधीर होनेके प्रसङ्गमें साधुसङ्गके माधुर्यके विषयमें बतला रहे हैं,- सत्सङ्गात् (कृष्णभक्तसङ्गात् हेतोः) मुक्तदुःसङ्गः (मुक्तः ज्ञानकर्म्मान्याभिलाषविषयः पुत्रादिविषयो वा दुःसङ्गो येन सः) बुधः (सुधीः) कीर्त्यमानम् (उच्चार्यमाणं) यस्य (श्रीकृष्णस्य) रोचनं (रुचिकरं) यशं सकृत् आकर्ण्य (श्रुत्वा) हातुं (सत्सङ्गं त्यक्तुं) न उत्सहते, [तस्य विरहं पार्थाः कथं सहेरन्निति परेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [अगले श्लोकके प्रथम और द्वितीय चरणके साथ इसका अन्वय करें।] ॥ 93 ॥ दुःसङ्गका अर्थ :- 'दुःसङ्ग' कहिये-'कैतव', 'आत्मवञ्चना'। कृष्ण, कृष्णभक्ति बिना अन्य कामना ॥ 94 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण और श्रीकृष्ण भक्तिके अतिरिक्त अन्य कामनाओंको हृदयमें रखना ही कैतव' (कपटता) तथा 'आत्मवञ्चना' (अपनेको ही ठगना) है। इसीको 'दुःसङ्ग' कहते हैं॥ 94 ॥ अनुभाष्य-छल-कपटके द्वारा अपनी वञ्चना करना ही 'दुःसङ्ग' है। श्रीकृष्णकाम और श्रीकृष्णभक्तिकी कामनाके अतिरिक्त अन्य समस्त कामनाएँ ही 'दुःसङ्ग' हैं॥ 94 ॥ श्रीमद्भागवत (1/1/2)में- धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्। श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किंवा परैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ 95 ॥ । 423