भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1870, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1870

[ 24/95-101 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अनुवाद—यह श्रीमद्भागवत ग्रन्थ सर्वप्रथम महामुनि श्रीनारायणके द्वारा चतुःश्लोकी (अर्थात् चार श्लोकों)के रूपमें निर्मित है। इसमें निर्मत्सर अर्थात् सब जीवोंके प्रति दयालु व्यक्तियोंके लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तक कैतवसे शून्य अर्थात् छलरहित परमधर्मकी व्याख्या हुई है। यह धर्म जीवके त्रितापका नाश करनेवाला, शिवद अर्थात् मङ्गल प्रदान करनेवाला और वास्तव-वस्तुके तत्त्व-ज्ञानको प्रदान करनेवाला है। इसको श्रवण करनेके इच्छुक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार ईश्वरको अपने हृदयमें अवरुद्ध करनेमें समर्थ होते हैं। इसलिये श्रीमद्भागवतके अतिरिक्त अन्य किसी शास्त्रकी क्या आवश्यकता है ? ॥ 95 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/91 संख्या देखें ॥ 95 ॥ 'प्र'-शब्दे—मोक्षवाञ्छा कैतवप्रधान। एइ श्लोके श्रीधरस्वामी करियाछेन व्याख्यान ॥ 96 ॥ अनुवाद—उपरोक्त श्लोकके 'प्र'-शब्दसे समझना चाहिये कि मोक्षकी कामना ही प्रधान कैतव (कपटता) है। इस श्लोककी टीकामें श्रीधरस्वामीने ऐसी व्याख्या की है ॥ 96 ॥ सकाम-भक्ते 'अज्ञ' जानि' दयालु भगवान्। स्व-चरण दिया करे इच्छार पिधान ॥ 97 ॥ अनुवाद—सकाम भक्तको 'अज्ञ' (मूर्ख) जानकर दयालु भगवान् उसे अपने श्रीचरणका आश्रय प्रदान करके उसकी अनुचित कामनाओंको आच्छादित कर देते हैं ॥ 97 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'इच्छार पिधान'—इच्छाका आच्छादन (परिपूरण) ॥ 97 ॥ श्रीमद्भागवत (5/19/26)में— सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां नैवार्थदो यत् पुनरर्थिता यतः। स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता- मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम् ॥ 98 ॥

अनुवाद—श्रीकृष्ण प्रार्थना किये जानेपर मनुष्योंकी प्रार्थनाको पूर्ण करते हैं, यह बात सत्य है। किन्तु जिस अर्थसे (भोगकी वस्तुसे) बार-बार भोगके लिये प्रार्थना उदित होती है, श्रीकृष्ण उस अर्थको नहीं देते। अन्यकामी होकर जो एकमात्र उनके पादपल्लवको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करनेपर भी उनका भजन करते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें स्वयं ही अन्य-कामनाओंको शान्त कर देनेवाले अपने चरणकमलोंको दिया करते हैं ॥ 98 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/40 संख्या देखें ॥ 98 ॥ शुद्धभक्तके सङ्ग, सेवा और श्रीकृष्णकृपासे ही अनर्थ-निवृत्ति और सिद्धिकी प्राप्ति :— साधुसङ्ग, कृष्णकृपा, भक्तिर स्वभाव। ए तिने सब छाड़ाय, करे कृष्णे 'भाव' ॥ 99 ॥ अनुवाद—साधुसङ्ग, श्रीकृष्ण-कृपा और श्रीकृष्ण- भक्तिका स्वभाव ही ऐसा है कि ये तीनों अन्य सब वस्तुओंको छुड़ाकर धीरे-धीरे श्रीकृष्णके प्रति भावको उत्पन्न करा देते हैं ॥ 99 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अकाम, सर्वकाम, और मोक्षकाम,—ये तीन प्रकारके व्यक्ति उन-उन कामनाओंके दोषोंको छोड़कर श्रीकृष्णकी शुद्धभक्ति करते हैं ॥ 99 ॥ अनुभाष्य—'एइ तिने'—श्रीकृष्णभक्तोंका सङ्ग, श्रीकृष्णकृपा और श्रीकृष्णभक्ति। ये श्रीकृष्णके अभक्तोंका सङ्ग, मायाके द्वारा प्रदान किये गये समस्त सौभाग्य और अन्याभिलाष, कर्म, ज्ञान और योग-प्रवृत्ति आदि सबकुछ छुड़ाकर श्रीकृष्णके प्रति 'भाव' उत्पन्न करते हैं ॥ 99 ॥ बादकी सभी व्याख्याओंमें यही जानने योग्य :— आगे यत यत अर्थ व्याख्यान करिब। कृष्णगुणास्वादेर एइ हेतु जानिब ॥ 100 ॥ श्लोकव्याख्या लागि' एइ करिलुँ आभास। एबे करि श्लोकेर मूलार्थ प्रकाश ॥ 101 ॥

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