श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1871, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/100-109 ] अनुवाद—आगे मैं (आत्मारामश्च) श्लोकके शब्दोंकी क्रमशः व्याख्या करूँगा, हे सनातन, तुम उन्हें श्रीकृष्णके गुणोंका आस्वादन करनेका कारण समझना। मैंने अब तक उसकी भूमिका बनायी है, अब मैं उसके मुख्य अर्थको प्रकाशित कर रहा हूँ॥ 100-101 ॥ ज्ञानियोंके दो प्रकारके विभेद :- ज्ञानमार्गे उपासक—दुइत' प्रकार। केवल ब्रह्मोपासक, मोक्षाकाङ्क्षी आर॥ 102 ॥ (1) केवल-ब्रह्मज्ञानी तीन प्रकारके :- केवल ब्रह्मोपासक तिन भेद हय। साधक, ब्रह्ममय, आर प्राप्त-ब्रह्मलय ॥ 103 ॥ भक्ति-आश्रित ज्ञानके साधनसे ही साधकका ब्रह्मभूत होना :- भक्ति बिना केवल ज्ञाने 'मुक्ति' नाहि हय। भक्ति साधन करे येइ 'प्राप्त-ब्रह्मलय' ॥ 104 ॥ वास्तव-वस्तुके आनुगत्यमें अथवा भक्तिफलसे ही 'ब्राह्मणत्व' और सेवाके संयोगसे ही 'वैष्णवत्व' :- भक्तिर स्वभाव, —ब्रह्म हैते करे आकर्षण। दिव्य देह दिया कराय कृष्णेर भजन ॥ 105 ॥ वैष्णव होनेपर ही श्रीकृष्णसेवाका अनुष्ठान :- भक्तदेह पाइले हय गुणेर स्मरण। गुणाकृष्ट हञा करे निर्मल भजन ॥ 106 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 102-106 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानमार्गके उपासक केवल- ब्रह्मोपासक और मोक्ष-आकाङ्क्षीके भेदसे दो प्रकारके हैं। कैवल्य-वासनासे ब्रह्मकी उपासना करनेवाले 'केवल-ब्रह्मोपासक' होते हैं। उनकी तीन अवस्थाएँ— साधक, (नित्यसिद्ध) ब्रह्ममय और ब्रह्मलय-प्राप्त (अर्थात् ब्रह्मभूत) हैं। भक्तिके बिना ज्ञान मुक्ति नहीं दे सकता। जो व्यक्ति ब्रह्मलयप्राप्त (अर्थात् ब्रह्मभूत हो गया है), वही भक्तिसाधन कर सकता है। भक्तिसाधनके उपस्थित होनेपर भक्तिका स्वभाव उपस्थित होता है। उस स्वभावके प्रभावसे भक्ति (उन्हें) ब्रह्मसे आकर्षण करके दिव्य देह देकर श्रीकृष्णभजन कराती है। भक्तको अप्राकृत देह प्राप्त होनेपर श्रीकृष्णके सभी गुणोंका स्मरण होता है और भक्त उन गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर निर्मल भजन करता है॥ 102-106 ॥ मुक्तगणोंकी भी अप्राकृत सिद्धदेहमें भगवत्-सेवा :- श्रीमद्भागवत (10/87/21) श्लोकमें श्रीधर-उद्धृत सर्वज्ञ भाष्यकार व्याख्या और नृसिंहतापनी (2/5/16)में— मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते॥ 107 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मुक्तगण भी लीलासे आकर्षित होकर विग्रह स्थापित करके भगवान्का भजन करते हैं॥ 107 ॥ ब्रह्ममय शुक और चतुःसनादि भी श्रीकृष्णके प्रति आकृष्ट होकर श्रीकृष्ण भजनमें रत :- जन्म हैते शुक-सनकादि 'ब्रह्ममय'। कृष्णगुणाकृष्ट हञा कृष्णेरे भजय ॥ 108 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीशुकदेव गोस्वामी और सनकादि चार कुमार जन्मसे ही 'ब्रह्ममय' थे, किन्तु बादमें श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर उन्होंने श्रीकृष्णका भजन किया ॥ 108 ॥ चतुःसनादि श्रीकृष्णचरणकी गन्धसे आकृष्ट होकर शुद्धभक्तिमें रत :- सनकाद्येर श्रीकृष्णकृपाय सौरभे हरे मन। गुणाकृष्ट हञा करे निर्मल भजन ॥ 109 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीसनकादिके मनको श्रीकृष्णके श्रीचरणोंमें समर्पित तुलसी आदिकी सुगन्धने हरण कर लिया था। इस प्रकार उन्होंने श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर उनका शुद्ध भजन किया था ॥ 109 ॥ । 425