भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1872

[ 24/110-115 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीमद्भागवत (3/15/43)में— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ 110 ॥ अनुवाद-उन कमल-नेत्र-भगवान्के पदकमलकी पराग-मिश्रित तुलसीकी मधुरगन्धयुक्त वायुने सनकादि चार कुमारोंकी नासिकाके छिद्रके माध्यमसे अन्दर जाकर निर्विशेष-ब्रह्मपरायण उनके चित्त और देहमें क्षोभ उत्पन्न कर दिया था ॥ 110 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 17/142 संख्या देखें ॥ 110 ॥ व्यासदेवकी कृपासे उनके शिष्य शुक श्रीकृष्णलीलाके प्रति आकृष्ट होकर शुद्धभक्तिमें रत :- व्यासकृपाय शुकदेवेर लीलादि-स्मरण। कृष्णगुणाकृष्ट हञा करेन भजन ॥ 111 ॥ अनुवाद-श्रीव्यासदेवकी कृपासे श्रीशुकदेवको श्रीकृष्णकी लीलादिका स्मरण हुआ था। श्रीशुकदेवने भी श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर उनका भजन किया था॥ 111 ॥ श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर श्रौतपन्थी शुकका व्यासदेवसे भागवत-अध्ययन :- श्रीमद्भागवत (1/7/11)में— हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ 112 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मति हरिके गुणोंसे आकृष्ट होनेपर वैष्णवप्रिय भगवान् शुकदेवने इस महद्-आख्यानका (महापुराण श्रीमद्भागवतका) अध्ययन किया था॥ 112 ॥ अनुभाष्य-‘निवृत्तिमें पूर्णरत, सर्वत्र-उपेक्षाशील, आत्माराम ब्रह्मज्ञानी श्रीशुकदेवने किस कारण इस श्रीमद्भागवतका अध्ययन किया था?’—शौनकके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूत उसके कारणका वर्णन कर रहे हैं,— नित्यं विष्णुजनप्रियः (विष्णुजनाः प्रियाः यस्य सः) भगवान् बादरायणिः (वैयासकिः श्रीशुकः) हरेः गुणाक्षिप्तमतिः (गुणेन आक्षिप्ता मतिः यस्य सः हरिगुणानुवादाकृष्टचित्तः सन्) महदाख्यानम् (इदं श्रीभागवतं महापुराणम्) अध्यगात् (अधीतवान्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112 ॥ श्रौतपन्थी ब्रह्मज्ञानी नव-योगेन्द्रोंका श्रीकृष्णगुणके श्रवणसे श्रीकृष्णभजन :- नव-योगीश्वर जन्म हैते ‘साधक’-ज्ञानी। विधि-शिव-नारद-मुखे कृष्णगुण शुनि’ ॥ 113 ॥ गुणाकृष्ट हञा करे कृष्णेर भजन। एकादश-स्कन्धे ताँर भक्ति-विवरण ॥ 114 ॥ अनुवाद-(ऋषभदेवके नौ योगी पुत्र) नव-योगीश्वर (नवयोगेन्द्र) जन्मसे ही ‘साधक’ ब्रह्मज्ञानी थे। किन्तु ब्रह्मा, शिव, नारदके मुखसे श्रीकृष्णके गुणोंके विषयमें श्रवण करके वे श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकर्षित हुए और तब उन्होंने श्रीकृष्णका भजन किया। श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्धमें उनकी भक्तिका विवरण प्राप्त होता है॥ 113-114 ॥ शास्त्र-प्रमाण :- भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/20)में उद्धृत महोपनिषद्-वाक्य— अक्लेशां कमलभुवः प्रविश्य गोष्ठीं कुर्वन्तः श्रुतिशिरसां श्रुतिं श्रुतज्ञाः। उत्तुङ्गं यदुपुरसङ्गमाय रङ्गं योगीन्द्राः पुलकभृतो नवाप्यवापुः ॥ 115 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 115 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वेदोंमें कुशल नवयोगेन्द्र जहाँ क्लेशका कोई स्थान नहीं है, ऐसी ब्रह्माजीकी सभामें प्रविष्ट हुए। वहाँ ब्रह्माजीसे उपनिषदोंके वास्तविक अर्थोंका (श्रीकृष्णकी महिमाका) श्रवण करके वे पुलकित देहसे यदुपुरी द्वारकामें जानेके इच्छुक हुए। 426