श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1873, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार अन्तमें उन्हें अति उच्च 'रङ्गक्षेत्र' प्राप्त हुआ था॥ 115॥ अनुभाष्य- श्रुतज्ञाः (वेदकुशलाः) नवयोगीन्द्राः (जायन्तेयाः) कमलभुवः (पद्मयोनेः) अक्लेशां (क्लेशवर्जितां) गोष्ठीं (सभां) प्रविश्य, श्रुतिशिरसाम् (उपनिषदां) श्रुतिं (श्रवणं) कुर्वन्तः अपि यदुपुरसङ्गमाय (द्वारकां गन्तुमित्यर्थः) पुलकभृतः (रोमाञ्चितदेहाः सन्तः) उत्तुङ्गम् (अत्युच्चं) रङ्गं (रङ्गक्षेत्रम्) अवापुः (प्राप्तवन्तः) । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 115॥ (2) मोक्षाकाङ्क्षीके तीन प्रकारके भेद :- मोक्षाकाङ्क्षी ज्ञानी हय तिनप्रकार। मुमुक्षु, जीवन्मुक्त, प्राप्तस्वरूप आर॥ 116॥ अनुवाद-मोक्षकी (ब्रह्ममें लीन होनेकी) आकाङ्क्षा करनेवाले ज्ञानी तीन प्रकारके होते हैं-(1) मुमुक्षु (मुक्तिकामी), (2) जीवन्मुक्त (प्राकृत देह रहते हुए भी मुक्त) और (3) प्राप्त-स्वरूप (जिन्हें अपने नित्य स्वरूपकी प्राप्ति हो गयी है) ॥ 116 ॥ (क) मुक्तिकामी विषयी व्यक्तियोंका भक्तिके आश्रयमें श्रीकृष्णभजन :- 'मुमुक्षु' अनेक जगते संसारी जन। 'मुक्ति' लागि' भक्त्ये करे कृष्णेर भजन॥ 117 ॥ अनुवाद-जगत्में अनेक संसारी व्यक्ति 'मुक्तिकामी' हैं। 'मुक्ति'के लिये वे भक्तिके द्वारा श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 117॥ श्रीमद्भागवत (1/2/26)में- मुमुक्षवो घोररूपान हित्वा भूतपतीनथ। नारायण-कलाः शान्ता भजन्ति ह्यनसूयवः ॥ 118 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 118॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुक्तिकामी व्यक्ति घोररूपी भूतपतियोंका परित्यागकर, किन्तु उनके प्रति असूया-रहित (ईर्ष्या-द्वेष-रहित) होकर श्रीनारायणकी सभी कलाओंका भजन करते हैं॥ 118॥
अनुभाष्य-कल्याण चाहनेवाले बुद्धिमान व्यक्ति अधोक्षज विष्णुकी अथवा उनके अवतारोंकी और सकाम अशान्त स्वभाववाले उपासक व्यक्ति विष्णुके अतिरिक्त अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, यही श्रीसूत गोस्वामी शौनकादि ऋषियोंको बतला रहे हैं,- [ननु अन्यानपि केचिद्भजन्तो दृश्यन्ते? सत्यं, मुमुक्षवस्तु अन्यान् न भजन्ति, किन्तु सकामा एवेत्याह]-अथ (अतएव) घोररूपान् (भीषणाकृतीन्) भूतपतीन् (पितृभूतप्रजेशादीन्) हित्वा (त्यक्त्वा) मुमुक्षवः (निःश्रेयसार्थिनः ज्ञानिनः) अनसूयवः (अहिंस्रव्रताः देवान्तरानिन्दकाः) शान्ताः (निष्कामाः सन्तः) नारायणकलाः (नारायणस्य अंशावतारान्) हि भजन्ति। श्लोक-भावानुवाद-[निश्चय ही कई लोग विष्णुके अतिरिक्त अन्योंका क्यों भजन करते दिखायी देते हैं? यह सत्य है, यद्यपि मुक्तिकामी अन्योंका भजन नहीं करते हैं, तथापि सकाम व्यक्ति ही ऐसा करते हैं, इसलिये कह रहे हैं-] आगे अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 118॥ साधुसङ्गसे मुक्तिकी कामना-त्याग :- सेइ सबेर साधुसङ्गे गुण स्फुराय। कृष्णभजन कराय, 'मुमुक्षा' छाड़ाय॥ 119॥ अनुवाद-वे सब मुक्तिकामी लोग यदि साधुसङ्ग (शुद्धभक्तोंका सङ्ग) करते हैं, तब वे श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर 'मुक्तिकी कामना' छोड़कर श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 119॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चतुःसन और शुकदेवकी ब्रह्ममयता और नवयोगेन्द्रोंका साधक होना दिखलाकर, 'मुमुक्षु', 'जीवन्मुक्त' और 'प्राप्त-स्वरूप'-इस प्रकारके तीन प्रकारके मोक्षाङ्काक्षी ज्ञानियोंकी बातका विचार करते हुए सर्वप्रथम मुक्तिकामियोंकी बात कह रहे हैं। उन मुक्तिकामियोंको साधुसङ्गमें जब भगवान्के गुणोंकी स्फूर्ति होती है, तब वे मुक्तिकी कामनाको छोड़कर श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 119॥
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