भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1877, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1877

चौबीसवाँ अध्याय [24/136-141] हूँ, ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं॥ 136 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/30 संख्या देखें ॥ 136 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/3) में- य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम्। न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्भ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥ 137 ॥ अनुवाद-इन चारों वर्णाश्रमियोंमेंसे जो अपने प्रभु भगवान् विष्णुका साक्षात् भजन नहीं करके, अपने-अपने वर्णाश्रमके अहङ्कारके कारण उनके भजनमें अवज्ञा करते हैं, वे अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर अधःपतित हो जाते हैं॥ 137 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/28 संख्या देखें ॥ 137 ॥ श्रीमद्भागवत (10/87/21) श्लोकमें श्रीधर-उद्धृत सर्वज्ञ भाष्यकार व्याख्या और नृसिंहतापनी (2/5/16)में- मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते ॥ 138 ॥ अनुवाद-मुक्तगण भी लीलासे आकर्षित होकर विग्रह स्थापित करके भगवान्का भजन करते हैं॥ 138 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/107 संख्या देखें ॥ 138 ॥ पूर्वोक्त छः प्रकारके आत्मारामोंका श्रीकृष्णभजन :- एइ छह आत्माराम कृष्णेरे भजय। पृथक् पृथक् च-कारे इहा 'अपि'र अर्थ कय ॥ 139 ॥ अनुवाद-आत्माराम शब्दके छः प्रकारके अर्थोंमें च-कारका ('तथा'का) अर्थ यहाँ 'अपि' ('भी') ही ग्रहण किया गया है। इसलिये 'ये छः प्रकारके आत्माराम श्रीकृष्णका भजन करते हैं'- इसका अर्थ होगा कि साधक-आत्माराम भी श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर श्रीकृष्णभजन करते हैं, ब्रह्ममय-आत्माराम भी भजन करते हैं, इसी प्रकार अन्य चारोंके लिये भी ऐसा ही जानना होगा ॥ 139 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'छय आत्माराम'-साधक, ब्रह्ममय और प्राप्त-ब्रह्मलय एवं मुमुक्षु, जीवन्मुक्त और प्राप्त-स्वरूप, -ये छय प्रकारके 'आत्माराम' हैं॥ 139 ॥ आत्माराम, मुनि और निर्ग्रन्थ व्यक्तियोंका श्रीकृष्णभजन :- “आत्मारामार्च अपि” करे कृष्णे अहैतुकी भक्ति। “मुनयः सन्तः” इति कृष्णमनने आसक्ति ॥ 140 ॥ अनुवाद-छः प्रकारके आत्माराम भी श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं। 'मुनयः सन्तः'का तात्पर्य यह है कि वे मुनि होकर श्रीकृष्ण-मननमें आसक्त होते हैं॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“ 'मुनयः सन्तः' इति श्रीकृष्णमनने आसक्ति' - आत्मारामगण 'मुनि' बनकर श्रीकृष्णमननमें आसक्त होते हैं ॥ 140 ॥ “निर्ग्रन्थाः”–अविद्याहीन, केह-विधिहीन। याँहा येइ युक्त, सेइ अर्थेर अधीन ॥ 141 ॥ अनुवाद- 'निर्ग्रन्थ'-शब्दके दो अर्थ हैं-अविद्याहीन और विधिहीन। इन दोनोंमेंसे जहाँ जो अर्थ उपयुक्त है, वही प्रयोग किया जाना चाहिये ॥ 141 ॥ अमृतानुकणा- 'एइ छह आत्माराम' - अर्थात् 'ब्रह्मसाधक', 'ब्रह्ममय' और 'प्राप्तब्रह्मलय'-ये तीन ब्रह्मोपासक (103 संख्या) और 'मुमुक्षु', 'जीवन्मुक्त' ('भक्तिसे ही जीवन्मुक्त', 'ज्ञानसे जीवन्मुक्त' नहीं-125 संख्या) और 'प्राप्तस्वरूप' (116 संख्या) - ये तीन प्रकारके मोक्षकी आकाङ्क्षा करनेवाले - इस प्रकार कुल छः प्रकारके आत्माराम हैं। उनके साथ पृथक् पृथक्-रूपमें 'च'-कारके योगसे 'अपि'का अर्थ व्यक्त हुआ है। जैसे, ब्रह्मसाधक-आत्माराम भी 'मुनि' (मननशील) होकर अर्थात् श्रीकृष्णमननमें आसक्त होकर अहैतुकी भक्ति तथा भुक्ति-मुक्ति-सिद्धिकी इच्छाओंसे शून्य होकर भक्ति । 431

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