श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1878, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/139-147 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करते हैं। इस प्रकारसे पृथक् पृथक् रूपसे कहे गये छः प्रकारके आत्मारामगणोंके क्षेत्रमें अर्थको समझना होगा। 'निर्ग्रन्थ अपि' (निर्ग्रन्थ होकर भी)—उनके विशेषणके रूपमें कहा गया है। निर्ग्रन्थ-शब्दके अर्थ अविद्या-ग्रन्थिहीन और विधिहीन हैं। यहाँपर विधिहीन कहनेसे रागमार्ग अन्तर्गत विधिहीनता नहीं है, क्योंकि पहले कहा गया है,—“निर्ग्रन्थ-शब्दे कहे,–(क) अविद्या- ग्रन्थिहीन। (ख) विधिनिषेध-वेदशास्त्र-ज्ञानादिविहीन॥” (16 संख्या)। ये दो अर्थ यहाँपर 'आत्माराम'—शब्दके अर्थके अनुसार युक्त होंगे॥ 139-141॥ अन्य एक प्रकारका अर्थ :— च-शब्दे करि यदि 'इतरेतर' अर्थ। आर एक अर्थ कहे परम समर्थ॥ 142 ॥ “आत्मारामाश्च आत्मारामाश्च” करि बार छय। पञ्च आत्माराम, छये च-कारे लुप्त हय ॥ 143 ॥ एक 'आत्माराम'-शब्दे अवशेष रहे। एक 'आत्माराम'-शब्दे छयजन कहे ॥ 144 ॥ अनुवाद—'च' शब्दका 'इतरेतर' समासके अनुसार अर्थ करनेसे आत्माराम श्लोकका अन्य एक परम उपयुक्त अर्थ निकलता है। यद्यपि छः प्रकारके आत्मारामोंके लिये 'आत्माराम'-शब्द छः बार दोहराना होगा, तथापि (संस्कृत व्याकरणके इस नियमके अनुसार) च-शब्दका 'इतरेतर' समासमें योग करनेपर पाँच आत्माराम लोप हो (समा) जाते हैं और अन्तमें एक 'आत्माराम'-शब्द ही रहता है। वही 'आत्माराम'-शब्द ही छहों आत्मारामोंको बतलाता है। (पय़ार 147 के बाद अमृतानुकणा टीका देखें) ॥ 143-144 ॥ दृष्टान्त—(विश्वप्रकाशमें और पाणिनिमें 1/2/64 और सिद्धान्त-कौमुदीमें अजन्त पुल्लिङ्ग-शब्दके प्रकरणमें) :— “स्वरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ।” उक्तार्थानामप्रयोगः। रामश्च रामश्च रामश्च रामा इतिवत् ॥ 145 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वरूपसे एक जैसे और एक विभक्तिमें जिनका अर्थ कहा जाता है, वहाँ एक स्वरूपको रखकर अन्य सब स्वरूपोंका प्रयोग नहीं होता है, जैसे,—‘रामश्च, रामश्च, रामश्च’,—इनके स्थानपर एक ‘रामाः’ शब्दका प्रयोग होता है ॥ 145 ॥ तबे ये च-कार, सेइ 'समुच्चय' कय। “आत्मारामाश्च मुनयश्च” कृष्णेरे भजय ॥ 146 ॥ अनुवाद—'च'-कारका 'समुच्चय'के (सभीको एकत्रित करके) अर्थमें प्रयोग करनेपर इस पदका अर्थ होगा— “आत्मारामाश्च मुनयश्च” अर्थात् सभी आत्मारामगण और सभी मुनिगण श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 146 ॥ सात प्रकारके अर्थ :— “निर्ग्रन्था अपि”र एइ अपि'—सम्भावने। एइ सात अर्थ प्रथमे करिलुँ व्याख्याने ॥ 147 ॥ अनुवाद—अमृतानुकणा देखें ॥ 147 ॥ अमृतानुकणा—'इतरेतर अर्थ'-योगसे 'च'-शब्दसे एक अन्य व्याख्या दी गई है। जहाँपर प्रत्येक पदकी प्रधानता रहनेपर सभी पदोंका अन्वय होता है, उस प्रकारके द्वन्द्व-समासको ही 'इतरेतर-योग' कहा जाता है। जिस स्थानपर ये सब पद एक ही विभक्ति और एक ही वचनवाले होते हैं—इतरेतर-योगसे तब उनका एक पद मात्र ही बाकी रहता है। जैसे, 'रामश्च रामश्च रामश्च'—ये तीन 'राम'-पदोंमेंसे दो पद लोप हो जानेपर अन्तमें समासबद्ध पद ‘रामाः’ होता है। उसी प्रकार ‘आत्मारामाश्च’, ‘आत्मारामाश्च’ इस रूपमें छः ‘आत्मारामाश्च’-पद 'इतरेतर'-समाससे युक्त होनेपर उनमेंसे पाँच ‘आत्मारामाश्च’-पद लुप्त हो जाते हैं और छठे ‘आत्मारामाश्च’-पदमें ‘च’-कार लुप्त होकर केवल ‘आत्मारामाः’-पद बाकी रहता है, उसके द्वारा उक्त छः प्रकारके आत्माराम ही सूचित होते हैं। यहाँपर 432 |