भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1879

चौबीसवाँ अध्याय 24/142-150 ] 'आत्मारामश्च'-पदमॆं जो 'च'-कार है, उसका तृतीय पुरुष क्षीरोदशायीका ध्यान :- समुच्चय-अर्थमें व्यवहार होनेपर 'आत्मारामश्च मुनयश्च' श्रीमद्भागवत (2/2/8)में— अर्थात् पहले कहे गये छः प्रकारके आत्मारामगण और केचित् स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे मुनिगण श्रीकृष्णभजन करते हैं—इस प्रकारसे अर्थ हुआ प्रादेशमात्रं पुरुषं वसन्तम्। है। 'निर्ग्रन्थ अपि'से 'अपि' सम्भावना-अर्थमें होकर चतुर्भुजं कञ्जरथाङ्गशङ्खगदाधरं आत्मारामगण, मुनिगण और सम्भावना-अर्थमें निर्ग्रन्थगण धारणया स्मरन्ति ॥ 150 ॥ अर्थात् अविद्याग्रन्थिहीन, शास्त्रविधिहीन, मूर्ख, नीच, म्लेच्छ, धन सञ्चय करनेवाले, निर्धन आदि (16, 17 अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 150 ॥ संख्या) श्रीकृष्णभजन करते हैं—इस रूपमें 'इतरेतर'-योगसे अमृतप्रवाह भाष्य—कोई-कोई योगी अपनी देहके प्रकाशित यह अर्थ और पहले कहे गये छः अर्थ भीतर स्थित हृदयमें अवस्थित प्रादेशमात्र (तर्जनी (139-141 संख्या), कुल मिलाकर यहाँ तक सात अङ्गुली और अङ्गुठेके विस्तार जितने परिमाणके) अर्थोंकी व्याख्या हुई है॥ 142-147 ॥ चतुर्भुज शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी पुरुषका धारणाके द्वारा स्मरण किया करते हैं,—यही 'सगर्भ' योगीका लक्षण परमात्मनिष्ठ दो प्रकारके आत्माराम :- है॥ 150 ॥ अन्तर्यामि-उपासके 'आत्माराम' कय। अनुभाष्य—श्रीशुकदेव गोस्वामी परीक्षितको स्थूल सेइ आत्माराम योगीर दुइ भेद हय ॥ 148 ॥ जगत्के विषय-भोगोंको निन्दनीय जानकर उनसे निवृत्त (1) सगर्भ-योगी और (2) निगर्भ-योगी, वैराज-धारणा-निष्ठ योगियोंकी बात बतलाकर उनसे दोनों ही तीन प्रकारके :- श्रेष्ठ व्यष्टि-अन्तर्यामी चिद्घनरूप-ध्यानकारी योगियोंकी सगर्भ, निगर्भ,—एइ हय दुइ भेद। बात बतला रहे हैं,— एक एक तिन भेदे छय विभेद ॥ 149 ॥ केचित् (विरलाः) स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे (स्वदेहस्य निजशरीरस्य अनुवाद—अन्तर्यामी परमात्माके उपासकोंको भी अन्तः मध्ये यत् हृदयं तत्र यः अवकाशः तस्मिन्) वसन्तम् 'आत्माराम' कहते हैं। उन आत्माराम योगियोंके भी दो (अन्तर्यामितया कृतवासं) प्रादेशमात्रं (अङ्गुष्ठतर्जन्यौर्विस्तारः भेद हैं—सगर्भ और निगर्भ। पुनः इन दोनोंके तीन-तीन सः एव मात्रा प्रमाणं यस्य तस्मिन् प्रादेशप्रमाणहृदये ध्येयत्वात्, भेद हैं, इस प्रकार कुल मिलाकर उनके छः विभेद तावन्मात्रप्रदेशेऽप्यचिन्त्यशक्त्या पञ्चदशवर्षीयपुरुषाकारप्रमाणं) चतुर्भुजं हैं॥ 148-149 ॥ कञ्जरथाङ्ग-शङ्खगदाधरं (पद्मचक्रशङ्खगदाधारिणं) पुरुषं (क्षीरोदशायिनं अनुभाष्य—'सगर्भ योगी'—जो योगी उपास्य तृतीयं) धारणया स्मरन्ति। अन्तर्यामीको साकार मानकर उनके रूपका ध्यानादि श्लोक-भावानुवाद—कोई विरले [योगी] अपने करते हैं। 'निगर्भ-योगी'—जो योगी निराकार या शून्यका शरीरके भीतर हृदयमें वास करनेवाले प्रादेशमात्र ध्यानादि करते हैं। सगर्भ और निगर्भ योगियोंके छः परिमाणके (अङ्गुठेसे तर्जनीके विस्तार जितने होनेपर विभाग हैं—1) सगर्भ-योगारुरुक्षु (योगारुरुक्षु अर्थात् भी अचिन्त्य शक्तिके द्वारा पन्द्रह-वर्षीय पुरुषाकारमें) जिन्होंने योगमें आरूढ़ होना प्रारम्भ किया है), 2) पद्म-चक्र-शङ्ख-गदाधारी चतुर्भुजरूप अन्तर्यामी पुरुषका निगर्भ-योगारुरुक्षु, 3) सगर्भ-योगारूढ़, 4) निगर्भ-योगारूढ़, (तृतीय पुरुष क्षीरोदशायीका) धारणासे स्मरण करते 5) सगर्भ-प्राप्तसिद्धि, 6) निगर्भ-प्राप्तसिद्धि ॥ 149 ॥ हैं॥ 150 ॥ । 433