श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1881, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/157-160 ] यहाँ तक तेरह प्रकारके अर्थ :- 'उरुक्रमे' 'अहैतुकी' काँहा कोन अर्थ। एइ तेर अर्थ कहिलुँ परम समर्थ ॥ 157 ॥ अनुवाद—ये छः प्रकारके योगी साधुसङ्गके प्रभावसे श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर श्रीकृष्णका भजन करते हैं। यहाँ 'च'-शब्दसे 'अपि' अर्थ ही होता है और 'मुनि' और 'निर्ग्रन्थ' शब्दोंका अर्थ पहले जैसे होगा। 'अहैतुकी'-शब्द सदा 'उरुक्रम'के साथ ही प्रयोग होगा। इस प्रकार मैंने तुम्हें इस 'आत्मारामश्च' श्लोकके तेरह प्रकारके पृथक् पृथक् अर्थ बतलाये हैं॥ 155-157 ॥ एइ सब शान्त यबे भजे भगवान्। 'शान्त' भक्त करि' तबे कहि ताँर नाम ॥ 158 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 158 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'एइ सब शान्त यबे भजे'—ये सब योगी जब शान्तरसमें आरूढ़ होकर भजन करते हैं, [तब उन्हें 'शान्त' भक्त कहा जाता है।] ॥ 158 ॥ अनुभाष्य—ये तेरह,—(1) साधक, (2) ब्रह्ममय, (3) प्राप्तब्रह्मलय, (4) मुमुक्षु, (5) जीवन्मुक्त, (6) प्राप्तस्वरूप,—ये छः आत्माराम, और (7) निर्ग्रन्थमुनि, (8) सगर्भ-योगारुरुक्षु, (9) निगर्भ-योगारुरुक्षु, (10) सगर्भ-योगारूढ़, (11) निगर्भ-योगारूढ़, (12) सगर्भ-प्राप्तसिद्धि, (13) निगर्भ-प्राप्तसिद्धि ॥ 158 ॥ अमृताणुकणा—पहले आत्मा-शब्दसे 'ब्रह्म'-अर्थ लेनेपर ज्ञानमार्गके उपासकरूप आत्मारामगणोंके सम्बन्धमें सात प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या हुई है। अब आत्मा-शब्दसे 'अन्तर्यामी'-अर्थ लक्षित होनेपर योगमार्गमें जो अन्तर्यामी-उपासक हैं, उन योगियोंको यहाँपर 'आत्माराम' कहा जा रहा है। वे छः प्रकारके हैं-सगर्भ-योगारुरुक्षु सगर्भ-योगारूढ़, सगर्भ-प्राप्तसिद्धि, निगर्भ-योगारुरुक्षु, निगर्भ-योगारूढ़ और निगर्भ-प्राप्तिसिद्धि। यहाँपर भी पहलेके जैसे अर्थात् पहले जो तीन प्रकारके ब्रह्मोपासक और तीन प्रकारके मुक्तिकामी, कुल छः प्रकारके आत्मारामोंकी बात कही गयी है और उस स्थानपर जैसे 'च'-शब्दसे 'अपि'-अर्थ, 'मुनि'-शब्दसे मननशील और 'निर्ग्रन्थ'-शब्दसे अविद्या-ग्रन्थिहीन और विधिहीन अर्थ हुआ है (139-141 संख्या), यहाँपर भी उसी प्रकारसे 'उरुक्रमे' और 'अहैतुकी'-दो शब्दमें जोड़कर ऊपर लिखे छः प्रकारके आत्माराम-योगिगर्णोंके किस क्षेत्रमें कौनसा अर्थ प्रकाशित होगा। जैसे, सगर्भ- योगारुरुक्षु-रूप आत्माराम भी 'निर्ग्रन्थ' होनेपर भी मुनि अर्थात् मननशील होकर उरुक्रम श्रीकृष्णकी भक्ति करते हैं—इस रूपमें छः प्रकारके योगियोंके सम्बन्धमें भी पृथक् पृथक् रूपसे अर्थ समझने होंगे। इसलिये पहले सात प्रकारके और अब छः प्रकारके—कुल तेरह अर्थ व्यक्त हुए हैं। वे सब “शमो मन्निष्ठताबुद्धेः” (भागवत 11/19/36) इस सूत्रमें श्रीकृष्णमें ममतायुक्त-बुद्धिसम्पन्न ना होकर केवल श्रीकृष्णनिष्ठा मात्र प्राप्त करके 'शान्त'-रसाश्रित 'शान्तभक्त' नामसे कहलाते हैं॥ 155-158 ॥ 'आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दकी (3) 'मन' अर्थके द्वारा व्याख्या :- 'आत्मा' शब्दे 'मन' कह—मने येइ रमे। साधुसङ्गे सेइ भजे श्रीकृष्णचरणे ॥ 159 ॥ अनुवाद—'आत्मा' शब्दके अर्थ 'मन'को ग्रहण करनेपर आत्मारामका अर्थ होगा—जो मनमें रमण करता है। ऐसा व्यक्ति भी साधुसङ्गमें श्रीकृष्णके चरणोंका भजन करता है॥ 159 ॥ मनका निग्रह करनेवालेको परमपदकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/87/18)— उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो डहरम्। तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमं पुनरहि यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ 160 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 160 ॥ । 435