श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1882, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/160-163 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य—(ऋषियोंके सम्प्रदाय मार्गमें) जो कर्मयोगमें उदर अर्थात् मणिपुरमें स्थित ब्रह्मकी उपासना करते हैं, वे 'शार्कराक्ष' ऋषि कहलाते हैं और वे कूर्पदृक् अर्थात् स्थूलदृष्टि हैं। और आरुणि ऋषिगण (उस सम्प्रदायके ऋषिगण) जहाँसे नाड़ियोंका विस्तार होता है उस हृदयाकाशमें (सूक्ष्म ब्रह्मकी) उपासना करते हैं। हे अनन्त, उससे उत्कृष्ट जो योगीगण शिरोगत (मूलाधार उदरसे आरम्भ करके हृदयके मध्यमेंसे होकर मस्तक और ब्रह्मरन्ध्र तक बढ़ते हुए) सहस्रदल-पद्मस्वरूप आपकी उपलब्धिके स्थान सुषुम्ना-नामक परमश्रेष्ठ ज्योतिर्मय धाममें पहुँच जाते हैं, वे पुनः मृत्युके मुख अर्थात् संसारमें पतित नहीं होते॥160॥ अनुभाष्य—जनलोकमें ब्रह्मसत्र-यज्ञमें श्रवणके इच्छुक ऋषियोंको चतुःसनमेंसे एक ब्रह्मर्षि सनन्दनने जिन श्रुतियोंके द्वारा इस भगवत्-स्तवका कीर्तन किया था, उसीका ही बादमें आदिनरऋषि श्रीनारायण नारदसे वर्णन कर रहे हैं,— ऋषिवर्त्मसु (ऋषीणां वर्त्मसु सम्प्रदायमार्गेषु) ये कूर्पदृशः (कूर्पं शर्करारजः विद्यते दृक्षु अक्षिषु येषां ते तथा रजःपिहितदृष्टयः शार्कराक्षाः स्थूलदृष्टयः) उदरम् (उदरावलम्बनं मणिपुरकस्थं ब्रह्म) उपासते (ध्यायन्ति); आरुणयः (आरुण्याख्याः ऋषयः) परिसरपद्धतिं (परितः सरन्ति प्रसर्पन्तीति परिसराः नाड्यः तासां पद्धतिं मार्गं प्रसरणस्थानं) हृदयं दहरम् (आकाशावलम्बनं सूक्ष्ममेव ब्रह्म उपासते); हे अनन्त, ततः (हृदयात्) तव परमं (श्रेष्ठं ज्योतिर्मयं) धाम (उपलब्धिस्थानं सुषुम्नाख्यं) शिरः (मूर्द्धानं प्रति) उद्गात् (उदसर्पन्, मूलाधारात् आरभ्य हृदयमध्यात् ब्रह्मरन्ध्रं प्रत्युद्गतमित्यर्थः),—यत् [तव धाम] समेत्य (प्राप्य) इह कृतान्तमुखे (कृतान्तस्य कालस्य मृत्योः मुखे संसारे) न पतन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥160॥ निगृहीत-चित्त मुनियोंके द्वारा श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर शुद्धभक्ति :— एहो कृष्णगुणाकृष्ट महामुनि हञा। अहैतुकी भक्ति करे निर्ग्रन्थ हञा॥161॥ अनुवाद—मनमें रमण करनेवाला ऐसा योगी भी श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर महामुनि (श्रीकृष्ण मननमें आसक्त) हो जाता है और वह भी निर्ग्रन्थ होकर श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करता है॥161॥ ‘आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके (4) 'यत्न' अर्थके द्वारा व्याख्या :— ‘आत्मा'-शब्दे 'यत्न' कहे—यत्न करिया। “मुनयोऽपि” कृष्ण भजे निर्ग्रन्थ हञा॥162॥ अनुवाद—'आत्मा'-शब्दका अर्थ 'यत्न' भी है अर्थात् श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर मुनि भी निर्ग्रन्थ होकर श्रीकृष्णभजनके लिये दृढ़ प्रयास करते हैं॥162॥ नित्यसत्य वास्तव वस्तुके अनुसन्धानके लिये प्रयत्न करना कर्त्तव्य :— श्रीमद्भागवत (1/5/18)में— तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः। तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं कालेन सर्वत्र गभीर-रंहसा॥163॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥163॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो सत्यलोक अथवा ब्रह्मलोकादि ऊपरके लोकोंमें एवं सुतल और अतलादि निम्न लोकोंमें भ्रमण करनेपर भी प्राप्त नहीं होती, ऐसी दुर्लभ वस्तुके लिये सभी पण्डितलोग प्रयत्न करेंगे, क्योंकि चौदह भुवनोंके ऊपरी और निम्न लोकोंमें जो सुख हैं, वे सभी गम्भीर वेगसे युक्त कालके द्वारा दुःखकी भाँति अनायास ही प्राप्त होते हैं॥163॥ अनुभाष्य—जब श्रीव्यासदेव बहुत तपस्याका अनुष्ठान करके और समस्त शास्त्रोंका प्रणयन करनेपर भी आत्म-प्रसन्नताको प्राप्त करनेसे वञ्चित होकर सरस्वती नदीके तटपर मन-ही-मनमें अनेक प्रकारके कुतर्क और खेद कर रहे थे, तभी उनके अन्तर्यामी गुरुदेव श्रीनारद गोस्वामी उनके निकट आकर उपस्थित हुए। 436 |