भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1883

चौबीसवाँ अध्याय 24/163-167 ] श्रीव्यासदेवने जब उनसे आत्म-प्रसन्नता न होनेका कारण पूछा, तब श्रीनारदने हरिभक्ति और हरिकथाके माहात्म्यको बतलाकर नित्य-तत्त्व श्रीकृष्णभक्तिके लिये प्रयत्न करनेके लिये कहा,– उपर्यधः (उपरि आब्रह्मलोकात् अधः स्थावरपर्यन्तं) भ्रमतां (विवक्षायां षष्ठी, भ्रमद्भिः जीवैः) यत् (सुखं) न लभ्यते (नैव प्राप्यते), कोविदः (विवेकशीलः) तस्यैव (तादृशस्य सुखस्य एव) हेतोः प्रयतेत (यत्नं कुर्यात्); गभीर-रंहसा (अनतिक्रम्यवेगेन) कालेन दुःखवत् (अप्रार्थितानि दुःखानि यथैवायान्ति देहिनां, तथैव) तं सुखं (विषयसुखं) अन्यतः (अन्यस्मात् प्राक्तनकर्मतः) सर्वत्र (सर्वयोनिषु) [प्रयत्नं बिनापि] लभ्यते (प्राप्यते)। श्लोक-भावानुवाद—ब्रह्मलोकसे स्थावर योनियों तक भ्रमण करते हुए जीवोंको जो सुख प्राप्त नहीं होता, विवेकी लोग वैसे सुखकी प्राप्तिके प्रयत्न करते हैं। जिसका अतिक्रम नहीं किया जा सकता, वह काल न चाहनेपर भी जैसे जीवोंको दुःख प्रदान करता है, वैसे ही विषयसुख पूर्व कर्मोंके फलस्वरूप सभी योनियोंमें बिना प्रयासके प्राप्त होते हैं ॥ 163 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/103)में उद्धृत नारदीयवाक्य :— सद्धर्मस्यावबोधाय येषां निर्बन्धिनी मतिः। अचिरादेव सर्वार्थः सिद्ध्यत्येषामभीप्सितः ॥ 164 ॥ अनुवाद—सद्धर्मको उदित करानेके लिये जिनकी दृढ़ा मति है, उनकी शीघ्र ही अभिलषित सर्वार्थ-सिद्धि होती है॥ 164 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 20/106 संख्या देखें ॥ 164 ॥ आग्रहपूर्वक यत्न अथवा उत्साह और निश्चयसे ही भक्तिकी सिद्धि :— च-शब्द अपि-अर्थे, 'अपि'—अवधारणे। यत्नाग्रह बिना भक्ति ना जन्माय प्रेमे ॥ 165 ॥ अनुवाद—अमृतानुकणा देखें ॥ 165 ॥ अमृतानुकणा—यहाँपर 'च'-शब्दसे अपि-अर्थ होकर 'मुनयश्च'–मुनयोऽपि अर्थात् मुनिगण भी 'आत्मारामः'– (आत्मा-शब्दसे यत्न-अर्थके कारण) यत्नपरायण होकर 'निर्ग्रन्थ अपि'—(अपि-शब्दके निश्चय अर्थमें) अविद्याग्रन्थिहीन होकर उरुक्रम श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं, क्योंकि भक्तिमें यत्न और आग्रहके बिना कभी भी सुदुर्लभ 'प्रेम' प्राप्त नहीं हो सकता ॥ 165 ॥ आसङ्ग ही आग्रहपूर्वक प्रयत्न :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/35)– साधनौघैरनासङ्गैरलभ्या सुचिरादपि। हरिणा चाश्वदेयेति द्विधा सा स्यात् सुदुर्लभा ॥ 166 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 166 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्ति दो प्रकारसे सुदुर्लभा है,–(1) आसङ्ग-शून्य (श्रीकृष्णप्रीतिवाञ्छा-रहित) होनेपर सैकड़ों साधनोंके द्वारा भी शीघ्र प्राप्त नहीं होती और (2) श्रीकृष्ण भी सहसा भक्ति नहीं देते ॥ 166 ॥ अनुभाष्य— अनासङ्गैः (सङ्गरहितैः) साधनौधैः (साधनपुञ्जैः) सुचिरात् (बहुकालेन) अपि [भक्तिः] अलभ्या (लब्धुमशक्या) हरिणा (भगवता) आशु (शीघ्रम्) अदेया (“मुक्तिं ददाति कर्हिचित् स्म न भक्तियोगम्” इति (भाः 5/6/18) वचनात् च—इति) सा सुदुर्लभा भक्तिः द्विधा स्यात् (प्रकारद्वयेनापि तस्याः दुर्लभत्वमित्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—सङ्गरहित होकर बहुकाल तक अनेक साधन करनेपर भी भक्ति प्राप्त नहीं होती और भगवान् भी शीघ्र भक्ति नहीं देते ('भगवान् मुक्ति तो दे देते हैं, किन्तु भक्तियोग सहज ही नहीं देते'-(भाः 5/6/18) वचनके अनुसार) वह सुदुर्लभा भक्ति दो प्रकारकी है (दो प्रकारकी होनेपर भी वह दुर्लभ है—यह अर्थ है।)।। 166 ।। निरन्तर योग ही आग्रहपूर्वक यत्न :— श्रीमद्भगवद्गीता (10/10)में– तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ 167 ॥ । 437