भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1884, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1884

[ 24/167-171 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—नित्य भक्तियोगके द्वारा जो लोग प्रीतिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, मैं उनको शुद्धज्ञानजनित विमल-प्रेमयोग दान करता हूँ। वे लोग उस ज्ञानके द्वारा मेरे परमानन्द धामको प्राप्त करते हैं॥167॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/49 संख्या देखें ॥167॥ "आत्मारामः" - पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके (5) 'धृति'- अर्थके द्वारा व्याख्या :- 'आत्मा'-शब्दे 'धृति' कहे-धैर्ये येइ रमे। धैर्यवन्त तबे हञा करय भजने॥ 168॥ अनुवाद - 'आत्मा' - शब्दका अर्थ 'धृति' स्वीकार करनेपर आत्मारामका अर्थ होगा- जो धैर्यशील होकर रमण करते हैं। वे धैर्यशील होकर श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 168 ॥ मुनि और निर्ग्रन्थ-इन दोनों शब्दोंके अर्थ; विष्णु-वैष्णवकी कृपासे दोनोंको भक्तिकी प्राप्ति :- 'मुनि'-शब्दे-पक्षी, भृङ्ग; 'निर्ग्रन्थे' - मूर्खजन। कृष्णकृपाय साधुकृपाय दाँहार भजन ॥ 169 ॥ अनुवाद - 'मुनि' - शब्दका अर्थ पक्षी और भ्रमर है। 'निर्ग्रन्थ'-शब्दका अर्थ मूर्ख-लोग है। ये दोनों अर्थात् पक्षी-भ्रमरादि और मूर्खजन भी श्रीकृष्णकी कृपा तथा साधुकी कृपासे श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 169 ॥ ब्रजके पक्षी भी श्रीकृष्णनिष्ठ मुनि :- श्रीमद्भागवत (10/21/14)में- प्रायो बताम्ब मुनयो विहगा वनेऽस्मिन् कृष्णेक्षितं तदुदितं कलवेणुगीतम्। आरुह्य ये द्रुमभुजान् रुचिरप्रवालान् शृण्वन्ति मीलितदृशो विगतान्यवाचः ॥ 170॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 170 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे माते! इस वनमें जो सब पक्षी सुन्दर-सुन्दर पल्लवोंसे सुशोभित वृक्षोंकी शाखाओं आदिपर बैठकर नेत्र बन्द करके और कलरव करना बन्द करके श्रीकृष्णके मुखसे निकले कल-वेणुगीतको श्रवण करते हैं, वे भी प्रायः मुनिकी भाँति ही हैं॥ 170 ॥ अनुभाष्य-व्रजमें शरत्कालके आनेपर श्रीकृष्णने वन-वनमें वंशीध्वनि करके परिभ्रमण करना आरम्भ किया, उनकी उस वंशीध्वनिको सुनकर गोपियाँ श्रीकृष्णके सङ्गके लिये कामातुर होकर गान कर रही हैं, - हे अम्ब, अस्मिन् वने ये विहगाः (पक्षिणः) ते प्रायः (प्रायेण) मुनयः एव, यतः ते (पक्षिणः) कृष्णेक्षितं (कृष्णदर्शनं पुष्पफलाद्यन्तरं बिना यथा भवति, तथा) रुचिरप्रवालान् (रुचिराः शोभनाः प्रवालाः येषां तान् विचित्रोपशाखायुक्तान्) द्रुमभुजान् (वृक्षाणां शाखाः) आरुह्य [केनापि सुखेन] मीलितदृशः (निमीलित-नयनाः) विगतान्यवाचः (त्यक्तान्यशब्दाः सन्तः) तदुदितं (तेनैव कृष्णेन प्रकटितं) कलवेणुगीतं (मधुरमुरलीनिनादं) शृण्वन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 170 ॥ ब्रजके भ्रमर भी श्रीकृष्णनिष्ठ मुनि :- श्रीमद्भागवत (10/15/7)में- एतेऽलिनस्तव यशोऽखिल-लोकतीर्थं गायन्त आदिपुरुषानुपथं भजन्ते। प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या गूढं वनेऽपि न जहत्यनघात्मदेवम्॥ 171 ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 171 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- हे अनघ (पापशून्य)! हे आदिपुरुष ! ये सब भँवरे समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाले आपके यशसमूहका गान करते-करते (आपके जानेके मार्गपर आपके पीछे जाकर) भजन कर रहे हैं; ये भँवरेका वेष धारण करनेवाले मुनिगण आत्मदेवतारूप आपको आपके गूढ़रूपमें होनेपर भी परित्याग नहीं कर रहे हैं॥ 171 ॥ अनुभाष्य-पौगण्ड-अवस्थामें पदार्पण करके भगवान् श्रीकृष्ण एक बार श्रीबलरामके साथ पुष्पोंसे भरे वनमें प्रवेश करके चारों ओरकी शोभा देखकर विहार 438