श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1885, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय [ 24/171–173 ]
करनेके इच्छा करके बड़े भाई बलरामकी प्रशंसा करते हुए कह रहे हैं,— हे आदिपुरुष (सर्वेषां सत्त्वानां कारणभूत-सन्धिनी-शक्तिमद्विग्रह), एते अलिनः (भृङ्गाः) तव अखिललोकतीर्थ (सकललोकपावनं) यशः गायन्तः अनुपथं (पथि पथि) भजन्ते; हे अनघ (शुद्धसत्त्वाधीश विग्रह), अमी भवदीय मुख्याः (त्वदीयानां मुख्याः प्रधानाः) मुनिगणाः वने गूढम् (अज्ञातम्) अपि आत्मदैवं (सेश्वरं तां) प्रायः न जहति (न त्यजन्ति त्वयि मनुष्यवेषेण निगूढे सति मुनयोऽप्यलिवेषेण निगूढास्त्वां भजन्तीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें। यहाँ पाठान्तरमें,— (भाः 10/15/7) यह श्लोक लक्षित होता है— “नृत्यन्त्यमी शिखिन ईड्य मुदा हरिण्यः कुर्वन्ति गोप्य इव ते प्रियमीक्षणेन। सूक्तैश्च कोकिलगणाः गृहमागताय धन्या वनौकस इयान् हि सतां निसर्गः॥” इसका अर्थ है,— “हे स्तुत्यर्ह (पूजनीय), मयूरगण अपने घरमें आये आपको देखकर परमानन्दमें नृत्य कर रहे हैं, हिरणियाँ गोपियोंके समान दृष्टि निक्षेप करके और कोयलें मधुर शब्द करके प्रीति उत्पन्न कर रही हैं; वृन्दावनवासी ही धन्य हैं, क्योंकि इसी प्रकार ही अर्थात् अपनी-अपनी वस्तुको प्रदान करना ही साधुओंका स्वभाव है॥” 171 ॥
ब्रजके हंस-सारसादि पक्षी भी श्रीकृष्णनिष्ठ मुनि :— श्रीमद्भागवत (10/35/11) में— सरसि सारसहंसविहङ्गा- श्चारुगीतहतचेतस एत्य। हरिमुपासत ते यतचित्ता हन्त मीलितदृशो धृतमौनाः॥ 172॥
अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 172 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— जलाशयमें सारस, हंसादि पक्षीगण (श्रीकृष्णकी वंशीसे निकले) मधुर गीतसे आकृष्ट होकर आ जाते हैं और संयत चित्तसे नेत्र बन्द करके मौन धारण करते हुए हरिकी उपासना करते हैं॥ 172 ॥
अनुभाष्य— दिनके समय श्रीकृष्णके वनमें जानेपर विरह-सन्तप्त गोपियाँ परस्पर इस प्रकार गीतका गान करती थीं,— [यर्हि अधरे कृष्णः सन्धितवेणुर्भवति तर्हीति पूर्वेणान्वयः] सरसि (सरोवरे) ये सारसहंसविहङ्गाः चारुगीतहतचेतसः (चारुणा वेणुगीतेन हतानि आकृष्टानि चेतांसि येषां ते) एत्य (आगत्य) हन्त (विषादे) यतचित्ताः (संयतमनाः) धृतमौनाः (निःशब्दाः) मीलितदृशः (मुदितनेत्राः सन्तः) हरिम् उपासत (अभजन्त, तत्समीपे उपविविशुर्वा)। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 172 ॥
शुद्धभक्तकी कृपासे अशुद्ध जातिकी भी शुद्धि :— श्रीमद्भागवत (2/4/18)— किरातहूनान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा आभीरकङ्का यवनाः खशादयः। येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 173 ॥
अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 173 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— किरात, हूण, अन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश, आभीर, (शुष्म) कङ्क, यवन और खशादि तथा अन्य जो समस्त पापयोनि जातियाँ हैं, वे सब जातियाँ ही जिनके आश्रित-वैष्णवोंके आश्रयमें भली-भाँति शुद्ध हो जाती हैं, मैं ऐसे प्रभावसे युक्त विष्णुको नमस्कार करता हूँ॥ 173 ॥
अनुभाष्य— श्रीशुकके मुखसे हरिकथा सुनकर परीक्षितके द्वारा श्रीकृष्णमें ऐकान्तिक मतिसे युक्त होकर मायाधीश भगवान्की सृष्टि आदि लीलाके विषयमें जिज्ञासा करनेपर उसके उत्तरमें श्रीशुक सर्वप्रथम भगवान्को प्रणाम करके मङ्गलाचरण कर रहे हैं,— किरातहूनान्ध्रपुलिन्दपुक्कशाः आभीर-कङ्काः यवनाः खशादयः (पापयोनयः) अन्ये ये पापाः (स्व-स्व-प्राक्तन-कर्मतः पापजातयः) यदुपाश्रयाश्रयाः (यस्य भगवतः उपाश्रयाः आश्रिताः भागवत-वैष्णवाः तदाश्रयाः भक्ताश्रिताः सन्तः) शुध्यन्ति (पवित्री भवन्ति) तस्मै प्रभविष्णवे (प्रभावशालिने भगवत विष्णवे) नमः।
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