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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

चौबीसवाँ अध्याय [ 24/171–173 ]

करनेके इच्छा करके बड़े भाई बलरामकी प्रशंसा करते हुए कह रहे हैं,— हे आदिपुरुष (सर्वेषां सत्त्वानां कारणभूत-सन्धिनी-शक्तिमद्विग्रह), एते अलिनः (भृङ्गाः) तव अखिललोकतीर्थ (सकललोकपावनं) यशः गायन्तः अनुपथं (पथि पथि) भजन्ते; हे अनघ (शुद्धसत्त्वाधीश विग्रह), अमी भवदीय मुख्याः (त्वदीयानां मुख्याः प्रधानाः) मुनिगणाः वने गूढम् (अज्ञातम्) अपि आत्मदैवं (सेश्वरं तां) प्रायः न जहति (न त्यजन्ति त्वयि मनुष्यवेषेण निगूढे सति मुनयोऽप्यलिवेषेण निगूढास्त्वां भजन्तीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें। यहाँ पाठान्तरमें,— (भाः 10/15/7) यह श्लोक लक्षित होता है— “नृत्यन्त्यमी शिखिन ईड्य मुदा हरिण्यः कुर्वन्ति गोप्य इव ते प्रियमीक्षणेन। सूक्तैश्च कोकिलगणाः गृहमागताय धन्या वनौकस इयान् हि सतां निसर्गः॥” इसका अर्थ है,— “हे स्तुत्यर्ह (पूजनीय), मयूरगण अपने घरमें आये आपको देखकर परमानन्दमें नृत्य कर रहे हैं, हिरणियाँ गोपियोंके समान दृष्टि निक्षेप करके और कोयलें मधुर शब्द करके प्रीति उत्पन्न कर रही हैं; वृन्दावनवासी ही धन्य हैं, क्योंकि इसी प्रकार ही अर्थात् अपनी-अपनी वस्तुको प्रदान करना ही साधुओंका स्वभाव है॥” 171 ॥

ब्रजके हंस-सारसादि पक्षी भी श्रीकृष्णनिष्ठ मुनि :— श्रीमद्भागवत (10/35/11) में— सरसि सारसहंसविहङ्गा- श्चारुगीतहतचेतस एत्य। हरिमुपासत ते यतचित्ता हन्त मीलितदृशो धृतमौनाः॥ 172॥

अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 172 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— जलाशयमें सारस, हंसादि पक्षीगण (श्रीकृष्णकी वंशीसे निकले) मधुर गीतसे आकृष्ट होकर आ जाते हैं और संयत चित्तसे नेत्र बन्द करके मौन धारण करते हुए हरिकी उपासना करते हैं॥ 172 ॥

अनुभाष्य— दिनके समय श्रीकृष्णके वनमें जानेपर विरह-सन्तप्त गोपियाँ परस्पर इस प्रकार गीतका गान करती थीं,— [यर्हि अधरे कृष्णः सन्धितवेणुर्भवति तर्हीति पूर्वेणान्वयः] सरसि (सरोवरे) ये सारसहंसविहङ्गाः चारुगीतहतचेतसः (चारुणा वेणुगीतेन हतानि आकृष्टानि चेतांसि येषां ते) एत्य (आगत्य) हन्त (विषादे) यतचित्ताः (संयतमनाः) धृतमौनाः (निःशब्दाः) मीलितदृशः (मुदितनेत्राः सन्तः) हरिम् उपासत (अभजन्त, तत्समीपे उपविविशुर्वा)। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 172 ॥

शुद्धभक्तकी कृपासे अशुद्ध जातिकी भी शुद्धि :— श्रीमद्भागवत (2/4/18)— किरातहूनान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा आभीरकङ्का यवनाः खशादयः। येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 173 ॥

अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 173 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— किरात, हूण, अन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश, आभीर, (शुष्म) कङ्क, यवन और खशादि तथा अन्य जो समस्त पापयोनि जातियाँ हैं, वे सब जातियाँ ही जिनके आश्रित-वैष्णवोंके आश्रयमें भली-भाँति शुद्ध हो जाती हैं, मैं ऐसे प्रभावसे युक्त विष्णुको नमस्कार करता हूँ॥ 173 ॥

अनुभाष्य— श्रीशुकके मुखसे हरिकथा सुनकर परीक्षितके द्वारा श्रीकृष्णमें ऐकान्तिक मतिसे युक्त होकर मायाधीश भगवान्‌की सृष्टि आदि लीलाके विषयमें जिज्ञासा करनेपर उसके उत्तरमें श्रीशुक सर्वप्रथम भगवान्‌को प्रणाम करके मङ्गलाचरण कर रहे हैं,— किरातहूनान्ध्रपुलिन्दपुक्कशाः आभीर-कङ्काः यवनाः खशादयः (पापयोनयः) अन्ये ये पापाः (स्व-स्व-प्राक्तन-कर्मतः पापजातयः) यदुपाश्रयाश्रयाः (यस्य भगवतः उपाश्रयाः आश्रिताः भागवत-वैष्णवाः तदाश्रयाः भक्ताश्रिताः सन्तः) शुध्यन्ति (पवित्री भवन्ति) तस्मै प्रभविष्णवे (प्रभावशालिने भगवत विष्णवे) नमः।


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[ 24/173-178 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 173 ॥ 'धृति'-शब्दका अन्य अर्थ :- किंवा 'धृति'-शब्दे निजपूर्णतादि-ज्ञान कय। दुःखाभावे उत्तमप्राप्त्ये महापूर्ण हय ॥ 174 ॥ अनुवाद-अथवा 'धृति'-शब्दका अर्थ अपनी पूर्णता आदिका ज्ञान भी कहा गया है। उत्तम वस्तु अर्थात् भगवद्-प्रेम प्राप्त होनेपर पूर्णताका ज्ञान होता है और सांसारिक वस्तुओंमें आसक्ति दूर हो जाती है, इसलिये दुःखका अभाव होता है, तब व्यक्ति महापूर्ण हो जाता है॥ 174 ॥ धृतिकी संज्ञा :- भक्तिरसामृतसिन्धु (2/4/144)- धृतिः स्यात् पूर्णता-ज्ञानं दुःखाभावोत्तमाप्तिभिः। अप्राप्तातीत-नष्टार्थानभिशोचनादिकृत् ॥ 175 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उत्तम लाभके द्वारा दुःखका न होना और पूर्णता-ज्ञानमें ही 'धृति' होती है। जो प्राप्त नहीं हुआ और अतीतमें संग्रह किये धनके नष्ट होनेपर जो शोक होता है, उसे 'धृति' ही दूर करती है॥ 175 ॥ अनुभाष्य- दुःखाभावोत्तमाप्तिभिः (दुःखस्य अभावः तेन उत्तमस्य उद्गतं तमः यस्मात् सः प्रेमा, तस्य परमपुरुषार्थस्य प्रेम्णः आप्तिभिः च यत्) पूर्णता-ज्ञानम् (आत्मप्रसादानुभवः, तत् एव) धृतिः ; (सा)-अप्राप्तातीतनष्टार्थानभिशोचनादिकृत् (अप्राप्तस्य अतीतस्य नष्टस्य च अर्थस्य विषयस्य हेतोः अनभिशोचनं करोति या सा, अभिशोचनाभावः या सम्पाद्यते इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ श्लोकका अर्थ :- कृष्णभक्त-दुःखहीन, वाञ्छान्तर-हीन। कृष्णप्रेम-सेवा-पूर्णानन्द-प्रवीण ॥ 176 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णभक्तकी श्रीकृष्णसेवाके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा ही नहीं होती, इसलिये उसे अन्य कोई इच्छा पूर्ण नहीं होनेका दुःख अनुभव नहीं होता। श्रीकृष्णकी प्रेमपूर्वक की गयी सेवाके द्वारा उसका हृदय सदा पूर्णतमरूपमें आनन्दित रहता है॥ 176 ॥ श्रीकृष्णसेवामें ही भक्त सन्तुष्ट, असन्तोषजनक अन्य कामनाओंका अभाव :- श्रीमद्भागवत (9/4/67)में- मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादि-चतुष्टयम्। नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत् कालविप्लुतम् ॥ 177 ॥ अनुवाद-मेरी सेवासे ही परिपूर्ण-हृदयवाले शुद्धभक्त मेरी सेवाके द्वारा सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियाँ स्वयं आनेपर भी जब उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, तब मायिक (स्वर्गादि) भोग और सायुज्य मुक्ति, जो कालके द्वारा अति शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, उनकी इच्छा वे क्यों करेंगे? सायुज्यमुक्तिके द्वारा जीवकी सत्ता कालका ग्रास बन जाती है, इसलिये भुक्ति और सायुज्य-मुक्ति, ये स्थायी नहीं हैं॥ 177 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/208 संख्या देखें ॥ 177 ॥ सभी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अनुशीलनमें निष्ठ भक्त ही धीर और स्थिर :- श्रीगोस्वामिपादोक्त-श्लोक- हृषीकेशे हृषीकाणि यस्य स्थैर्यगतानि हि। स एव धैर्यमाप्नोति संसारे जीवचञ्चले ॥ 178 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 178 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इस जीवचञ्चल (क्षण-भङ्गुर) संसारमें जिस व्यक्तिकी समस्त इन्द्रियाँ हृषीकेश-श्रीकृष्णमें स्थिर हुई हैं, उस व्यक्तिने ही धैर्य प्राप्त किया है॥ 178 ॥ अनुभाष्य- यस्य हृषीकाणि (इन्द्रियाणि) हृषीकेशे (सर्वानियन्तरि भगवति) स्थैर्यगतानि (उपशमं लब्धानि) स एव जीवचञ्चले (क्षणभङ्गुर) संसारे धैर्यम् आप्नोति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 178 ॥ 440 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/179-184 ] 'आत्माराम':—धैर्यवान, 'मुनय:'—पक्षिगण, (शास्त्र-ज्ञानरहित) 'मूर्ख'। ये दो प्रकारके आत्माराम 'निर्ग्रन्था:'—मूर्खगण :— श्रीकृष्णकी कृपासे और साधुसङ्गमें श्रीकृष्णमें रतिरूपा- 'च'—अवधारणे, इहा 'अपि'—समुच्चये। बुद्धिको प्राप्त करते हैं। वे शुद्धबुद्धिसे युक्त होकर धृतिमन्त हञा भजे पक्षि-मूर्खचये ॥ 179 ॥ अन्य सबका त्याग करके श्रीकृष्णभक्ति करते हैं॥ 180-182 ॥ अनुवाद—अमृतानुकणा देखें॥ 179 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—“सब छाड़ि' शुद्धभक्ति करे अमृतानुकणा—आत्मा-शब्दसे 'धृति'-अर्थ, 'च'-कारसे कृष्ण-पाय। कृष्णकृपाय साधुसङ्गे विचार-बुद्धि पाय॥” अवधारण-अर्थ (निश्चय-अर्थ) और 'अपि'-शब्दसे [अर्थात् सब कुछ त्याग करके वे श्रीकृष्णके समुच्चय-अर्थ ग्रहण करके 'मुनय:' और 'निर्ग्रन्थ अपि' चरणकमलोंकी शुद्धभक्ति करते हैं और श्रीकृष्ण-कृपासे अर्थात् मुनिरूप पक्षीगण एवं मूर्खगण 'आत्मारामश्च'— तथा साधुसङ्गमें विचार-बुद्धि प्राप्त करते हैं।]॥ 182 ॥ निश्चय रूपमें धृतिमान (अर्थात् धैर्यशील अथवा श्रीमद्भगवद्गीता (10/8)में— भगवत्सम्बन्धज्ञान-हेतु दुःखशून्य और उत्तमवस्तु अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्त्तते। भगवत्प्रेम-प्राप्ति हेतु पूर्णानन्द) होकर उरुक्रम-श्रीकृष्णकी इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ 183 ॥ अहैतुकी भक्ति करते हैं, इस प्रकारसे अर्थ होता अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 183 ॥ है॥ 179 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं सभीका प्रभव (उत्पत्ति)-स्थान 'आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके हूँ और मुझसे ही सब कुछ प्रवर्त्तित हुआ है; ऐसा (6) 'बुद्धि'-अर्थकी व्याख्या :— जानकर सब पण्डितगण भक्तियुक्त होकर मेरा भजन 'आत्मा'-शब्दे 'बुद्धि' कहे बुद्धिविशेष। करते हैं॥ 183 ॥ सामान्यबुद्धियुक्त यत जीव अशेष ॥ 180 ॥ अनुभाष्य— पण्डित और मूर्खके भेदसे बुद्ध्याराम दो प्रकारके :— अहं (कृष्णः) सर्वस्य (विधिरुद्राणां प्रपञ्चस्य च) प्रभवः बुद्ध्ये रमे आत्माराम—दुइ त' प्रकार। (हेतुः जन्मकारणम्); मत्तः (सर्वकारणकारणभूतात्) सर्वं 'पण्डित' मुनिगण, निर्ग्रन्थ 'मूर्ख' आर ॥ 181 ॥ (वस्तु) प्रवर्त्तते (मदधीनप्रवृत्तिकम्)—इति मत्वा बुधाः साधु और श्रीकृष्णकी कृपासे सद्बुद्धिकी (कृष्णरसविदः) भावसमन्विताः (प्रेमयुक्ताः सन्तः) मां भजन्ते। प्राप्ति और श्रीकृष्णभजन :— श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 183 ॥ कृष्णकृपाय साधुसङ्गे रति-बुद्धि पाय। भक्तकी कृपासे श्रौत-पथका अनुसरण करते हुए नीच सब छाड़ि' कृष्णभक्ति शुद्धबुद्ध्ये पाय ॥ 182 ॥ त्रियर्क जातिकी भी मायासे मुक्ति :— श्रीमद्भागवत (2/7/46)में— अनुवाद—'आत्मा'-शब्दका अर्थ 'बुद्धि' ग्रहण करनेसे ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां विशेष बुद्धिको लक्ष्य किया जाता है। किन्तु कम हो स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः। या अधिक हो, सभी जीवोंमें बुद्धि होती है, इसलिये यद्यद्भुतक्रमपरायण-शील-शिक्षा- सामान्य बुद्धिसे युक्त असंख्य जीवोंको भी स्वीकार स्तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा ये ॥ 184 ॥ किया गया है। जो अपनी बुद्धिका सदुपयोग करते हैं, अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 184 ॥ वे आत्माराम कहलाते हैं। ऐसे आत्माराम दो प्रकारके होते हैं, एक—'पण्डित' मुनिगण और दूसरे निर्ग्रन्थ । 441

[ 24/184-189 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अमृतप्रवाह भाष्य-स्त्री, शूद्र, हूण, शबरादि पापयोनिवाले जीव और पक्षी आदि तिर्यक-जातियाँ भी जब अद्भुतक्रम (भगवान् श्रीउरुक्रम) परायणगणोंसे (अर्थात् शुद्धभक्तोंके आचरणके अनुसरणसे) शिक्षा प्राप्त (अर्थात् भगवद्भक्त) होकर (दुस्तर दैवी) मायासे उद्धार प्राप्त कर लेते हैं, तब श्रौतपन्थी व्यक्तियोंका तो कहना ही क्या ? ॥ 184 ॥

श्रीमद्भगवद्गीता (10/10)में- तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ 186 ॥

अनुवाद-नित्य भक्तियोगके द्वारा जो लोग प्रीतिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, मैं उनको शुद्धज्ञानजनित विमल-प्रेमयोग दान करता हूँ। वे लोग उस ज्ञानके द्वारा मेरे परमानन्द धामको प्राप्त करते हैं॥186॥

अनुभाष्य-आदिलीला 1/49 संख्या देखें ॥186॥

अनुभाष्य-ब्रह्मा अपने शिष्य नारदसे भगवान् विष्णुके लीलावतार-समूहकी क्रिया, प्रयोजन और विभूतिसमूहका वर्णन करके उनकी दुस्तर मायासे मुक्त शरणागत उच्चकुलमें उत्पन्न भक्तोंके नामोंका वर्णन करके निम्नकुलमें उत्पन्न जनगणोंकी भी श्रौतपन्थामें मुक्ति-प्राप्तिकी योग्यताकी बात बतला रहे हैं,-

सर्वश्रेष्ठ पाँच प्रकारके साधन :- सत्सङ्ग, कृष्णसेवा, भागवत, नाम। व्रजे वास,-एइ पञ्चसाधन प्रधान ॥ 187 ॥

पाँच प्रकारके साधनोंमेंसे किसी एकके सामान्य अनुशीलनसे ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- एइ पञ्च-मध्ये एक 'स्वल्प' यदि हय। सुबुद्धि जनेर हय कृष्णप्रेमोदय ॥ 188 ॥

यदि स्त्रीशूद्रहूणशबरा पापजीवाः (पापयोनयः) तथा तिर्यक्जनाः अपि अद्भुतक्रमपरायणशील-शिक्षाः (अद्भुताः विस्मयोत्पादिकाः क्रमाः पादन्यासाः यस्य हरेः तस्य परायणाः हरिजनाः तेषां शीले स्वभावे शिक्षा येषां ते-ये शुद्धभक्त-शिष्याः सन्तः कृष्णभक्तसङ्गैः गठितचरित्राः भवन्ति, तर्हि एवम्भूताः) ते अपि देवमायां वै विदन्ति (जानन्ति) अतितरन्ति (अतिक्रामन्ति) च; [अतः] ये (भक्ताः) श्रुतधारणाः (श्रुतं भगवतः नामरूप- गुण-लीलादि-तत्त्वं धारयन्ति श्रौतमार्गेण ये, ते) किमु (पुनः तेषां किं वक्तव्यम्?-निश्चितमेव ते मायां विदन्ति अतितरन्तीत्यर्थः)।

अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 187 ॥ इन पाँच साधनोंमेंसे यदि कोई किसी एक अङ्गका भी 'स्वल्प' मात्रामें पालन करता है, तब ऐसे बुद्धिमान व्यक्तिमें श्रीकृष्णप्रेमका उदय होता है॥188॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'भागवत, नाम' - श्रीमद्भागवत और श्रीकृष्णनाम ॥ 187 ॥

अनुभाष्य-श्रीकृष्णभक्तसङ्ग, श्रीकृष्णसेवा, श्रीकृष्णकथा- विग्रह श्रीमद्भागवत, श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णधाम श्रीव्रजमें वास-ये पाँच प्रधान साधन हैं॥187 ॥

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 184 ॥

सद्बुद्धि और नित्य-अनित्यका विचार करके श्रीकृष्ण-भजनसे ही श्रीकृष्ण-प्राप्ति :- विचार करिया यबे भजे कृष्ण-पांय। सेइ बुद्धि देन ताँरे, याते कृष्ण पाय ॥ 185 ॥

भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/238)- दुरुहाद्भुतवीर्येऽस्मिन् श्रद्धा दूरेऽस्तु पञ्चके। यत्र स्वल्पोऽपि सम्बन्धः सद्धियां भावजन्मने ॥ 189 ॥

अनुवाद-भक्ति ही एकमात्र कल्याणका साधन है, इस प्रकार विचार करके जब कोई श्रीकृष्णके चरणकमलोंका भजन करता है, तब श्रीकृष्ण उसे स्वयं ऐसी बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे वह श्रीकृष्णको प्राप्त कर सके ॥ 185 ॥

अनुवाद-सहसा दुर्बोध और अद्भुत शक्तिसम्पन्न अन्तिम पाँच अङ्गोंमें श्रद्धाकी बात तो दूर रहे, अति

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चौबीसवाँ अध्याय 24/189-195 ] अल्प सम्बन्ध उत्पन्न होनेपर भी वह निरअपराधी व्यक्तिकी भावोत्पत्तिका कारण बन जाता है ॥ 189 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/129 संख्या देखें ॥ 189 ॥ अनर्थमय और सकाम होनेपर भी सुबुद्धिके कारण निरन्तर श्रीकृष्णभजनके फलसे कामनाओंको त्यागकर निष्काम-सेवा और सिद्धिकी प्राप्ति; वैसा होनेपर भी सकाम-भक्ति निष्काम-सेवाका 'कारण' नहीं :- उदार महती याँर सर्वोत्तमा बुद्धि। नाना कामे भजे, तबु पाय भक्तिसिद्धि ॥ 190 ॥ अनुवाद-उदारचित्त और बुद्धिमान व्यक्ति अनेक प्रकारकी कामनाओंकी पूर्त्तिकी अभिलाषासे भजन आरम्भ करनेपर भी अन्तमें भक्तिकी सिद्धिकी प्राप्ति करते हैं ॥ 190 ॥ श्रीमद्भागवत (2/3/10)में- अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ 191 ॥ अनुवाद-पहले कोई 'अकाम' अर्थात् सर्वकामनाओंसे रहित हो अथवा 'सर्वकाम' अर्थात् सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्षकी कामना करनेवाला ही क्यों न हो, उदार-बुद्धि होने मात्रसे ही मनुष्य तीव्र शुद्धभक्तियोगसे परमपुरुष श्रीकृष्णका भजन करेंगे ॥ 191 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/36 संख्या देखें ॥ 191 ॥ निरन्तर सेवाके प्रभावसे काम अथवा अनर्थकी निवृत्ति और शुद्ध सेवाकी प्राप्ति :- भक्ति-प्रभाव, -सेइ काम छाड़ाञा। कृष्णपदे भक्ति कराय गुणे आकर्षिया ॥ 192 ॥ अनुवाद-भक्तिके प्रभावसे उस व्यक्तिकी समस्त प्रकारकी भोग-वासनाएँ धीरे-धीरे दूर हो जाती हैं और श्रीकृष्णके गुणोंसे आकर्षित होकर वह श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी निरन्तर सेवामें नियुक्त हो जाता है ॥ 192 ॥ श्रीमद्भागवत (5/19/26)में- सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां नैवार्थदो यत् पुनरर्थिता यतः। स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम् ॥ 193 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण प्रार्थना किये जानेपर मनुष्योंकी प्रार्थनाको पूर्ण करते हैं, यह बात सत्य है। किन्तु जिस अर्थसे (भोगकी वस्तुसे) बार-बार भोगके लिये प्रार्थना उदित होती है, श्रीकृष्ण उस अर्थको नहीं देते। अन्यकामी होकर जो एकमात्र उनके पादपल्लवको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करनेपर भी उनका भजन करते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें स्वयं ही अन्य-कामनाओंको शान्त कर देनेवाले अपने चरणकमलोंको दिया करते हैं ॥ 193 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/40 संख्या देखें ॥ 193 ॥ “आत्मारामः”-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके (7) 'स्वभाव'-अर्थकी व्याख्या :- 'आत्मा'-शब्दे 'स्वभाव' कहे, ताते येइ रमे। आत्माराम जीव यत स्थावर-जङ्गमे ॥ 194 ॥ अनावृत शुद्धजीवस्वरूप और आवृत जीवस्वरूपका धर्म; शुद्ध 'अहं' और अशुद्ध 'अहं'- जीवेर स्वभाव-कृष्णे 'दास' अभिमान। देहे आत्म-ज्ञाने आच्छादित सेइ 'ज्ञान' ॥ 195 ॥ अनुवाद-'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ 'स्वभाव' भी होता है, जो अपने स्वभावमें आनन्द अनुभव करते हैं, वे आत्माराम कहलाते हैं। इसलिये जितने भी स्थावर अथवा जङ्गम प्राणी हैं, वे सभी आत्माराम कहलाते हैं। वास्तवमें उन जीवोंका स्वभाव श्रीकृष्णके 'दास' होनेका अभिमान करना है, किन्तु देहमें आत्मबुद्धि होनेके कारण उनका यह वास्तविक 'ज्ञान' आच्छादित रहता है॥ 194-195 ॥ । 443

[ 24/196-201 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला च-शब्दे 'एव', 'अपि'-शब्द समुच्चये। 'आत्माराम' एव हञा श्रीकृष्ण भजये॥ 196॥ शुद्धस्वभाव 'आत्माराम' जीवका और 'निर्ग्रन्थ' जीवका दृष्टान्त :- एइ जीव-सनकादि सब मुनिजन। 'निर्ग्रन्थ'-मूर्ख, नीच, स्थावर-जङ्गम॥ 197॥ अनुवाद-अमृतानुकणा देखें॥ 196-197॥ अमृतानुकणा-आत्मा-शब्दसे 'स्वभाव' अर्थ, 'च'-शब्दसे 'एव' (निश्चय ही) अर्थ और 'अपि'-शब्दसे समुच्चय-अर्थ होनेपर, समस्त अर्थ यहाँपर इस प्रकार होते हैं,- सनकादि मुनिगण एवं 'निर्ग्रन्थ' अर्थात् मूर्ख, नीच, स्थावर-जङ्गमादि 'आत्माराम एव' होकर अर्थात् श्रीकृष्णदासके स्वभावसे युक्त होकर उरुक्रम-श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं॥ 196-197॥ मुक्तजीव व्यास आदिकी श्रीकृष्णसेवा-प्रसिद्ध, निर्ग्रन्थ अथवा निर्बोधके भजनका वर्णन :- व्यास-शुक-सनकादिर प्रसिद्ध भजन। 'निर्ग्रन्थ' स्थावरादिर शुन विवरण॥ 198॥ अनुवाद-व्यास, शुक और सनकादिका भजन तो प्रसिद्ध है ही, अब तुम मुझसे 'निर्ग्रन्थ' स्थावरादिके विषयमें श्रवण करो॥ 198॥ श्रीकृष्णकी कृपासे सभीका श्रीकृष्णभजन :- कृष्णकृपादि-हेतु हैते स्वभाव उदय। कृष्णगुणाकृष्ट हञा ताँहारे भजय॥ 199॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण-कृपासे सभी स्थावरादिका भी श्रीकृष्णदास होनेका स्वभाव उदित होता है और वे श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर उनका भजन करते हैं॥ 199॥ श्रीकृष्णके चरणके स्पर्शसे पृथ्वी धन्या, लक्ष्मीके भी काम्य वक्षःस्पर्शसे गोपियाँ धन्या :- श्रीमद्भागवत (10/15/8)में- धन्येयमद्य धरणी तृण-वीरुधस्त्वत्- पादस्पृशो द्रुमलतः करजाभिमृष्टाः। नद्योऽद्रयः खगमृगाः सदयावलोकै- र्गोप्योऽन्तरेण भुजयोरपि यत्स्पृहा श्रीः॥ 200॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 200॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यह भूमि (ब्रजभूमि) आज धन्य हो गयी है; आपके चरणस्पर्शसे सभी तृण, गुल्मादि, आपकी अङ्गुलिके स्पर्शसे वृक्ष-लता, आपके दयापूर्ण अवलोकनसे (दृष्टिसे) नदी-पर्वत-पक्षी-पशु आदि सब धन्य हो गये हैं। और लक्ष्मीको भी जिसे प्राप्त करनेकी स्पृहा है, उस आपके वक्षःस्थलको प्राप्त करके सभी गोपियाँ धन्य हो गयी हैं॥ 200॥ अनुभाष्य-पौगण्ड-अवस्थामें पदार्पण करके श्रीकृष्ण एकबार श्रीबलदेवके साथ कुसुमाकर-वनमें प्रवेश करके ब्रजकी शोभाको देखकर विहार करनेके इच्छुक होकर बड़े भाई श्रीबलदेवकी स्तुतिके छलसे स्वयं ही स्वयंकी स्तुति कर रहे हैं,- अद्य [तव चरणस्पर्शात्] इयं धरणी धन्या, [तथा] त्वत्पादस्पृशः (तव पादौ स्पृशन्तीति अतः) तृणवीरुधः (तृणगुल्मादयः) करजाभिमृष्टाः (नखैः स्पृष्टाः) द्रुमलतः (वृक्षवल्लर्यः) सदयावलोकैः (सकारुण्यदृष्टिभिः) नद्यः अद्रयः (गिरयः) खगमृगाः (खगाः पक्षिणः मृगाः पशवः) च (धन्याः), श्रीः अपि यत्स्पृहा (लक्ष्मीरापि यस्मै स्पृहयति, तेन) भुजयोः अन्तरेण (वक्षसा) गोप्यः च धन्याः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 200॥ श्रीकृष्णकी वंशीकी ध्वनिसे जङ्गमका स्थावर-धर्म, स्थावरमें जङ्गमके धर्मका उदय :- श्रीमद्भागवत (10/21/19)में- गा गोपर्केरनुवनं नयतोरुदार- वेणुस्वनैः कलपदैस्तनुभृत्सु सख्यः। अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणां निर्योगपाशकृतलक्षणयोर्विचित्रम्॥ 201॥ 444 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/201-205 ] अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 201 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/275 संख्या देखें॥ 202 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखियों! गायों और गोपोंके श्रीमद्भागवत (2/4/18)में- साथ वन-वनमें भ्रमण करनेवाले, गायोंको बाँधनेवाली किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा रस्सीके पाशको धारण करने आदि जैसे चिह्नोंसे युक्त आभीरकङ्का यवनाः खशादयः। श्रीकृष्ण-बलदेवकी उदार वेणु-ध्वनि और गीतके द्वारा येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः देही (प्राणियों)के मध्य चलनेवाले स्थावरकी भाँति शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 203 ॥ स्तम्भित हो रहे हैं तथा स्थावर वृक्षादिमें पुलक हो रहा है, -यह सब बहुत विचित्र है॥ 201 ॥ अनुवाद-किरात, हूण, अन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश, अनुभाष्य-व्रजमें शरत्कालके आनेपर, श्रीकृष्णके आभीर, (शुम्भ) कङ्क, यवन और खशादि तथा अन्य द्वारा वन-वनमें वंशीध्वनि करते हुए गो-चारणके छलसे जो समस्त पापयोनि जातियाँ हैं, वे सब जातियाँ ही भ्रमण आरम्भ करनेपर, गोपियाँ वंशीध्वनिके श्रवणसे जिनके आश्रित-वैष्णवोंके आश्रयमें भली-भाँति शुद्ध हो श्रीकृष्णके सङ्गके लिये कामातुरा होकर इधर-उधर जाती हैं, मैं ऐसे प्रभावसे युक्त विष्णुको नमस्कार करता भ्रमण करते-करते श्रीकृष्णकी गुणावलीका वर्णन कर हूँ॥ 203 ॥ रही हैं, - अनुभाष्य-मध्यलीला 24/173 संख्या देखें॥ 203 ॥ हे सख्यः, गोपार्कैः (गोप-बालकैः सह) अनुवनं (प्रतिवनं) यहाँ तक उन्नीस प्रकारका अर्थ :— गाः नयतोः (सञ्चारयतोः) निर्योगपाशकृतलक्षणयोः (नियुज्यन्ते आगे 'तेर' अर्थ करिलुँ, आर 'छय' एइ। गावः आभिः इति निर्योगाः दोहनकालीन-पादबन्धन-रज्जुः, ऊनविंशति अर्थ हइल मिलि' एइ दुइ॥ 204 ॥ अधुष्यगवां कर्षणाथर्ाः पाशाः च, तैः कृतं लक्षणं चिह्नं ययोस्तयोः शिरसि निर्योगवेष्टनेन स्कन्धस्थापने च गोपपरिवृढश्रिया अनुवाद-मैंने पहले आत्माराम श्लोकके तेरह विराजमानयोः रामकृष्णयोः) कलपदैः (मधुरशब्दैः) उदारवेणुस्वनैः अर्थ बतलाये थे और अब ये छः अन्य अर्थ हैं, इस (महावेणुनादैः) तनुभृत्सु (शरीरधारिषु देहिषु) गतिमतां (ये प्रकार कुल मिलाकर उन्नीस अर्थ हुए॥ 204 ॥ गतिमन्तः, तेषाम्) अस्पन्दनं (स्थावरधर्मः) तरूणां पुलकः अनुभाष्य-'आगे तेर अर्थ'-पहले तेरह अर्थोंके (जङ्गमधर्मः-इति तु) विचित्रम् (अतिविचित्रम्)। लिये मध्यलीला 24/157 श्लोकका अनुभाष्य देखें। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 201 ॥ अन्य छः यह हैं, -(1) 'मनो-रमणशील' (159 संख्या); श्रीमद्भागवत (10/35/9)में— (2) 'यतने रमणशील' (162 संख्या); (3) 'धैर्यशील' वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं (168 संख्या); (4) 'बुद्ध्याराम पण्डितमुनि' (181 व्यञ्जयन्त इव पुष्पफलाढ्याः। संख्या); (5) 'बुद्ध्याराम निर्ग्रन्थ मूर्ख' (181 संख्या); प्रणतभारविटपा मधुधाराः (6) 'श्रीकृष्णदास-स्वभावविशिष्ट' आत्माराम (195 प्रेमहृष्टतनवो ववृषुः स्म ॥ 202 ॥ संख्या) ॥ 204 ॥ अनुवाद-[श्रीकृष्णका वेणुनाद श्रवण करके] वनकी 'आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दकी लताएँ और वृक्ष फूल और फलोंसे लद गये और 'देह'-अर्थसे व्याख्या :— उनके भारसे उनकी डालियाँ झुक गयीं। समस्त एइ ऊनिश अर्थ करिलु, आगे शुन आर। वनस्पति अपने भीतर श्रीकृष्णकी अभिव्यक्तिको सूचित 'आत्मा'-शब्दे 'देह' कहे, - चारि अर्थ तार॥ 205 ॥ करते हुए प्रेममें पुलकित होकर मधुधारा वर्षण करने लगीं॥ 202 ॥ । 445

[ 24/205-209 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इस प्रकार मैंने तुम्हें उन्नीस अर्थ बतलाये हैं, अब तुम आगे सुनो। 'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ 'देह' भी है, इस अर्थके द्वारा अन्य चार अर्थ प्रकाशित होंगे ॥ 205 ॥ अनुभाष्य—'चारि अर्थ तार'—(1) औपाधिक ब्रह्मदेह (206 संख्या); (2) कर्मनिष्ठ याज्ञिकोंकी कर्मदेह (208 संख्या); (3) तपोदेह (210 संख्या); (4) सर्वकाम-देह (212 संख्या) ॥ 205 ॥ साधुसङ्गके फलसे देहात्मबुद्धि अथवा विवर्त्तवादियोंको भी विवर्त्त बुद्धिके त्यागसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :— देहाराभी देहे भजे 'देहोपाधि ब्रह्म'। सत्सङ्गे सेह करे कृष्णेर भजन ॥ 206 ॥ अनुवाद—जो देहको ही मैं माननेवाले 'देह-उपाधि ब्रह्म'का अर्थात् अपनी देहको ब्रह्म मानकर भजन करते हैं, यदि उन्हें भी सत्सङ्गकी प्राप्ति हो जाय, तो वे भी श्रीकृष्णका भजन करते हैं ॥ 206 ॥ अनुभाष्य—देहाराभी देहको औपाधिक ब्रह्ममूर्ति समझकर अपनी देहकी सेवा करते-करते साधुसङ्गसे उस विवर्त्त-बुद्धिको छोड़कर श्रीकृष्णसेवा करते हैं॥ 206 ॥ श्रीमद्भागवत (10/87/18)— उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो डहरम्। तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ 207 ॥ अनुवाद—(ऋषियोंके सम्प्रदाय मार्गमें) जो कर्मयोगमें उदर अर्थात् मणिपुरमें स्थित ब्रह्मकी उपासना करते हैं, वे 'शार्कराक्ष' ऋषि कहलाते हैं और वे कूर्पदृक् अर्थात् स्थूलदृष्टि हैं। और आरुणि ऋषिगण (उस सम्प्रदायके ऋषिगण) जहाँसे नाड़ियोंका विस्तार होता है उस हृदयाकाशमें (सूक्ष्म ब्रह्मकी) उपासना करते हैं। हे अनन्त, उससे उत्कृष्ट जो योगीगण शिरोगत (मूलाधार उदरसे आरम्भ करके हृदयके मध्यमेंसे होकर मस्तक और ब्रह्मरन्ध्र तक बढ़ते हुए) सहस्रदल-पद्मस्वरूप आपकी उपलब्धिके स्थान सुषुम्ना-नामक परमश्रेष्ठ ज्योतिर्मय धाममें पहुँच जाते हैं, वे पुनः मृत्युके मुख अर्थात् संसारमें पतित नहीं होते ॥ 207 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 24/160 संख्या देखें ॥ 207 ॥ साधुसङ्गके फलसे कर्मका त्याग करके देहारामी कर्मीको भी शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :— देहाराभी—कर्मनिष्ठ याज्ञिकादि जन। सत्सङ्गे 'कर्म' त्यजि' करये भजन ॥ 208 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 208 ॥ अनुभाष्य—'देहाराभी कर्मनिष्ठ'—यज्ञादि परायण; वे भी सुकृतिके फलसे भक्तोंके सङ्गसे कर्मनिष्ठारूपी यज्ञका त्याग करके श्रीकृष्णका भजन करते हैं ॥ 208 ॥ शौनकादिके द्वारा कर्मकाण्डकी निन्दा और श्रीसूतकी हरिकथा-कीर्तनमें प्रवृत्तिकी प्रशंसा :— श्रीमद्भागवत (1/18/12)में— कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे धूमधूम्रात्मनां भवान्। आपाययति गोविन्दपादपद्मासवं मधु ॥ 209 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(हे सूत!) हम आश्वास (अर्थात् निश्चय ही फल मिलेगा, इस आशासे) रहित इस कर्ममार्गमें धुएँसे धूमिल हो गये हैं, [ऐसी अवस्थामें] आप हमें श्रीगोविन्दके चरण-कमलोंके मधुमय [मादक] आसवका पान करा रहे हैं ॥ 209 ॥ अनुभाष्य—महाभागवत श्रीसूत-गोस्वामीके द्वारा शुश्रुषु शौनकादिको हरिकथारूपी भागवतका वर्णन आरम्भ करनेपर ऋषिगण अपने तुच्छ कर्मकाण्डके अनुष्ठानकी निन्दा कर रहे हैं,— अस्मिन् अनाश्वासे (अविश्वसनीय) कर्मणि (सत्रे) धूमधूम्रात्मनां (धूमेन धूम्रौ विवर्णौ आत्मानौ शरीर-चित्ते येषां तेषां तान् इत्यर्थः) भवान् मधु (मधुरं) गोविन्दपादपद्मासवं (श्रीकृष्ण-चरणाब्जयोः मकरन्दं श्रीहरिकथामृतमित्यर्थः) आपाययति (श्रावयति)। 446 |

चौबीसवाँ अध्याय 24/209-214 ] श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥ साधुसङ्गमें तपस्यारूपी भोगके त्यागसे देहारामी तपस्वी विषयीको भी शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :- 'तपस्वी' प्रभृति यत देहारामी हय। साधुसङ्गे तप छाड़ि' श्रीकृष्ण भजय ॥ 210 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 210 ॥ अनुभाष्य—'तपस्वी' आदि जितने भी देहारामी होते हैं, वे श्रीकृष्णभक्तसङ्गसे तपस्याका त्याग करके श्रीकृष्णभजन करते हैं ॥ 210 ॥ शास्त्र प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (4/21/31)में— यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना- मशेषजन्मोपचितं मलं धियः। सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती यथा पदाङ्गुष्ठविनिःसृता सरित् ॥ 211 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 211 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णके चरणकमलके अँगूठेसे निकली गङ्गा-नदीकी भाँति श्रीकृष्णकी चरणसेवाकी रुचि प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करके (विषयी) तपस्वियोंके समस्त जन्मोंमें एकत्रित बुद्धिके मलका शीघ्र ही नाश कर देती है ॥ 211 ॥ अनुभाष्य—प्राचीनकालमें पृथ्वीके अधिपति पृथु महाराज एक महायज्ञका अनुष्ठान करके वहाँ एकत्रित देवताओं, ऋषियों और राजाओंके समक्ष खड़े होकर पूर्व-पूर्व महाजनोंके द्वारा लक्षित विष्णुसेवाकी अनिवार्य कर्त्तव्यता और प्रयोजनीयताका वर्णन कर रहे हैं,— यत्पादसेवाभिरुचिः (यस्य हरेः पादयोः सेवायाम् अभिरुचिः), यथा [तस्य हरेः] पदाङ्गुष्ठविनिःसृता (पादपद्मोद्भवा) सरित् (नदी, गङ्गा इवेत्यर्थः) अन्वहम् (अहनि अहनि प्रतिदिनम्) एधती (वर्द्धमाना) सती (सात्त्विकी सती) तपस्विनां (याज्ञिकानां) अशेषजन्मोपचितं (पूर्व-पूर्व-जन्मभिः संवृद्धं) धियः (बुद्धेः) मलं (कामादि-वासना-लक्षणं) सद्यः क्षिणोति (क्षपयति, तं यूयं स्वकर्मभिः भजतेति तृतीयेणान्वयः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इसका (भाः 4/21/33) श्लोकके साथ अन्वय करें ॥ 211 ॥ श्रीकृष्णकी कृपासे सकाम देहारामीका भी कामका त्याग अथवा निष्काम होकर शुद्ध श्रीकृष्णभजन :- देहारामी, सर्वकाम—सब आत्माराम। कृष्णकृपाय कृष्ण भजे छाड़ि' सब काम ॥ 212 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 212 ॥ अनुभाष्य—देहारामी सर्वकामी [आत्मारामगण] समस्त कामनारूपी अनर्थका परित्याग करके श्रीकृष्ण-अनुग्रहके बलसे श्रीकृष्णभजन करते हैं ॥ 212 ॥ हरिभक्तिसुधोदयके ध्रुवचरित्र (7/28)में— स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहं त्वां प्राप्तवान् देवमुनीन्द्रगुह्यम्। काचं विचिन्वन्नपि दिव्यरत्नं स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे ॥ 213 ॥ अनुवाद—ध्रुवको जब श्रीकृष्णने वर देनेकी इच्छा की, तब ध्रुवने कहा,—हे स्वामी, मैं (विश्वके स्वामी) पदकी अभिलाषासे आपकी तपस्यामें रत हुआ था, किन्तु अब देवताओं और मुनियोंके लिये भी दुर्लभ आपको प्राप्त करके मैं कृतार्थ हो गया हूँ। सामान्य काँचको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मुझे दिव्यरत्न मिल गया है। मैं कृतार्थ हो गया हूँ, अब किसी अन्य वरकी याचना नहीं करता हूँ ॥ 213 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/42 संख्या देखें ॥ 213 ॥ यहाँ तक तेईस प्रकारके अर्थ :- एइ चारि अर्थ सह हइल 'तेइश' अर्थ। आर तिन अर्थ शुन परम समर्थ ॥ 214 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 214 ॥ अनुभाष्य—पहले कहे गये उन्नीस प्रकारके अर्थोंके साथ (204 संख्याका अनुभाष्य देखें) 'आत्माराम'-शब्दका अर्थ इन चार प्रकारके 'देहाराम'को (205 संख्याका । 447

[ 24/214-221 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य देखें) समझनेपर 'तेईस' प्रकारके अर्थ होते हैं। और तीन अर्थ- (1) च-शब्दका 'अन्वाचय'- अर्थ, (2) च-शब्दका 'एव'- अर्थ और 'अपि'- शब्दका 'गर्हा' (निन्दा)-अर्थ एवं (3) निर्ग्रन्थ-शब्दका 'निर्धन'- अर्थ॥ 214 ॥ च-शब्दकी 'समुच्चय'के अर्थमें व्याख्या :- च-शब्दे 'समुच्चये', आर अर्थ कय। 'आत्मारामश्च मुनयश्च' कृष्णेरे भजय ॥ 215 ॥ 'निर्ग्रन्थाः' हञा इँहा 'अपि'-निर्द्धारणे। 'रामश्च कृष्णश्च' यथा विहरये वने ॥ 216 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 215-216 ॥ अनुभाष्य-च-शब्दका समुच्चय अर्थ पहले ही (146 संख्यामें) कथित हुआ है; उसके द्वारा 'आत्माराम' और 'मुनि' श्रीकृष्णभजन करते हैं। 'आर अर्थ'-'समुच्चय'-अर्थके अतिरिक्त अन्य अर्थ। 'अपि' निर्द्धारणके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है; 'निर्ग्रन्थाः' आत्माराम और मुनि, दोनोंका 'विशेषण' है। 'इँहा'-इस स्थानपर; जैसे, 'राम और कृष्ण वनमें विहार करते हैं' कहनेपर दोनोंका ही वनविहार उद्दिष्ट होता है॥ 215-216 ॥ च-शब्दकी अन्वाच्यार्थमें व्याख्या :- च-शब्दे 'अन्वाचये' अर्थ कहे आर। 'वटो, भिक्षामट, गाम्चानय' यैछे प्रकार ॥ 217 ॥ इस अर्थसे मुनिका मुख्य भजन, आत्मारामका गौण भजन :- कृष्णमनने मुनि कृष्णे सर्वदा भजय। 'आत्माराम अपि' भजे, - गौण अर्थ कय ॥ 218 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 217-218 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'वटो, भिक्षामट, गाम्चानय'-"हे वटु (ब्राह्मण), भिक्षामें चलो, गायको भी लाओ।" इस वाक्यमें च-शब्द जिस प्रकार 'अन्वाचय' अर्थ करता है, आत्माराम-श्लोकमें भी वैसा ही अर्थ करता है॥ 217 ॥ अनुभाष्य-च-शब्दसे अन्वाचय-अर्थ अर्थात् एककी प्रधानता और अन्य अप्रधान हैं। उदाहरणमें कहा जाता है,-'हे ब्राह्मण-बालक, भिक्षा करो और यदि मिले, तो गायको भी लाओ'; - इस स्थानपर भिक्षाकी ही प्रधानता है और गायको लाना अप्रधान सूचित हुआ है; (उसी प्रकार) श्रीकृष्णमननशील मुनियोंकी ही सदा श्रीकृष्ण- भजनमें मुख्य रूपसे 'प्रधानता' है और आत्मारामगणोंकी श्रीकृष्णभजनमें गौणरूपसे 'अप्रधानता' है-यही अन्वाचयार्थका प्रयोग है ॥ 217-218 ॥ च-शब्दकी 'एव'-अर्थमें और 'अपि'-शब्दकी 'निन्दा'-अर्थमें व्याख्या :- 'च' एवार्थे 'मुनयः एव' कृष्णेरे भजय। 'आत्माराम अपि'-'अपि' 'गर्हा' अर्थ कय ॥ 219 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 219 ॥ अनुभाष्य-च-शब्द 'एव-अर्थमें' और अपि-शब्द 'निन्दा-अर्थमें' प्रयुक्त होनेपर इस प्रकारका अर्थ होता है,-'आत्माराम होनेपर भी वैसी अवस्थाके गौरवको त्यागकर मुनिगण ही श्रीकृष्णका भजन करते हैं।' 219 ॥ इन दोनों स्थानोंपर ही 'निर्ग्रन्थ'-शब्द विशेषण है :- 'निर्ग्रन्थ हञा'-एइ दुँहार 'विशेषण'। आर अर्थ शुन, यैछे साधुर सङ्गम ॥ 220 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 220 ॥ अनुभाष्य-'निर्ग्रन्थ' आत्माराम और मुनि, इन दोनोंका ही 'विशेषण' है; अन्य तीसरा अर्थात् छब्बीसवाँ अर्थ,-श्रेष्ठ-साधु श्रीनारदके सङ्गका फल व्याधमें जिस प्रकारसे दिखलायी दिया था, उस प्रकार ॥ 220 ॥ निर्ग्रन्थ-शब्दका अर्थ :- निर्ग्रन्थ-शब्दे कहे तब 'व्याध', 'निर्धन'। साधुसङ्गे सेइ करे श्रीकृष्ण-भजन ॥ 221 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 221 ॥ 448 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/221-230 ] अनुभाष्य-निर्ग्रन्थ-शब्द निर्द्धारणके अर्थमें प्रयुक्त होनेपर, साधनरूपी धनसे विहीन अयोग्य व्याध भी श्रीनारद जैसे साधुके सङ्गके प्रभावसे श्रीकृष्णाराम होकर भजन करता है॥ 221 ॥ साधुसङ्गके फलसे शिकारीकी भी पापसे निवृत्ति और श्रीकृष्णमें चित्त निवेश होना अथवा महाभागवत होना :- 'कृष्णारामाश्च' एव कृष्ण-मनन। व्याध हञा हय पूज्य भागवतोत्तम॥ 222 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 222 ॥ अनुभाष्य- 'आत्मा'-शब्दका अर्थ-'श्रीकृष्ण'; श्रीकृष्णमें रमणशील होनेके कारण श्रीकृष्णाराम और वह श्रीकृष्णाराम ही श्रीकृष्णमननशील है। [व्याध होनेपर भी वह पूज्य भागवतोत्तम बन गया।]॥ 222 ॥ स्कन्द-पुराणमें कथित शिकारी-नारद-संवादका वर्णन :- एक भक्त-व्याधेर कथा शुन सावधाने। याहा हैते हय सत्सङ्ग-महिमार ज्ञाने॥ 223 ॥ अनुवाद-हे सनातन, एक भक्त-शिकारीकी कथा ध्यान देकर सुनो। इस कथासे सत्सङ्गकी महिमाको समझ सकते हैं॥ 223 ॥ एक दिन श्रीनारद देखि' नारायण। त्रिवेणी-स्नाने प्रयाग करिला गमन॥ 224 ॥ अनुवाद-एक समय श्रीनारदने भगवान् श्रीनारायणका दर्शन करके त्रिवेणीमें स्नान करनेके लिये प्रयागकी ओर गमन किया॥ 224 ॥ वनपथे देखे मृग आछे भूमे पड़ि'। बाण-विद्ध भग्नपाद करे धड्फड़ि॥ 225 ॥ अनुवाद-वनके पथपर चलते हुए श्रीनारदने देखा कि बाणसे बिंधा एक हिरण भूमिपर पड़ा था। उसकी टाँगे भी टूटी हुईं थी और वह छटपट कर रहा था॥ 225 ॥ आर कतदूरे एक देखेन शूकर। तैछे विद्ध भग्नपाद करे धड्फड़॥ 226 ॥ अनुवाद-थोड़ी दूरीपर श्रीनारदने एक सुअरको देखा, वह भी हिरणकी ही भाँति बाणसे बिंधा हुआ था। उसकी भी टाँगें टूटी हुईं थी और वह छटपट कर रहा था॥ 226 ॥ ऐछे एक शशक देखे आर कतदूरे। जीवेर दुःख देखि' नारद व्याकुल-अन्तरे॥ 227 ॥ अनुवाद-थोड़ा आगे जानेपर श्रीनारदने एक खरगोशको देखा जो पीड़ासे तड़प रहा था। जीवोंके दुःखोंको देखकर श्रीनारदका हृदय व्याकुल हो गया॥ 227 ॥ कतदूरे देखे व्याध वृक्षे आँत हञा। मृग मारिवारे आछे बाण जुड़िया ॥ 228 ॥ अनुवाद-कुछ दूर जानेपर श्रीनारदने देखा कि एक शिकारी वृक्षकी ओटमें छिपकर खड़ा है और पशुओंको मारनेके लिये बाण लेकर खड़ा है॥ 228 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आँत'-छिपकर, बीचमें होकर॥ 228 ॥ श्यामवर्ण, रक्तनेत्र, महाभयङ्कर। धनुर्बाण हस्ते, -येन यम दण्डधर॥ 229 ॥ अनुवाद-वह शिकारी काले रङ्गका था, उसकी आँखें लाल रङ्गकी थीं और वह बहुत भयङ्कर लग रहा था। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो वह हाथोंमें धनुष-बाण लिये साक्षात् यम हो॥ 229 ॥ पथ छाड़ि' नारद तार निकटे चलिल। नारदे देखि' मृग सब पलाञा गेल॥ 230 ॥ अनुवाद-श्रीनारद उस वन-मार्गको छोड़कर उसकी ओर चल दिये। श्रीनारदको देखकर सब पशु भाग गये॥ 230 ॥ 449

[ 24/231-242 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला क्रुद्ध हञा व्याध ताँरे गालि दिते चाय। नारद-प्रभावे मुखे गालि नाहि आय ॥ 231 ॥ अनुवाद-पशुओंको वहाँसे भागते देखकर शिकारीको बहुत क्रोध आया और वह श्रीनारदको गाली देना चाहता था, किन्तु श्रीनारदके प्रभावसे उसके मुखसे कोई गाली निकली ही नहीं ॥ 231 ॥ “गोसाञि, प्रयाण-पथ छाड़ि' केने आइला। तोमा देखि' मोर लक्ष्य मृग पलाइला ॥" 232 ॥ अनुवाद-शिकारीने कहा,-“हे गोसाईं ! आप वनमें चलनेवाले मार्गको छोड़कर मेरी ओर क्यों आये हैं? आपको देखकर मेरे शिकार भाग गये ॥" 232 ॥ अनुभाष्य-'प्रयाण-पथ'-पाठान्तरमें 'प्रमाण-पथ'; जिस निर्दिष्ट पथसे पथिक जाते हैं अर्थात् प्रचलित पथ ॥ 232 ॥ नारद कहे, - “पथ भूलि' आइलाङ पूछिते। मने एक संशय हय, ताहा खण्डाइते ॥ 233 ॥ पथे ये शूकर-मृग, जानि तोमार हय।” व्याध कहे, - “येइ कह, सेइ त' निश्चय ॥" 234 ॥ अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "मैं अपने मार्गको छोड़कर तुमसे कुछ पूछनेके लिये ही आया हूँ। मेरे मनमें एक संशय है; मैं उसे दूर करना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि मार्गमें पड़े हुए सूअर और हिरणादि तुम्हारे हैं।” शिकारीने कहा, - “आप जो कह रहे हैं, वैसा ही है॥" 233-234 ॥ नारद कहे,-“यदि जीवे मार' तुमि बाण। अर्द्ध-मारा कर केने, ना लओ पराण ?" 235 ॥ अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "यदि तुम किसी जीवको बाण मारते हो तो उसके प्राण ही क्यों नहीं ले लेते? उसे अधमरा क्यों करते हो ?" 235 ॥ व्याध कहे,-“शुन गोसाञि, 'मृगारि' मोर नाम। पितार शिक्षाते आमि करि ऐछे काम ॥ 236 ॥ अर्द्ध-मारा जीव यदि धड्फड़ करे। तबे त' आनन्द मोर बाड़ये अन्तरे ॥" 237 ॥ अनुवाद-शिकारीने कहा, - 'हे गोसाईं, सुनो! मेरा नाम 'मृगारि' है और मैं अपने पिताकी शिक्षाके अनुसार ही ऐसा कार्य करता हूँ। अधमरा जीव जब छटपटाता है, तब मुझे बहुत आनन्द होता है ॥" 236-237 ॥ नारद कहे,-"एकवस्तु मागि तोमार स्थाने।" व्याध कहे,-“मृगादि लह, येइ तोमार मने ॥ 238 ॥ मृगछाल चाह यदि, आइस मोर घरे। येइ चाह, ताहा दिब मृगव्याघ्राम्बरे ॥" 239 ॥ अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "मैं तुमसे एक वस्तु माँगना चाहता हूँ।" शिकारीने कहा, - "हिरणादि कोई भी पशु लेनेकी आपकी इच्छा हो, आप ले लो। यदि आप हिरणकी छाल चाहते हैं, तब फिर आप मेरे घर आइये। हिरणकी छाल, बाघकी छाल-जो कुछ भी आप चाहेंगे, मैं दे दूँगा ॥" 238-239 ॥ नारद कहे, - “इहा आमि किछु नाहि चाहि। आर एक वस्तु आमि मागि तोमा-ठाञि ॥ 240 ॥ कालि हैते तुमि येइ मृगादि मारिबा। प्रथमे मारिबा, अर्द्ध-मारा ना करिबा ॥" 241 ॥ अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "मुझे यह सब कुछ नहीं चाहिये। मैं तो तुमसे कुछ और माँगता हूँ। कलसे तुम जिस हिरणादिको मारोगे, उसे पहली बारमें ही पूरी तरहसे मार देना, उसे अधमरा मत करना ॥" 240-241 ॥ व्याध कहे,-“किवा दान मागिला आमारे। अर्द्ध मारिले किवा हय, ताहा कह मोरे ॥" 242 ॥ अनुवाद-शिकारीने कहा, - "आपने मुझसे यह कैसा दान माँगा है? आधा मारनेसे क्या होता है, मुझे इस विषयमें बतलाइये ॥" 242 ॥ 450 |

चौबीसवाँ अध्याय २४/२४३-२५६ ] नारद कहे, —“अर्द्ध मारिले जीव पाय व्यथा। जीवे दुःख दितेछ, तोमार हइबे ऐछे अवस्था॥ २४३ ॥ व्याध तुमि, जीव मार—'अल्प' अपराध तोमार। कदर्थना दिया मार'—ए पाप 'अपार' ॥ २४४ ॥ कदर्थिया तुमि यत मारिला जीवेरे। तारा तैछे तोमा मारिबे जन्म-जन्मान्तरे॥” २४५ ॥ अनुवाद—श्रीनारदने कहा,—“आधा मारनेसे जीवको तुम जानबूझकर दुःख दे रहे हो, इसलिये तुम्हारी भी वैसी ही अवस्था होगी। तुम शिकारी हो, जीवोंको मारना तुम्हारा धंधा है, इसलिये तुम्हारा बहुत कम अपराध होता है। किन्तु तुम उन्हें जानबूझकर तड़पा-तड़पाकर मारते हो, यह 'अपार' (घोर) पाप है। तुमने तड़पा-तड़पाकर जितने जीवोंको मारा है, वे भी तुम्हें जन्म-जन्मान्तरमें वैसे ही मारेंगे॥” २४३-२४५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कदर्थना दिया'—कष्ट देकर॥ २४४ ॥ ॥ नारद-सङ्गे व्याधेर मन परसन्न हइल। ताँर वाक्य शुनि' मने भय उपजिल॥ २४६ ॥ अनुवाद—श्रीनारदके सङ्गसे शिकारीका मन निर्मल हो गया था, इसलिये उसे अपने पापोंकी प्रतीति हो गयी। किन्तु पापोंका परिणाम बतानेवाले उनके वचन सुनकर उसके मनमें भय उत्पन्न हो गया॥ २४६ ॥ व्याध कहे, —“बाल्य हैते एइ आमार कर्म। केमने तरिब आमि पामर अधम? ॥ २४७ ॥ एइ पाप याय मोर, केमन उपाये? निस्तार करह मोरे, पड़ों तोमार पाये॥” २४८ ॥ अनुवाद—शिकारीने कहा,—“बचपनसे ही मेरा यही कार्य है। मैं अधम, पापी इन पापोंसे कैसे पार होऊँगा? किस उपायसे मेरे द्वारा किये गये ये पाप दूर हो सकते हैं? आप मेरा उद्धार कीजिये, मैं आपके चरणोंमें पड़ा हूँ॥” २४७-२४८ ॥ नारद कहे, —“यदि धर आमार वचन। तबे से करिते पारि तोमार मोचन॥” २४९ ॥ अनुवाद—श्रीनारदने कहा,—“यदि तुम मेरी बात मानो, तब मैं तुम्हारा उद्धार कर सकता हूँ॥” २४९ ॥ व्याध कहे, —“येइ कह, सेइ त' करिब।” नारद कहे, —“धनुक भाङ्ग, तबे से कहिब॥” २५० ॥ अनुवाद—शिकारीने कहा,—“आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगा।” श्रीनारदने कहा,—“तुम अपना धनुष तोड़ दो, तब मैं कुछ कहूँगा॥” २५० ॥ व्याध कहे, —“धनुक भाङ्गिले बाँचिब केमने?” नारद कहे, —“आमि अन्न दिब प्रतिदिन ॥” २५१ ॥ अनुवाद—शिकारीने कहा,—“यदि मैं धनुषको तोड़ दूँगा, तब मेरा पालन कैसे होगा?” श्रीनारदने कहा,—“मैं प्रतिदिन तुम्हें भोजन दूँगा॥” २५१ ॥ धनुक भाङ्गि व्याध ताँर चरणे पड़िल। तारे उठाया नारद उपदेश कैल॥ २५२ ॥ “घरे गिया ब्राह्मणे देह' यत आछे धन। एक एक वस्त्र परि' बाहिर हओ दुइजन॥ २५३ ॥ नदी-तीरे एकखानि कुँड़िया करिया। तार आगे एकपिण्ड तुलसी रोपिया॥ २५४ ॥ तुलसी-परिक्रमा कर, तुलसी-सेवन। निरन्तर कृष्णनाम करिह कीर्त्तन॥ २५५ ॥ आमि तोमाय बहु अन्न पाठाइमु दिने। सेइ अन्न लबे, यत खाओ दुइजने॥” २५६ ॥ अनुवाद—धनुषको तोड़कर शिकारी श्रीनारदके चरणोंमें गिर पड़ा। उसे उठाकर श्रीनारदने उसे उपदेश प्रदान किया,—“घर जाकर तुम्हारे पास जो भी धन है, वह सब ब्राह्मणोंको दे दो। तुम और तुम्हारी पत्नी केवल एक-एक वस्त्र पहनकर उस घरको छोड़ दो। । ४५१

[ 24/252-265 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला


नदीके तटपर एक कुटिया बनाकर उसके आगे एक चबूतरा बनाकर उसपर तुलसीका पौधा लगाओ। तुम लोग तुलसीकी परिक्रमा, तुलसीकी सेवा और निरन्तर श्रीकृष्णनामका कीर्तन करना। मैं दिनके समय तुम्हारे पास बहुतसी भोजन सामग्री भेजूँगा। तुम उसमेंसे उतनी ही सामग्री लेना, जितना तुम दोनों खा सको॥" 252-256 ॥

तबे सेइ मृगादि तिने नारद सुस्थ कैल। सुस्थ हञा मृगादि तिने धाञा पलाइल ॥ 257 ॥

अनुवाद-तब श्रीनारदने उन अधमरे मृगादि तीनों पशुओंको स्वस्थ किया और स्वस्थ होते ही मृगादि तीनों पशु दौड़कर चले गये ॥ 257 ॥

देखिया व्याधेर मने हैल चमत्कार। घरे गेल व्याध, गुरुके करि' नमस्कार ॥ 258 ॥

अनुवाद-ऐसा देखकर शिकारीके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। अपने गुरु श्रीनारदको प्रणाम करके शिकारी अपने घर लौट गया ॥ 258 ॥

यथा-स्थाने नारद गेला, व्याध घरे आइल। नारदेर उपदेशे सकल करिल ॥ 259 ॥

अनुवाद-श्रीनारद अपने गन्तव्य स्थान प्रयागकी ओर चल दिये और शिकारी अपने घर आ गया। शिकारीने श्रीनारदके उपदेशानुसार सब कार्य किया ॥ 259 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'नारदेर उपदेशे'-श्रीनारदके उपदेशके अनुसार ॥ 259 ॥

ग्रामे ध्वनि हैल, - 'व्याध 'वैष्णव' हइल।' ग्रामेर लोक सब अन्न आनिते लागिल ॥ 260 ॥ एकदिन अन्न आने दश-बिश जने। दिले तत लय, यत खाय दुइजने ॥ 261 ॥

अनुवाद-पूरे ग्राममें यह बात फैल गयी,-'शिकारी 'वैष्णव' बन गया है।" ग्रामके सभी लोग उसके पास भोजनकी सामग्री लाने लगे। एक दिनमें दस-बीस लोग भोजनकी सामग्री लेकर आते, किन्तु शिकारी उतना ही लेता जितना वे दो लोग खा सकते थे ॥ 260-261 ॥

एकदिन नारद कहे, - "शुनह, पर्वते। आमार एक शिष्य आछे, चलह देखिते ॥" 262 ॥

अनुवाद-एक दिन श्रीनारदने श्रीपर्वत ऋषिसे कहा,-"हे पर्वत ! सुनो, मेरा एक शिष्य है, चलो उसे देखनेके लिये चलें ॥" 262 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'शुनह, पर्वते'-ओहे पर्वत मुनि, सुनो ॥ 262 ॥

तबे दुइ ऋषि आइला सेइ व्याध-स्थाने। दूर हैते व्याध पाइल गुरुर दर्शने ॥ 263 ॥

अनुवाद-तब दोनों ऋषि शिकारीके स्थानपर आये। शिकारीने दूरसे ही अपने गुरुदेवको आते देख लिया ॥ 263 ॥

आस्ते-व्यस्ते धाञा आसे, पथ नाहि पाय। पथेर पिपीलिका इति-उति धरे पाय ॥ 264 ॥

अनुवाद-शिकारी तेजीसे दौड़कर गुरुदेवके पास जाने लगा, किन्तु उसे मार्ग नहीं मिल रहा था, क्योंकि मार्गमें चींटियाँ इधर-उधर आ-जा रहीं थीं और कहीं पैर रखनेसे कोई चींटी मर न जाय, इसलिये वह आगे बढ़ नहीं पा रहा था ॥ 264 ॥

दण्डवत्-स्थाने पिपीलिकारे देखिया। वस्त्रे स्थान झाड़ि' पड़े दण्डवत् हञा ॥ 265 ॥

अनुवाद-जब गुरुदेव निकट आ गये तब उनको दण्डवत् प्रणाम करने लगा, तो उसने देखा कि गुरुदेवके चरणोंके पास भी चींटियाँ हैं। उसने उस स्थानको अपने वस्त्रसे झाड़कर चींटियोंको दूर किया और फिर गुरुदेवको दण्डवत् प्रणाम किया ॥ 265 ॥


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चौबीसवाँ अध्याय 24/266-275 ] नारद कहे, - “व्याध, एइ ना हय आश्चर्य। हरिभक्त्ये हिंसा-शून्य हय साधुवर्य ॥” 266 ॥ अनुवाद—श्रीनारदने कहा, - “हे शिकारी, तुम्हारा ऐसा करना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। हरिभक्तिके प्रभावसे व्यक्ति हिंसारहित होकर सर्वश्रेष्ठ साधु बन जाता है ॥" 266 ॥ स्कन्दवचन :- एते न ह्यद्भुता व्याध तवाहिंसादयो गुणाः। हरिभक्तौ प्रवृत्ता ये न ते स्युः परतापिनः ॥ 267 ॥ अनुवाद—हे व्याध, तुममें जो अहिंसादि गुण उत्पन्न हुए हैं, वह अद्भुत नहीं है, क्योंकि, जो हरिभक्तिमें प्रवृत्त होता है, वह दूसरोंको कष्ट देनेवाला नहीं होता ॥ 267 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/143 संख्या देखें ॥ 267 ॥ तबे सेइ व्याध दोंहारे अङ्गने आनिल। कुशासन आनि' दोंहारे भक्त्ये बसाइल ॥ 268 ॥ अनुवाद—तब वह शिकारी उन दोनोंको अपने आँगनमें ले आया और उसने कुशासन लाकर उन दोनोंको भक्तिपूर्वक बैठाया ॥ 268 ॥ जल आनि' भक्त्ये दोंहार पाद प्रक्षालिल। सेइ जल स्त्री-पुरुषे पिया शिरे लइल ॥ 269 ॥ अनुवाद—शिकारीने जल लाकर भक्तिपूर्वक उन दोनोंके चरणोंका अभिषेक किया। तब शिकारी और उसकी पत्नी, दोनोंने उस जलका पान किया और उसे अपने सिरपर भी छिड़का ॥ 269 ॥ कम्प-पुलकाश्रु हैल कृष्णनाम गाञा। ऊर्द्धबाहु नृत्य करे वस्त्र उड़ाञा ॥ 270 ॥ अनुवाद—जब शिकारी गुरुदेवके सामने श्रीकृष्णनामका कीर्तन करने लगा, तब उसके शरीरमें कम्प-पुलक-अश्रु आदि सात्त्विक विकार उत्पन्न हो गये। वह भावावेशमें गान करते हुए दोनों हाथोंको उठाकर और कपड़ेको हाथोंसे उड़ाते हुए नृत्य करने लगा ॥ 270 ॥ देखिया व्याधेर प्रेम पर्वत-महामुनि। नारदेरे कहे,-“तुमि हओ स्पर्शमणि ॥” 271 ॥ अनुवाद—शिकारीके प्रेमको देखकर महामुनि श्रीपर्वतने श्रीनारदसे कहा, - “आप स्पर्शमणि हैं॥” 271 ॥ स्कन्दवचन :- “अहो धन्योऽसि देवर्षे कृपया यस्य तत्क्षणात्। नीचोऽप्युत्पुलको लेभे लुब्धको रतिमच्युते ॥ 272 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 272 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे देवर्षे! आप धन्य हैं। आपकी कृपासे नीच लुब्धक अर्थात् शिकारीने भी पुलकित होकर श्रीकृष्णमें रति प्राप्त की है ॥ 272 ॥ अनुभाष्य- हे देवर्षे (नारद,) अहो, (विस्मये, त्वं) धन्यः असि, यस्य (तव) कृपया नीचः (नीचवृत्तिः) लुब्धकः (व्याधः) अपि उत्पुलकः (रोमाञ्चितदेहः सन्) अच्युते (भगवति विष्णौ) रतिं लेभे (प्राप)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 272 ॥ परम वैष्णवश्रेष्ठ श्रीनारदकी कृपासे भक्त-शिकारीके योग-क्षेमका समाधान :- नारद कहे,-“वैष्णव, तोमार अन्न किछु आय?” व्याध कहे, -“यारे पाठिओ, सेइ दिया याय ॥ 273 ॥ एत अन्न ना पाठिओ, किछु कार्य नाइ। सबे दुइजनार योग्य भक्ष्यमात्र चाइ ॥” 274 ॥ नारद कहे, - “ऐछे रह, तुमि भाग्यवान् ।” एत बलि' दुइजन हइला अन्तर्धान ॥ 275 ॥ अनुवाद—श्रीनारदने शिकारीसे पूछा, - “हे वैष्णव, तुम्हारे पास कुछ भोजनकी सामग्री आती है तो?' । 453

[ 24/273-279 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

शिकारीने उत्तर दिया, — “आप जिन्हें भेजते हैं, वे दे जाते हैं। किन्तु आप इतनी अधिक भोजन सामग्री मत भेजा कीजिये, उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। हमें तो केवल दो प्राणियोंके पेट भरने जितना ही भोजन चाहिये।” श्रीनारदने कहा, — “ऐसे ही रहते रहो, तुम बहुत भाग्यशाली हो।” इतना कहकर श्रीनारद ऋषि और श्रीपर्वत ऋषि—दोनों अन्तर्धान हो गये॥ 273-275॥

व्याधके उपाख्यानके श्रवणसे साधुसङ्गके माहात्म्यकी उपलब्धि :— एइ त' कहिलुँ तोमार व्याधेर आख्यान। या शुनिले हय साधुसङ्ग-प्रभाव-ज्ञान॥ 276 ॥

अनुवाद—हे सनातन, इस प्रकार मैंने तुम्हें शिकारीकी कथा सुनायी है, जिसे सुननेसे साधुसङ्गके प्रभावका ज्ञान होता है॥ 276॥

यहाँ तक छब्बीस प्रकारके अर्थ :— एइ आर तिन अर्थ गणनाते पाइल। एइ दुइ अर्थ मिलि' 'छाब्बिश' अर्थ हैल॥ 277॥

अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 277॥ अनुभाष्य—'एइ दुइ अर्थ मिलि'’—ये दो अर्थ मिलकर अर्थात् पहले कहे गये तेईस प्रकारके अर्थ (214 संख्याका अनुभाष्य देखें) और अब ये तीन प्रकारके अर्थ, कुल मिलाकर छब्बीस प्रकारके अर्थ हुए॥ 277॥

छब्बीस प्रकारके अर्थोंके अतिरिक्त स्थूलरूपसे दो प्रकारके अर्थोंमें सूक्ष्मतः बत्तीस प्रकारके अर्थ :— आर अर्थ शुन, याहा—अर्थेर भाण्डार। स्थूले 'दुइ' अर्थ, सूक्ष्मे 'बत्रिश' प्रकार॥ 278॥

अनुवाद—'आत्माराम' श्लोकका एक अन्य अर्थ सुनो, जो अर्थोंका भण्डार है। जिसमें साधारणरूपसे 'दो' अर्थ दिखलायी देते हैं, किन्तु सूक्ष्मरूपसे विचार करनेपर इसमें 'बत्तीस' प्रकारके अर्थ हैं॥ 278॥

अनुभाष्य—'स्थूले दुइ'—प्रायः साधारण रूपमें दो प्रकारके—(1) वैधभक्त और (2) रागभक्त। 'सूक्ष्मे 'बत्रिश' प्रकार'—सूक्ष्मरूपसे भेदकी गणना करनेपर बत्तीस प्रकारके अर्थ होते हैं। वैधभक्त—सोलह प्रकारके, जैसे,—(1) पार्षद दास, (2) पार्षद सखा, (3) पार्षद पितादि-गुरु, (4) पार्षद कान्ता, (5) साधनसिद्ध दास, (6) साधनसिद्ध सखा, (7) साधनसिद्ध पितादि-गुरु, (8) साधनासिद्ध कान्ता, (9) जातरति साधक दास, (10) जातरति साधक सखा, (11) जातरति साधक पितादि-गुरु, (12) जातरति साधक कान्ता, (13) अजातरति साधक दास, (14) अजातरति साधक सखा, (15) अजातरति साधक पितादि-गुरु, (16) अजातरति साधक कान्ता। रागभक्त भी इस प्रकार सोलह प्रकारके हैं; — कुल बत्तीस प्रकारके आत्माराम भक्त हैं॥ 278॥

आत्मा-शब्दसे श्रीकृष्णके सभी अवतार :— 'आत्मा'-शब्दे कहे,—सर्वविध भगवान्। एक 'स्वयं भगवान्', आर 'भगवान्'-आख्यान॥ 279॥

अनुवाद—'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ सब प्रकारके भगवान् है। इसके अन्तर्गत 'स्वयं भगवान्' और 'भगवान्'के अन्यान्य स्वरूप परिगणित होते हैं॥ 279॥

अनुभाष्य—आत्म-शब्दके द्वारा सब प्रकारके भगवान्को समझा जाता है; 'सर्वविध'—अर्थसे—सब प्रकारके शुद्ध भक्तोंके आराध्य अर्थात् स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और अन्यान्य श्रीकृष्णस्वरूप भगवान्गणको समझना होगा। 'एक' अर्थात् सर्वविध प्रतीतिमय भगवान्के भी भगवान्—एकमात्र पूर्णतम स्वयं-भगवान् 'श्रीकृष्ण' हैं। ज्ञानियों और योगियोंकी प्राप्य वस्तुकी गणना भगवान्के समान किये जानेपर भी वह सच्चिदानन्द-विग्रह नहीं है, केवल भगवान्की प्रतीति मात्र ही है। यहाँपर एकमात्र स्वयंरूप व्रजेन्द्रनन्दन ही ब्रजके रागभक्तिमार्गसे प्राप्त हो सकते हैं, श्रीकृष्णके

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चौबीसवाँ अध्याय 24/279–288 ] अन्यान्य स्वरूप, सभी भगवान्नामके द्वारा कहलाये जानेवाले और उनसे अभिन्न भगवद्-विग्रह होनेपर भी वैधीभक्तिके मार्गसे ही प्राप्य हैं॥ 279 ॥ स्थूलरूपमें दो प्रकारके भक्त-(1) विधिपूजक, (2) रागयुक्त भक्त :- ताँते रमे येह, सेइ सब—‘आत्माराम’। ‘विधिभक्त’, ‘रागभक्त’,—दुइविध नाम ॥ 280 ॥ अनुवाद—स्वयं-भगवान् अथवा उनके अन्य भगवद्-स्वरूपोंके सेवानन्दको जो अनुभव करते हैं, वे सब ‘आत्माराम’ हैं। ऐसे आत्माराम ‘विधिभक्त’ और ‘रागभक्त’—इन दो प्रकारके होते हैं॥ 280 ॥ दोनोंमेंसे प्रत्येकके चार प्रकार—(1) नित्यसिद्ध, (2) साधनसिद्ध, (3) और (4) दो प्रकारके साधक :- दुइविध भक्त हय चारि चारि प्रकार। पार्षद, साधनसिद्ध, साधकगण आर ॥ 281 ॥ कुल मिलाकर आठ प्रकारके :- जात-अजात-रतिभेदे साधक दुइ भेद। विधि-राग-मार्गे चारि चारि—अष्ट भेद ॥ 282 ॥ अनुवाद—विधिभक्त और रागभक्त आत्माराम—ये दोनों चार-चार प्रकारके होते हैं। पार्षद, साधनसिद्ध, जातरति-साधक और अजातरति-साधक। चार प्रकारके विधिमार्गके भक्त और चार प्रकारके रागमार्गके भक्त—इस प्रकार कुल मिलाकर आठ प्रकारके भेद हैं॥ 281–282 ॥ वैधीभक्तिमें उक्त चार प्रकारके भक्तोंमेंसे प्रत्येकके चार प्रकारके भेद, कुल मिलाकर सोलह प्रकार :- विधिभक्त्ये नित्यसिद्ध पार्षद—‘दास’। ‘सखा’, ‘गुरु’, ‘कान्तागण’,—चारिविध प्रकाश ॥ 283 ॥ साधनसिद्ध—दास, सखा, गुरु, कान्तागण। जातरति साधकभक्त—चारिविध जन ॥ 284 ॥ अजातरति साधकभक्त,—ए चारि प्रकार। विधिमार्गे भक्ते षोड़श भेद प्रचार ॥ 285 ॥ रागमयी-भक्ति भी वैधी-भक्तिकी भाँति सोलह प्रकारकी; इसलिये आत्माराम बत्तीस प्रकारके :- रागमार्गे ऐछे भक्ते षोड़श विभेद। दुइ मार्गे आत्मारामेर बत्रिश विभेद ॥ 286 ॥ अनुवाद—‘दास’, ‘सखा’, ‘गुरु’ और ‘कान्तागण’—ये चार प्रकारके विधिभक्तिके नित्यसिद्ध पार्षद हैं। विधिभक्तिके साधनसिद्ध भक्त भी दास, सखा, गुरु और कान्तागण—ये चार प्रकारके हैं। जो जातरति साधक भक्त हैं, वे भी दासादि चार प्रकारके हैं और उसी प्रकार अजातरति साधक भी दासादि चार प्रकारके हैं। इस प्रकार विधिमार्गके कुल सोलह प्रकारके भक्त हैं। इसी प्रकार रागमार्गके भी सोलह प्रकारके भक्त हैं। इन दोनों मार्गोंके कुल बत्तीस प्रकारके आत्माराम हैं॥ 283–286 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पार्षद अर्थात् नित्यसिद्ध, साधनसिद्ध, जातरतिसाधक और अजातरति-साधक—वैध और रागमार्गके भेदसे चार प्रकारके हैं। नित्यसिद्ध पार्षदगण—दास-सखा-गुरु-कान्ताके भेदसे पुनः चार प्रकारके हैं। साधनसिद्ध, जातरति साधक, अजातरति साधक, ये सब भी पुनः चार-चार प्रकारके हैं॥ 281–285 ॥ इनके साथ मुनि, निर्ग्रन्थ, च और अपिका लगना :- ‘मुनि’, ‘निर्ग्रन्थ’, ‘च’, ‘अपि’,—चारि शब्देर अर्थ। याँहा येइ लागे, ताहा करिये समर्थ ॥ 287 ॥ अनुवाद—‘मुनि’, ‘निर्ग्रन्थ’, ‘च’ और ‘अपि’—इन चारों शब्दोंके जो सब अर्थ पहले बतलाये हैं, उनकी उपरोक्त विधि और रागमार्गके बत्तीस प्रकारके आत्मारामोंके साथ जहाँ सङ्गति होती है, वैसे ही मिलाकर अर्थ करने चाहिये ॥ 287 ॥ यहाँ तक अट्ठावन प्रकारके अर्थ :- बत्रिशे छाब्बिशे मिलि’ अष्टपञ्चाश। आर एक भेद शुन अर्थेर प्रकाश ॥ 288 ॥ अनुवाद—पूर्वकथित छब्बीस अर्थोंके साथ इन । 455

[ 24/288-297 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला बत्तीस अर्थोंको मिलाकर कुल अट्ठावन अर्थ हो गये। जायेगा, उसके द्वारा ही सभी अट्ठावन प्रकारके अब एक ओर प्रकारका अर्थ श्रवण करो ॥ 288 ॥ आत्मारामोंका अर्थ प्रकाशित होगा ॥ 292 ॥ अनुभाष्य-भक्तोंकी श्रेणीमें बत्तीस प्रकार (278 “स्वरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ- संख्याका अनुभाष्य देखें) एवं ज्ञानियों और योगियोंकी उक्तार्थानामप्रयोगः ॥ ”293 ॥ श्रेणीमें छब्बीस प्रकार (276 संख्याका अनुभाष्य देखें)- अश्वत्थवृक्षाश्च वटवृक्षाश्च कपित्थवृक्षाश्च। कुल मिलाकर अट्ठावन प्रकारके हुए ॥ 288 ॥ आम्रवृक्षाश्च वृक्षाः ॥ 294 ॥ च-शब्दके द्वारा अर्थ :- अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 293-294 ॥ इतरेतर 'च' दिया समास करिये। अमृतप्रवाह भाष्य-स्वरूपसे एक जैसे और एक 'आटात्रं'वार आत्माराम नाम लइये ॥ 289 ॥ विभक्तिमें जिनका अर्थ कहा जाता है, वहाँ एक 'आत्मारामश्च आत्मारामश्च' आटात्रबार। स्वरूपको रखकर अन्य सब स्वरूपोंका प्रयोग नहीं शेषे सब लोप करि' राखि एकबार ॥ 290 ॥ होता है, जैसे,-'रामश्च, रामश्च, रामश्च',-इनके स्थानपर अनुवाद-अट्ठावन अर्थोंमें आत्माराम-शब्दके साथ एक 'रामा:' शब्दका प्रयोग होता है। 'वृक्षा:' (बहुवचन) 'च'-शब्दका समास करनेपर 'आत्मारामश्च, आत्मारामश्च' शब्दसे पीपलका वृक्ष, बड़का वृक्ष, बेलका वृक्ष, अट्ठावन बार कहे जायेंगे। (पहले जैसे पयार 143में आमका वृक्ष सभीको कहा गया है; इसलिये यहाँपर कहा गया है) आखिरीको छोड़कर अन्य सब लोप हो वृक्षोंके पृथक् पृथक् नामोंका प्रयोग नहीं किया गया जायेंगे और अन्तमें एक ही रहेगा जो अन्य सबका है ॥ 293-294 ॥ सूचक होगा ॥ 289-290 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/145 संख्या देखें ॥ 291-293 ॥ विश्वप्रकाश, पाणिनि और सिद्धान्त-कौमुदी :- “अस्मिन् वने वृक्षाः फलन्ति” यैछे हय। स्वरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ तैछे सब आत्माराम कृष्णे भक्ति करय ॥ 295 ॥ उक्तार्थानामप्रयोग इति ॥ 291 ॥ अनुवाद-“अस्मिन् वने वृक्षाः फलन्ति"-अर्थात् अनुवाद-स्वरूपसे एक जैसे और एक विभक्तिमें इस वनमें वृक्ष फलते हैं- इस वाक्यमें वृक्षसे सभी जिनका अर्थ कहा जाता है, वहाँ एक स्वरूपको प्रकारके वृक्षोंका बोध होता है, उसी प्रकारसे सभी रखकर अन्य सब स्वरूपोंका प्रयोग नहीं होता है, आत्माराम श्रीकृष्णकी भक्ति करते हैं ॥ 295 ॥ जैसे,- 'रामश्च, रामश्च, रामश्च',-इनके स्थानपर एक 'मुनयश्च'-पदको गिनकर उनसठ प्रकारके अर्थ :- 'रामा:' शब्दका प्रयोग होता है ॥ 291 ॥ 'आत्मारामश्च' समुच्चये कहिये च-कार। अनुभाष्य-मध्यलीला 24/145 संख्या देखें ॥ 291 ॥ 'मुनयश्च' भक्ति करे, -एइ अर्थ तार ॥ 296 ॥ आटात्रबारे आत्माराम, सब लोप हय। 'निर्ग्रन्था एव' हञा, 'अपि'-निर्द्धारणे। एक आत्माराम-शब्दे आटात्र अर्थ हय ॥ 292 ॥ एइ 'ऊनषष्टि' प्रकार अर्थ करिलुँ व्याख्याने ॥ 297 ॥ अनुवाद-अट्ठावन बारमें अन्य सब आत्माराम अनुवाद-अट्ठावन बार आत्माराम-शब्दका उच्चारण लोप हो जायेंगे, केवल एक आत्माराम शब्द ही रह करनेपर च-कारको समुच्चयमें लेनेपर उसमें मुनय- 456 ।

शब्दका योग करेंगे। इसका अर्थ होगा कि मुनिगण भी श्रीकृष्णका भजन करते हैं। इस प्रकार यह उनसठवाँ अर्थ है। तब निर्ग्रन्थ-शब्द लेकर 'अपि'-शब्दको निर्धारण रूपमें लेनेपर मैंने इन उनसठ प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या की है॥ 296-297॥ अनुभाष्य—अट्ठावन प्रकारके आत्माराम और मुनिगण निर्ग्रन्थ होकर श्रीकृष्णकी भक्ति करते हैं, —यही उनसठवाँ अर्थ है॥ 296-297॥ और एक प्रकारका अर्थ :— सर्वसमुच्चये आर एक अर्थ हय। 'आत्मारामश्च मुनयश्च निर्ग्रन्थाश्च' भजय ॥ 298 ॥ 'अपि'-शब्द—अवधारणे, सेइ चारि बार। चारिशब्द-सङ्गे 'एव' करिबे उच्चार ॥ 299 ॥ अनुवाद—सभी शब्दोंको साथ लेनेपर एक और अर्थ होता है। आत्माराम हो अथवा मुनि हो अथवा निर्ग्रन्थ हो, सभी श्रीकृष्णका भजन करेंगे। 'अपि'-शब्द तब निश्चयके रूपमें प्रयोग होता है, और चार बार चारों शब्दोंके साथ 'एव'का उच्चारण हो सकता है॥ 298-299॥ अनुभाष्य—सर्व समुच्चय अर्थात् आत्माराम, मुनि और निर्ग्रन्थगण, सभी श्रीकृष्णभजन करते हैं। अपि- शब्दका अवधारण अर्थात् निश्चय-अर्थ ग्रहण करके साठ प्रकारके अर्थ हुए हैं॥ 299॥ महाप्रभुपादोक्त-व्याख्या :— “उरुक्रमे एव भक्तिमेव अहैतुकीमेव कुर्वन्त्येव ॥" 300 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 300 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उरुक्रम', 'भक्ति', 'अहैतुकी' और 'कुर्वन्ति'—इन चार शब्दोंके साथ 'एव' योग करके और एक अर्थ करूँगा ॥ 300 ॥ अमृतानुकरणा—'च'-शब्दसे सर्वसमुच्चयमें एक और अर्थ होता है—'आत्मारामश्च मुनयश्च निर्ग्रन्थश्च' अर्थात् आत्मारामगण, मुनिगण और निर्ग्रन्थगण, सभी श्रीकृष्णका भजन करते हैं। उस स्थानपर जो अपि-शब्द है, वह 'एव'-रूपमें अवधारण-अर्थमें (निश्चयके अर्थमें) चार शब्दोंके साथ चार बार प्रयोग होगा, जैसे— (1) 'उरुक्रम एव'—उरुक्रम-श्रीकृष्णकी ही, ब्रह्म, परमात्मा अथवा अन्य भगवत्स्वरूपकी नहीं, (2) 'भक्तिम् एव'—केवल भक्ति ही, कर्म-ज्ञान-योगादि नहीं, (3) 'अहैतुकीम् एव'—अहैतुकी ही, धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि स्वसुख- वासनादि किसी हेतु-निमित्त नहीं और (4) 'कुर्वन्ति एव'—परस्मैपदमैं 'कुर्वन्ति' प्रयोगके कारण (25 संख्या देखें) श्रीकृष्णप्रीतिके उद्देश्य मात्रसे ही भक्ति करते हैं॥ 298-300 ॥ यहाँ तक साठ प्रकारके अर्थ :— एइ त' कहिलुँ श्लोकेर 'षष्ठि' संख्यक अर्थ। एक अर्थ शुन आर प्रमाणे समर्थ ॥ 301 ॥ सबसे अन्तमें और एक प्रकारका अर्थ— आत्मा-शब्दसे 'क्षेत्रज्ञा-शक्ति' :— 'आत्मा'-शब्दे कहे—'क्षेत्रज्ञ-जीव'-लक्षण। ब्रह्मादि कीटपर्यन्त—ताँर शक्तिते गणन ॥ 302 ॥ अनुवाद—अब तक मैंने श्लोकके 'साठ' अर्थ बतलाये हैं। अब एक और अर्थ सुनो जिसका बड़ा प्रबल प्रमाण है। 'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ है—'क्षेत्रज्ञ जीव'। ब्रह्मासे लेकर क्षुद्र कीट तक जितने भी जीव हैं—उन सबकी गणना श्रीकृष्णकी जीव-शक्तिमें होती है॥ 301-302 ॥ विष्णुपुराण (6/7/61)में— विष्णुशक्तिः पराः प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा। अविद्या-कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ 303 ॥ अनुवाद—विष्णुशक्ति—परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही 'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसको मायारूपा 'अविद्या' से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया । 457

[ 24/303-313 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया' है॥ 303 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/119 संख्या देखें ॥ 303 ॥ क्षेत्रज्ञका पर्यायवाची शब्द :- अमरकोषके स्वर्गवर्ग (7) में— “क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः प्रधानं प्रकृतिः स्त्रियाम् ॥”304 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 304 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—क्षेत्रज्ञ शब्दसे—आत्मा, पुरुष, प्रधान और प्रकृतिको समझना है॥ 304 ॥ साधुसङ्गके फलसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :- भ्रमिते भ्रमिते यदि साधुसङ्ग पाय। सब त्यजि' तबे तिँहो कृष्णेरे भजय ॥ 305 ॥ षाटि अर्थ कहिलुँ, सब—कृष्णेर भजने। सेइ अर्थ हय, एइ सब उदाहरणे ॥ 306 ॥ अनुवाद—सभी जीव संसारमें अनेक योनियोंमें और लोकोंमें भ्रमण कर रहे हैं, ऐसे भ्रमण करते-करते जब वे साधुसङ्ग प्राप्त करते हैं, तब वे सब कुछ त्याग करके श्रीकृष्णका भजन करते हैं। मैंने जो साठ अर्थ बतलाये हैं, वे सभी श्रीकृष्णभजनको लक्ष्य करते हैं। इन समस्त उदाहरणोंका यही अर्थ है॥ 305-306 ॥ कुल मिलाकर यहाँ तक इकसठ प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या :- 'एकषष्टि' अर्थ एबे स्फुरिल तोमा-सङ्गे। तोमार भक्तिवशे उठे अर्थेर तरङ्गे ॥” 307 ॥ अनुवाद—मुझमें तुम्हारे सङ्गसे 'इकसठ' अर्थोंकी स्फूर्ति हुई है। तुम्हारी भक्तिके प्रभावसे इन अर्थोंकी तरङ्ग उठ रही हैं॥ 307 ॥ अनुभाष्य—आत्मा शब्दका 'जीव' अर्थ करनेपर ब्रह्मासे आरम्भ करके कीट तक सभी जीवशक्ति हैं, वे क्षेत्रज्ञ जीवगण निर्ग्रन्थ मुनि होकर श्रीकृष्णभजन करते हैं—यही इकसठवाँ अर्थ है ॥ 307 ॥ इकसठ प्रकारके अर्थोंके श्रवणसे श्रीसनातनका विस्मय और महाप्रभुकी स्तुति :- अर्थ शुनि' सनातन विस्मित हञा। स्तुति करे महाप्रभुर चरणे धरिया ॥ 308 ॥ पुरुषरूपमें महाप्रभुके निश्वास छोड़नेके साथ ही वेदोंका प्रकाश :- “साक्षात् ईश्वर तुमि व्रजेन्द्रनन्दन। तोमार निश्वासे सर्ववेद-प्रवर्त्तन ॥ 309 ॥ शेषादि विष्णुरूपमें महाप्रभुके द्वारा ही भागवतकी व्याख्या और उसके विषयमें अभिज्ञता :- तुमि वक्ता भागवतेर, तुमि जान अर्थ। तोमा बिना अन्य जानिते नाहिक समर्थ ॥” 310 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके श्रीमुखसे आत्माराम-श्लोकके इकसठ प्रकारके अर्थ सुनकर श्रीसनातन गोस्वामी विस्मित हो गये और वे महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर उनकी स्तुति करने लगे,—“आप साक्षात् भगवान् श्रीव्रजेन्द्रनन्दन हैं, आपके निश्वाससे ही सभी वेद प्रकाशित हुए हैं। आप ही भागवतके वक्ता हैं और आप ही उसके समस्त अर्थोंको जानते हैं। आपके अतिरिक्त भागवतके अर्थोंको जाननेमें कोई भी समर्थ नहीं है॥” 308-310 ॥ महाप्रभुके द्वारा भागवत-माहात्म्य कहना :- प्रभु कहे,—“केने कर आमार स्तवन। भागवतेर स्वरूप केने ना कर विचारण ? ॥ 311 ॥ कृष्ण-तुल्य भागवत—विभु, सर्वाश्रय। प्रति-श्लोके प्रति-अक्षरे नाना अर्थ कय ॥ 312 ॥ पूर्वकालमें श्रीपरीक्षित और श्रीशुकदेव और उसके बाद शौनकादि और श्रीसूतके प्रश्नोत्तरमें श्रीभागवत-प्रकाशित :- प्रश्नोत्तरे भागवते करियाछे निर्धार। याँहार श्रवणे लोके लागे चमत्कार ॥ 313 ॥ 458