भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1894, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1894

[ 24/214-221 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य देखें) समझनेपर 'तेईस' प्रकारके अर्थ होते हैं। और तीन अर्थ- (1) च-शब्दका 'अन्वाचय'- अर्थ, (2) च-शब्दका 'एव'- अर्थ और 'अपि'- शब्दका 'गर्हा' (निन्दा)-अर्थ एवं (3) निर्ग्रन्थ-शब्दका 'निर्धन'- अर्थ॥ 214 ॥ च-शब्दकी 'समुच्चय'के अर्थमें व्याख्या :- च-शब्दे 'समुच्चये', आर अर्थ कय। 'आत्मारामश्च मुनयश्च' कृष्णेरे भजय ॥ 215 ॥ 'निर्ग्रन्थाः' हञा इँहा 'अपि'-निर्द्धारणे। 'रामश्च कृष्णश्च' यथा विहरये वने ॥ 216 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 215-216 ॥ अनुभाष्य-च-शब्दका समुच्चय अर्थ पहले ही (146 संख्यामें) कथित हुआ है; उसके द्वारा 'आत्माराम' और 'मुनि' श्रीकृष्णभजन करते हैं। 'आर अर्थ'-'समुच्चय'-अर्थके अतिरिक्त अन्य अर्थ। 'अपि' निर्द्धारणके अर्थमें प्रयुक्त हुआ है; 'निर्ग्रन्थाः' आत्माराम और मुनि, दोनोंका 'विशेषण' है। 'इँहा'-इस स्थानपर; जैसे, 'राम और कृष्ण वनमें विहार करते हैं' कहनेपर दोनोंका ही वनविहार उद्दिष्ट होता है॥ 215-216 ॥ च-शब्दकी अन्वाच्यार्थमें व्याख्या :- च-शब्दे 'अन्वाचये' अर्थ कहे आर। 'वटो, भिक्षामट, गाम्चानय' यैछे प्रकार ॥ 217 ॥ इस अर्थसे मुनिका मुख्य भजन, आत्मारामका गौण भजन :- कृष्णमनने मुनि कृष्णे सर्वदा भजय। 'आत्माराम अपि' भजे, - गौण अर्थ कय ॥ 218 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 217-218 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'वटो, भिक्षामट, गाम्चानय'-"हे वटु (ब्राह्मण), भिक्षामें चलो, गायको भी लाओ।" इस वाक्यमें च-शब्द जिस प्रकार 'अन्वाचय' अर्थ करता है, आत्माराम-श्लोकमें भी वैसा ही अर्थ करता है॥ 217 ॥ अनुभाष्य-च-शब्दसे अन्वाचय-अर्थ अर्थात् एककी प्रधानता और अन्य अप्रधान हैं। उदाहरणमें कहा जाता है,-'हे ब्राह्मण-बालक, भिक्षा करो और यदि मिले, तो गायको भी लाओ'; - इस स्थानपर भिक्षाकी ही प्रधानता है और गायको लाना अप्रधान सूचित हुआ है; (उसी प्रकार) श्रीकृष्णमननशील मुनियोंकी ही सदा श्रीकृष्ण- भजनमें मुख्य रूपसे 'प्रधानता' है और आत्मारामगणोंकी श्रीकृष्णभजनमें गौणरूपसे 'अप्रधानता' है-यही अन्वाचयार्थका प्रयोग है ॥ 217-218 ॥ च-शब्दकी 'एव'-अर्थमें और 'अपि'-शब्दकी 'निन्दा'-अर्थमें व्याख्या :- 'च' एवार्थे 'मुनयः एव' कृष्णेरे भजय। 'आत्माराम अपि'-'अपि' 'गर्हा' अर्थ कय ॥ 219 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 219 ॥ अनुभाष्य-च-शब्द 'एव-अर्थमें' और अपि-शब्द 'निन्दा-अर्थमें' प्रयुक्त होनेपर इस प्रकारका अर्थ होता है,-'आत्माराम होनेपर भी वैसी अवस्थाके गौरवको त्यागकर मुनिगण ही श्रीकृष्णका भजन करते हैं।' 219 ॥ इन दोनों स्थानोंपर ही 'निर्ग्रन्थ'-शब्द विशेषण है :- 'निर्ग्रन्थ हञा'-एइ दुँहार 'विशेषण'। आर अर्थ शुन, यैछे साधुर सङ्गम ॥ 220 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 220 ॥ अनुभाष्य-'निर्ग्रन्थ' आत्माराम और मुनि, इन दोनोंका ही 'विशेषण' है; अन्य तीसरा अर्थात् छब्बीसवाँ अर्थ,-श्रेष्ठ-साधु श्रीनारदके सङ्गका फल व्याधमें जिस प्रकारसे दिखलायी दिया था, उस प्रकार ॥ 220 ॥ निर्ग्रन्थ-शब्दका अर्थ :- निर्ग्रन्थ-शब्दे कहे तब 'व्याध', 'निर्धन'। साधुसङ्गे सेइ करे श्रीकृष्ण-भजन ॥ 221 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 221 ॥ 448 ।