श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1895, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/221-230 ] अनुभाष्य-निर्ग्रन्थ-शब्द निर्द्धारणके अर्थमें प्रयुक्त होनेपर, साधनरूपी धनसे विहीन अयोग्य व्याध भी श्रीनारद जैसे साधुके सङ्गके प्रभावसे श्रीकृष्णाराम होकर भजन करता है॥ 221 ॥ साधुसङ्गके फलसे शिकारीकी भी पापसे निवृत्ति और श्रीकृष्णमें चित्त निवेश होना अथवा महाभागवत होना :- 'कृष्णारामाश्च' एव कृष्ण-मनन। व्याध हञा हय पूज्य भागवतोत्तम॥ 222 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 222 ॥ अनुभाष्य- 'आत्मा'-शब्दका अर्थ-'श्रीकृष्ण'; श्रीकृष्णमें रमणशील होनेके कारण श्रीकृष्णाराम और वह श्रीकृष्णाराम ही श्रीकृष्णमननशील है। [व्याध होनेपर भी वह पूज्य भागवतोत्तम बन गया।]॥ 222 ॥ स्कन्द-पुराणमें कथित शिकारी-नारद-संवादका वर्णन :- एक भक्त-व्याधेर कथा शुन सावधाने। याहा हैते हय सत्सङ्ग-महिमार ज्ञाने॥ 223 ॥ अनुवाद-हे सनातन, एक भक्त-शिकारीकी कथा ध्यान देकर सुनो। इस कथासे सत्सङ्गकी महिमाको समझ सकते हैं॥ 223 ॥ एक दिन श्रीनारद देखि' नारायण। त्रिवेणी-स्नाने प्रयाग करिला गमन॥ 224 ॥ अनुवाद-एक समय श्रीनारदने भगवान् श्रीनारायणका दर्शन करके त्रिवेणीमें स्नान करनेके लिये प्रयागकी ओर गमन किया॥ 224 ॥ वनपथे देखे मृग आछे भूमे पड़ि'। बाण-विद्ध भग्नपाद करे धड्फड़ि॥ 225 ॥ अनुवाद-वनके पथपर चलते हुए श्रीनारदने देखा कि बाणसे बिंधा एक हिरण भूमिपर पड़ा था। उसकी टाँगे भी टूटी हुईं थी और वह छटपट कर रहा था॥ 225 ॥ आर कतदूरे एक देखेन शूकर। तैछे विद्ध भग्नपाद करे धड्फड़॥ 226 ॥ अनुवाद-थोड़ी दूरीपर श्रीनारदने एक सुअरको देखा, वह भी हिरणकी ही भाँति बाणसे बिंधा हुआ था। उसकी भी टाँगें टूटी हुईं थी और वह छटपट कर रहा था॥ 226 ॥ ऐछे एक शशक देखे आर कतदूरे। जीवेर दुःख देखि' नारद व्याकुल-अन्तरे॥ 227 ॥ अनुवाद-थोड़ा आगे जानेपर श्रीनारदने एक खरगोशको देखा जो पीड़ासे तड़प रहा था। जीवोंके दुःखोंको देखकर श्रीनारदका हृदय व्याकुल हो गया॥ 227 ॥ कतदूरे देखे व्याध वृक्षे आँत हञा। मृग मारिवारे आछे बाण जुड़िया ॥ 228 ॥ अनुवाद-कुछ दूर जानेपर श्रीनारदने देखा कि एक शिकारी वृक्षकी ओटमें छिपकर खड़ा है और पशुओंको मारनेके लिये बाण लेकर खड़ा है॥ 228 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आँत'-छिपकर, बीचमें होकर॥ 228 ॥ श्यामवर्ण, रक्तनेत्र, महाभयङ्कर। धनुर्बाण हस्ते, -येन यम दण्डधर॥ 229 ॥ अनुवाद-वह शिकारी काले रङ्गका था, उसकी आँखें लाल रङ्गकी थीं और वह बहुत भयङ्कर लग रहा था। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो वह हाथोंमें धनुष-बाण लिये साक्षात् यम हो॥ 229 ॥ पथ छाड़ि' नारद तार निकटे चलिल। नारदे देखि' मृग सब पलाञा गेल॥ 230 ॥ अनुवाद-श्रीनारद उस वन-मार्गको छोड़कर उसकी ओर चल दिये। श्रीनारदको देखकर सब पशु भाग गये॥ 230 ॥ 449