भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1893, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1893

चौबीसवाँ अध्याय 24/209-214 ] श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥ साधुसङ्गमें तपस्यारूपी भोगके त्यागसे देहारामी तपस्वी विषयीको भी शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :- 'तपस्वी' प्रभृति यत देहारामी हय। साधुसङ्गे तप छाड़ि' श्रीकृष्ण भजय ॥ 210 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 210 ॥ अनुभाष्य—'तपस्वी' आदि जितने भी देहारामी होते हैं, वे श्रीकृष्णभक्तसङ्गसे तपस्याका त्याग करके श्रीकृष्णभजन करते हैं ॥ 210 ॥ शास्त्र प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (4/21/31)में— यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना- मशेषजन्मोपचितं मलं धियः। सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती यथा पदाङ्गुष्ठविनिःसृता सरित् ॥ 211 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 211 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णके चरणकमलके अँगूठेसे निकली गङ्गा-नदीकी भाँति श्रीकृष्णकी चरणसेवाकी रुचि प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करके (विषयी) तपस्वियोंके समस्त जन्मोंमें एकत्रित बुद्धिके मलका शीघ्र ही नाश कर देती है ॥ 211 ॥ अनुभाष्य—प्राचीनकालमें पृथ्वीके अधिपति पृथु महाराज एक महायज्ञका अनुष्ठान करके वहाँ एकत्रित देवताओं, ऋषियों और राजाओंके समक्ष खड़े होकर पूर्व-पूर्व महाजनोंके द्वारा लक्षित विष्णुसेवाकी अनिवार्य कर्त्तव्यता और प्रयोजनीयताका वर्णन कर रहे हैं,— यत्पादसेवाभिरुचिः (यस्य हरेः पादयोः सेवायाम् अभिरुचिः), यथा [तस्य हरेः] पदाङ्गुष्ठविनिःसृता (पादपद्मोद्भवा) सरित् (नदी, गङ्गा इवेत्यर्थः) अन्वहम् (अहनि अहनि प्रतिदिनम्) एधती (वर्द्धमाना) सती (सात्त्विकी सती) तपस्विनां (याज्ञिकानां) अशेषजन्मोपचितं (पूर्व-पूर्व-जन्मभिः संवृद्धं) धियः (बुद्धेः) मलं (कामादि-वासना-लक्षणं) सद्यः क्षिणोति (क्षपयति, तं यूयं स्वकर्मभिः भजतेति तृतीयेणान्वयः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इसका (भाः 4/21/33) श्लोकके साथ अन्वय करें ॥ 211 ॥ श्रीकृष्णकी कृपासे सकाम देहारामीका भी कामका त्याग अथवा निष्काम होकर शुद्ध श्रीकृष्णभजन :- देहारामी, सर्वकाम—सब आत्माराम। कृष्णकृपाय कृष्ण भजे छाड़ि' सब काम ॥ 212 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 212 ॥ अनुभाष्य—देहारामी सर्वकामी [आत्मारामगण] समस्त कामनारूपी अनर्थका परित्याग करके श्रीकृष्ण-अनुग्रहके बलसे श्रीकृष्णभजन करते हैं ॥ 212 ॥ हरिभक्तिसुधोदयके ध्रुवचरित्र (7/28)में— स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहं त्वां प्राप्तवान् देवमुनीन्द्रगुह्यम्। काचं विचिन्वन्नपि दिव्यरत्नं स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे ॥ 213 ॥ अनुवाद—ध्रुवको जब श्रीकृष्णने वर देनेकी इच्छा की, तब ध्रुवने कहा,—हे स्वामी, मैं (विश्वके स्वामी) पदकी अभिलाषासे आपकी तपस्यामें रत हुआ था, किन्तु अब देवताओं और मुनियोंके लिये भी दुर्लभ आपको प्राप्त करके मैं कृतार्थ हो गया हूँ। सामान्य काँचको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मुझे दिव्यरत्न मिल गया है। मैं कृतार्थ हो गया हूँ, अब किसी अन्य वरकी याचना नहीं करता हूँ ॥ 213 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/42 संख्या देखें ॥ 213 ॥ यहाँ तक तेईस प्रकारके अर्थ :- एइ चारि अर्थ सह हइल 'तेइश' अर्थ। आर तिन अर्थ शुन परम समर्थ ॥ 214 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 214 ॥ अनुभाष्य—पहले कहे गये उन्नीस प्रकारके अर्थोंके साथ (204 संख्याका अनुभाष्य देखें) 'आत्माराम'-शब्दका अर्थ इन चार प्रकारके 'देहाराम'को (205 संख्याका । 447

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