श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1892, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/205-209 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इस प्रकार मैंने तुम्हें उन्नीस अर्थ बतलाये हैं, अब तुम आगे सुनो। 'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ 'देह' भी है, इस अर्थके द्वारा अन्य चार अर्थ प्रकाशित होंगे ॥ 205 ॥ अनुभाष्य—'चारि अर्थ तार'—(1) औपाधिक ब्रह्मदेह (206 संख्या); (2) कर्मनिष्ठ याज्ञिकोंकी कर्मदेह (208 संख्या); (3) तपोदेह (210 संख्या); (4) सर्वकाम-देह (212 संख्या) ॥ 205 ॥ साधुसङ्गके फलसे देहात्मबुद्धि अथवा विवर्त्तवादियोंको भी विवर्त्त बुद्धिके त्यागसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :— देहाराभी देहे भजे 'देहोपाधि ब्रह्म'। सत्सङ्गे सेह करे कृष्णेर भजन ॥ 206 ॥ अनुवाद—जो देहको ही मैं माननेवाले 'देह-उपाधि ब्रह्म'का अर्थात् अपनी देहको ब्रह्म मानकर भजन करते हैं, यदि उन्हें भी सत्सङ्गकी प्राप्ति हो जाय, तो वे भी श्रीकृष्णका भजन करते हैं ॥ 206 ॥ अनुभाष्य—देहाराभी देहको औपाधिक ब्रह्ममूर्ति समझकर अपनी देहकी सेवा करते-करते साधुसङ्गसे उस विवर्त्त-बुद्धिको छोड़कर श्रीकृष्णसेवा करते हैं॥ 206 ॥ श्रीमद्भागवत (10/87/18)— उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पदृशः परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो डहरम्। तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमं पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ 207 ॥ अनुवाद—(ऋषियोंके सम्प्रदाय मार्गमें) जो कर्मयोगमें उदर अर्थात् मणिपुरमें स्थित ब्रह्मकी उपासना करते हैं, वे 'शार्कराक्ष' ऋषि कहलाते हैं और वे कूर्पदृक् अर्थात् स्थूलदृष्टि हैं। और आरुणि ऋषिगण (उस सम्प्रदायके ऋषिगण) जहाँसे नाड़ियोंका विस्तार होता है उस हृदयाकाशमें (सूक्ष्म ब्रह्मकी) उपासना करते हैं। हे अनन्त, उससे उत्कृष्ट जो योगीगण शिरोगत (मूलाधार उदरसे आरम्भ करके हृदयके मध्यमेंसे होकर मस्तक और ब्रह्मरन्ध्र तक बढ़ते हुए) सहस्रदल-पद्मस्वरूप आपकी उपलब्धिके स्थान सुषुम्ना-नामक परमश्रेष्ठ ज्योतिर्मय धाममें पहुँच जाते हैं, वे पुनः मृत्युके मुख अर्थात् संसारमें पतित नहीं होते ॥ 207 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 24/160 संख्या देखें ॥ 207 ॥ साधुसङ्गके फलसे कर्मका त्याग करके देहारामी कर्मीको भी शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :— देहाराभी—कर्मनिष्ठ याज्ञिकादि जन। सत्सङ्गे 'कर्म' त्यजि' करये भजन ॥ 208 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 208 ॥ अनुभाष्य—'देहाराभी कर्मनिष्ठ'—यज्ञादि परायण; वे भी सुकृतिके फलसे भक्तोंके सङ्गसे कर्मनिष्ठारूपी यज्ञका त्याग करके श्रीकृष्णका भजन करते हैं ॥ 208 ॥ शौनकादिके द्वारा कर्मकाण्डकी निन्दा और श्रीसूतकी हरिकथा-कीर्तनमें प्रवृत्तिकी प्रशंसा :— श्रीमद्भागवत (1/18/12)में— कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे धूमधूम्रात्मनां भवान्। आपाययति गोविन्दपादपद्मासवं मधु ॥ 209 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(हे सूत!) हम आश्वास (अर्थात् निश्चय ही फल मिलेगा, इस आशासे) रहित इस कर्ममार्गमें धुएँसे धूमिल हो गये हैं, [ऐसी अवस्थामें] आप हमें श्रीगोविन्दके चरण-कमलोंके मधुमय [मादक] आसवका पान करा रहे हैं ॥ 209 ॥ अनुभाष्य—महाभागवत श्रीसूत-गोस्वामीके द्वारा शुश्रुषु शौनकादिको हरिकथारूपी भागवतका वर्णन आरम्भ करनेपर ऋषिगण अपने तुच्छ कर्मकाण्डके अनुष्ठानकी निन्दा कर रहे हैं,— अस्मिन् अनाश्वासे (अविश्वसनीय) कर्मणि (सत्रे) धूमधूम्रात्मनां (धूमेन धूम्रौ विवर्णौ आत्मानौ शरीर-चित्ते येषां तेषां तान् इत्यर्थः) भवान् मधु (मधुरं) गोविन्दपादपद्मासवं (श्रीकृष्ण-चरणाब्जयोः मकरन्दं श्रीहरिकथामृतमित्यर्थः) आपाययति (श्रावयति)। 446 |