श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1891, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/201-205 ] अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 201 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/275 संख्या देखें॥ 202 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखियों! गायों और गोपोंके श्रीमद्भागवत (2/4/18)में- साथ वन-वनमें भ्रमण करनेवाले, गायोंको बाँधनेवाली किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा रस्सीके पाशको धारण करने आदि जैसे चिह्नोंसे युक्त आभीरकङ्का यवनाः खशादयः। श्रीकृष्ण-बलदेवकी उदार वेणु-ध्वनि और गीतके द्वारा येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः देही (प्राणियों)के मध्य चलनेवाले स्थावरकी भाँति शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 203 ॥ स्तम्भित हो रहे हैं तथा स्थावर वृक्षादिमें पुलक हो रहा है, -यह सब बहुत विचित्र है॥ 201 ॥ अनुवाद-किरात, हूण, अन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश, अनुभाष्य-व्रजमें शरत्कालके आनेपर, श्रीकृष्णके आभीर, (शुम्भ) कङ्क, यवन और खशादि तथा अन्य द्वारा वन-वनमें वंशीध्वनि करते हुए गो-चारणके छलसे जो समस्त पापयोनि जातियाँ हैं, वे सब जातियाँ ही भ्रमण आरम्भ करनेपर, गोपियाँ वंशीध्वनिके श्रवणसे जिनके आश्रित-वैष्णवोंके आश्रयमें भली-भाँति शुद्ध हो श्रीकृष्णके सङ्गके लिये कामातुरा होकर इधर-उधर जाती हैं, मैं ऐसे प्रभावसे युक्त विष्णुको नमस्कार करता भ्रमण करते-करते श्रीकृष्णकी गुणावलीका वर्णन कर हूँ॥ 203 ॥ रही हैं, - अनुभाष्य-मध्यलीला 24/173 संख्या देखें॥ 203 ॥ हे सख्यः, गोपार्कैः (गोप-बालकैः सह) अनुवनं (प्रतिवनं) यहाँ तक उन्नीस प्रकारका अर्थ :— गाः नयतोः (सञ्चारयतोः) निर्योगपाशकृतलक्षणयोः (नियुज्यन्ते आगे 'तेर' अर्थ करिलुँ, आर 'छय' एइ। गावः आभिः इति निर्योगाः दोहनकालीन-पादबन्धन-रज्जुः, ऊनविंशति अर्थ हइल मिलि' एइ दुइ॥ 204 ॥ अधुष्यगवां कर्षणाथर्ाः पाशाः च, तैः कृतं लक्षणं चिह्नं ययोस्तयोः शिरसि निर्योगवेष्टनेन स्कन्धस्थापने च गोपपरिवृढश्रिया अनुवाद-मैंने पहले आत्माराम श्लोकके तेरह विराजमानयोः रामकृष्णयोः) कलपदैः (मधुरशब्दैः) उदारवेणुस्वनैः अर्थ बतलाये थे और अब ये छः अन्य अर्थ हैं, इस (महावेणुनादैः) तनुभृत्सु (शरीरधारिषु देहिषु) गतिमतां (ये प्रकार कुल मिलाकर उन्नीस अर्थ हुए॥ 204 ॥ गतिमन्तः, तेषाम्) अस्पन्दनं (स्थावरधर्मः) तरूणां पुलकः अनुभाष्य-'आगे तेर अर्थ'-पहले तेरह अर्थोंके (जङ्गमधर्मः-इति तु) विचित्रम् (अतिविचित्रम्)। लिये मध्यलीला 24/157 श्लोकका अनुभाष्य देखें। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 201 ॥ अन्य छः यह हैं, -(1) 'मनो-रमणशील' (159 संख्या); श्रीमद्भागवत (10/35/9)में— (2) 'यतने रमणशील' (162 संख्या); (3) 'धैर्यशील' वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं (168 संख्या); (4) 'बुद्ध्याराम पण्डितमुनि' (181 व्यञ्जयन्त इव पुष्पफलाढ्याः। संख्या); (5) 'बुद्ध्याराम निर्ग्रन्थ मूर्ख' (181 संख्या); प्रणतभारविटपा मधुधाराः (6) 'श्रीकृष्णदास-स्वभावविशिष्ट' आत्माराम (195 प्रेमहृष्टतनवो ववृषुः स्म ॥ 202 ॥ संख्या) ॥ 204 ॥ अनुवाद-[श्रीकृष्णका वेणुनाद श्रवण करके] वनकी 'आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दकी लताएँ और वृक्ष फूल और फलोंसे लद गये और 'देह'-अर्थसे व्याख्या :— उनके भारसे उनकी डालियाँ झुक गयीं। समस्त एइ ऊनिश अर्थ करिलु, आगे शुन आर। वनस्पति अपने भीतर श्रीकृष्णकी अभिव्यक्तिको सूचित 'आत्मा'-शब्दे 'देह' कहे, - चारि अर्थ तार॥ 205 ॥ करते हुए प्रेममें पुलकित होकर मधुधारा वर्षण करने लगीं॥ 202 ॥ । 445