भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1890, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1890

[ 24/196-201 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला च-शब्दे 'एव', 'अपि'-शब्द समुच्चये। 'आत्माराम' एव हञा श्रीकृष्ण भजये॥ 196॥ शुद्धस्वभाव 'आत्माराम' जीवका और 'निर्ग्रन्थ' जीवका दृष्टान्त :- एइ जीव-सनकादि सब मुनिजन। 'निर्ग्रन्थ'-मूर्ख, नीच, स्थावर-जङ्गम॥ 197॥ अनुवाद-अमृतानुकणा देखें॥ 196-197॥ अमृतानुकणा-आत्मा-शब्दसे 'स्वभाव' अर्थ, 'च'-शब्दसे 'एव' (निश्चय ही) अर्थ और 'अपि'-शब्दसे समुच्चय-अर्थ होनेपर, समस्त अर्थ यहाँपर इस प्रकार होते हैं,- सनकादि मुनिगण एवं 'निर्ग्रन्थ' अर्थात् मूर्ख, नीच, स्थावर-जङ्गमादि 'आत्माराम एव' होकर अर्थात् श्रीकृष्णदासके स्वभावसे युक्त होकर उरुक्रम-श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं॥ 196-197॥ मुक्तजीव व्यास आदिकी श्रीकृष्णसेवा-प्रसिद्ध, निर्ग्रन्थ अथवा निर्बोधके भजनका वर्णन :- व्यास-शुक-सनकादिर प्रसिद्ध भजन। 'निर्ग्रन्थ' स्थावरादिर शुन विवरण॥ 198॥ अनुवाद-व्यास, शुक और सनकादिका भजन तो प्रसिद्ध है ही, अब तुम मुझसे 'निर्ग्रन्थ' स्थावरादिके विषयमें श्रवण करो॥ 198॥ श्रीकृष्णकी कृपासे सभीका श्रीकृष्णभजन :- कृष्णकृपादि-हेतु हैते स्वभाव उदय। कृष्णगुणाकृष्ट हञा ताँहारे भजय॥ 199॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण-कृपासे सभी स्थावरादिका भी श्रीकृष्णदास होनेका स्वभाव उदित होता है और वे श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर उनका भजन करते हैं॥ 199॥ श्रीकृष्णके चरणके स्पर्शसे पृथ्वी धन्या, लक्ष्मीके भी काम्य वक्षःस्पर्शसे गोपियाँ धन्या :- श्रीमद्भागवत (10/15/8)में- धन्येयमद्य धरणी तृण-वीरुधस्त्वत्- पादस्पृशो द्रुमलतः करजाभिमृष्टाः। नद्योऽद्रयः खगमृगाः सदयावलोकै- र्गोप्योऽन्तरेण भुजयोरपि यत्स्पृहा श्रीः॥ 200॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 200॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यह भूमि (ब्रजभूमि) आज धन्य हो गयी है; आपके चरणस्पर्शसे सभी तृण, गुल्मादि, आपकी अङ्गुलिके स्पर्शसे वृक्ष-लता, आपके दयापूर्ण अवलोकनसे (दृष्टिसे) नदी-पर्वत-पक्षी-पशु आदि सब धन्य हो गये हैं। और लक्ष्मीको भी जिसे प्राप्त करनेकी स्पृहा है, उस आपके वक्षःस्थलको प्राप्त करके सभी गोपियाँ धन्य हो गयी हैं॥ 200॥ अनुभाष्य-पौगण्ड-अवस्थामें पदार्पण करके श्रीकृष्ण एकबार श्रीबलदेवके साथ कुसुमाकर-वनमें प्रवेश करके ब्रजकी शोभाको देखकर विहार करनेके इच्छुक होकर बड़े भाई श्रीबलदेवकी स्तुतिके छलसे स्वयं ही स्वयंकी स्तुति कर रहे हैं,- अद्य [तव चरणस्पर्शात्] इयं धरणी धन्या, [तथा] त्वत्पादस्पृशः (तव पादौ स्पृशन्तीति अतः) तृणवीरुधः (तृणगुल्मादयः) करजाभिमृष्टाः (नखैः स्पृष्टाः) द्रुमलतः (वृक्षवल्लर्यः) सदयावलोकैः (सकारुण्यदृष्टिभिः) नद्यः अद्रयः (गिरयः) खगमृगाः (खगाः पक्षिणः मृगाः पशवः) च (धन्याः), श्रीः अपि यत्स्पृहा (लक्ष्मीरापि यस्मै स्पृहयति, तेन) भुजयोः अन्तरेण (वक्षसा) गोप्यः च धन्याः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 200॥ श्रीकृष्णकी वंशीकी ध्वनिसे जङ्गमका स्थावर-धर्म, स्थावरमें जङ्गमके धर्मका उदय :- श्रीमद्भागवत (10/21/19)में- गा गोपर्केरनुवनं नयतोरुदार- वेणुस्वनैः कलपदैस्तनुभृत्सु सख्यः। अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणां निर्योगपाशकृतलक्षणयोर्विचित्रम्॥ 201॥ 444 ।