श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1889, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/189-195 ] अल्प सम्बन्ध उत्पन्न होनेपर भी वह निरअपराधी व्यक्तिकी भावोत्पत्तिका कारण बन जाता है ॥ 189 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/129 संख्या देखें ॥ 189 ॥ अनर्थमय और सकाम होनेपर भी सुबुद्धिके कारण निरन्तर श्रीकृष्णभजनके फलसे कामनाओंको त्यागकर निष्काम-सेवा और सिद्धिकी प्राप्ति; वैसा होनेपर भी सकाम-भक्ति निष्काम-सेवाका 'कारण' नहीं :- उदार महती याँर सर्वोत्तमा बुद्धि। नाना कामे भजे, तबु पाय भक्तिसिद्धि ॥ 190 ॥ अनुवाद-उदारचित्त और बुद्धिमान व्यक्ति अनेक प्रकारकी कामनाओंकी पूर्त्तिकी अभिलाषासे भजन आरम्भ करनेपर भी अन्तमें भक्तिकी सिद्धिकी प्राप्ति करते हैं ॥ 190 ॥ श्रीमद्भागवत (2/3/10)में- अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ 191 ॥ अनुवाद-पहले कोई 'अकाम' अर्थात् सर्वकामनाओंसे रहित हो अथवा 'सर्वकाम' अर्थात् सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्षकी कामना करनेवाला ही क्यों न हो, उदार-बुद्धि होने मात्रसे ही मनुष्य तीव्र शुद्धभक्तियोगसे परमपुरुष श्रीकृष्णका भजन करेंगे ॥ 191 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/36 संख्या देखें ॥ 191 ॥ निरन्तर सेवाके प्रभावसे काम अथवा अनर्थकी निवृत्ति और शुद्ध सेवाकी प्राप्ति :- भक्ति-प्रभाव, -सेइ काम छाड़ाञा। कृष्णपदे भक्ति कराय गुणे आकर्षिया ॥ 192 ॥ अनुवाद-भक्तिके प्रभावसे उस व्यक्तिकी समस्त प्रकारकी भोग-वासनाएँ धीरे-धीरे दूर हो जाती हैं और श्रीकृष्णके गुणोंसे आकर्षित होकर वह श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी निरन्तर सेवामें नियुक्त हो जाता है ॥ 192 ॥ श्रीमद्भागवत (5/19/26)में- सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां नैवार्थदो यत् पुनरर्थिता यतः। स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम् ॥ 193 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण प्रार्थना किये जानेपर मनुष्योंकी प्रार्थनाको पूर्ण करते हैं, यह बात सत्य है। किन्तु जिस अर्थसे (भोगकी वस्तुसे) बार-बार भोगके लिये प्रार्थना उदित होती है, श्रीकृष्ण उस अर्थको नहीं देते। अन्यकामी होकर जो एकमात्र उनके पादपल्लवको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करनेपर भी उनका भजन करते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें स्वयं ही अन्य-कामनाओंको शान्त कर देनेवाले अपने चरणकमलोंको दिया करते हैं ॥ 193 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 22/40 संख्या देखें ॥ 193 ॥ “आत्मारामः”-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके (7) 'स्वभाव'-अर्थकी व्याख्या :- 'आत्मा'-शब्दे 'स्वभाव' कहे, ताते येइ रमे। आत्माराम जीव यत स्थावर-जङ्गमे ॥ 194 ॥ अनावृत शुद्धजीवस्वरूप और आवृत जीवस्वरूपका धर्म; शुद्ध 'अहं' और अशुद्ध 'अहं'- जीवेर स्वभाव-कृष्णे 'दास' अभिमान। देहे आत्म-ज्ञाने आच्छादित सेइ 'ज्ञान' ॥ 195 ॥ अनुवाद-'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ 'स्वभाव' भी होता है, जो अपने स्वभावमें आनन्द अनुभव करते हैं, वे आत्माराम कहलाते हैं। इसलिये जितने भी स्थावर अथवा जङ्गम प्राणी हैं, वे सभी आत्माराम कहलाते हैं। वास्तवमें उन जीवोंका स्वभाव श्रीकृष्णके 'दास' होनेका अभिमान करना है, किन्तु देहमें आत्मबुद्धि होनेके कारण उनका यह वास्तविक 'ज्ञान' आच्छादित रहता है॥ 194-195 ॥ । 443