भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1888

[ 24/184-189 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अमृतप्रवाह भाष्य-स्त्री, शूद्र, हूण, शबरादि पापयोनिवाले जीव और पक्षी आदि तिर्यक-जातियाँ भी जब अद्भुतक्रम (भगवान् श्रीउरुक्रम) परायणगणोंसे (अर्थात् शुद्धभक्तोंके आचरणके अनुसरणसे) शिक्षा प्राप्त (अर्थात् भगवद्भक्त) होकर (दुस्तर दैवी) मायासे उद्धार प्राप्त कर लेते हैं, तब श्रौतपन्थी व्यक्तियोंका तो कहना ही क्या ? ॥ 184 ॥

श्रीमद्भगवद्गीता (10/10)में- तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ 186 ॥

अनुवाद-नित्य भक्तियोगके द्वारा जो लोग प्रीतिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, मैं उनको शुद्धज्ञानजनित विमल-प्रेमयोग दान करता हूँ। वे लोग उस ज्ञानके द्वारा मेरे परमानन्द धामको प्राप्त करते हैं॥186॥

अनुभाष्य-आदिलीला 1/49 संख्या देखें ॥186॥

अनुभाष्य-ब्रह्मा अपने शिष्य नारदसे भगवान् विष्णुके लीलावतार-समूहकी क्रिया, प्रयोजन और विभूतिसमूहका वर्णन करके उनकी दुस्तर मायासे मुक्त शरणागत उच्चकुलमें उत्पन्न भक्तोंके नामोंका वर्णन करके निम्नकुलमें उत्पन्न जनगणोंकी भी श्रौतपन्थामें मुक्ति-प्राप्तिकी योग्यताकी बात बतला रहे हैं,-

सर्वश्रेष्ठ पाँच प्रकारके साधन :- सत्सङ्ग, कृष्णसेवा, भागवत, नाम। व्रजे वास,-एइ पञ्चसाधन प्रधान ॥ 187 ॥

पाँच प्रकारके साधनोंमेंसे किसी एकके सामान्य अनुशीलनसे ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- एइ पञ्च-मध्ये एक 'स्वल्प' यदि हय। सुबुद्धि जनेर हय कृष्णप्रेमोदय ॥ 188 ॥

यदि स्त्रीशूद्रहूणशबरा पापजीवाः (पापयोनयः) तथा तिर्यक्जनाः अपि अद्भुतक्रमपरायणशील-शिक्षाः (अद्भुताः विस्मयोत्पादिकाः क्रमाः पादन्यासाः यस्य हरेः तस्य परायणाः हरिजनाः तेषां शीले स्वभावे शिक्षा येषां ते-ये शुद्धभक्त-शिष्याः सन्तः कृष्णभक्तसङ्गैः गठितचरित्राः भवन्ति, तर्हि एवम्भूताः) ते अपि देवमायां वै विदन्ति (जानन्ति) अतितरन्ति (अतिक्रामन्ति) च; [अतः] ये (भक्ताः) श्रुतधारणाः (श्रुतं भगवतः नामरूप- गुण-लीलादि-तत्त्वं धारयन्ति श्रौतमार्गेण ये, ते) किमु (पुनः तेषां किं वक्तव्यम्?-निश्चितमेव ते मायां विदन्ति अतितरन्तीत्यर्थः)।

अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 187 ॥ इन पाँच साधनोंमेंसे यदि कोई किसी एक अङ्गका भी 'स्वल्प' मात्रामें पालन करता है, तब ऐसे बुद्धिमान व्यक्तिमें श्रीकृष्णप्रेमका उदय होता है॥188॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'भागवत, नाम' - श्रीमद्भागवत और श्रीकृष्णनाम ॥ 187 ॥

अनुभाष्य-श्रीकृष्णभक्तसङ्ग, श्रीकृष्णसेवा, श्रीकृष्णकथा- विग्रह श्रीमद्भागवत, श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णधाम श्रीव्रजमें वास-ये पाँच प्रधान साधन हैं॥187 ॥

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 184 ॥

सद्बुद्धि और नित्य-अनित्यका विचार करके श्रीकृष्ण-भजनसे ही श्रीकृष्ण-प्राप्ति :- विचार करिया यबे भजे कृष्ण-पांय। सेइ बुद्धि देन ताँरे, याते कृष्ण पाय ॥ 185 ॥

भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/238)- दुरुहाद्भुतवीर्येऽस्मिन् श्रद्धा दूरेऽस्तु पञ्चके। यत्र स्वल्पोऽपि सम्बन्धः सद्धियां भावजन्मने ॥ 189 ॥

अनुवाद-भक्ति ही एकमात्र कल्याणका साधन है, इस प्रकार विचार करके जब कोई श्रीकृष्णके चरणकमलोंका भजन करता है, तब श्रीकृष्ण उसे स्वयं ऐसी बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे वह श्रीकृष्णको प्राप्त कर सके ॥ 185 ॥

अनुवाद-सहसा दुर्बोध और अद्भुत शक्तिसम्पन्न अन्तिम पाँच अङ्गोंमें श्रद्धाकी बात तो दूर रहे, अति

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