भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1887, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1887

चौबीसवाँ अध्याय 24/179-184 ] 'आत्माराम':—धैर्यवान, 'मुनय:'—पक्षिगण, (शास्त्र-ज्ञानरहित) 'मूर्ख'। ये दो प्रकारके आत्माराम 'निर्ग्रन्था:'—मूर्खगण :— श्रीकृष्णकी कृपासे और साधुसङ्गमें श्रीकृष्णमें रतिरूपा- 'च'—अवधारणे, इहा 'अपि'—समुच्चये। बुद्धिको प्राप्त करते हैं। वे शुद्धबुद्धिसे युक्त होकर धृतिमन्त हञा भजे पक्षि-मूर्खचये ॥ 179 ॥ अन्य सबका त्याग करके श्रीकृष्णभक्ति करते हैं॥ 180-182 ॥ अनुवाद—अमृतानुकणा देखें॥ 179 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—“सब छाड़ि' शुद्धभक्ति करे अमृतानुकणा—आत्मा-शब्दसे 'धृति'-अर्थ, 'च'-कारसे कृष्ण-पाय। कृष्णकृपाय साधुसङ्गे विचार-बुद्धि पाय॥” अवधारण-अर्थ (निश्चय-अर्थ) और 'अपि'-शब्दसे [अर्थात् सब कुछ त्याग करके वे श्रीकृष्णके समुच्चय-अर्थ ग्रहण करके 'मुनय:' और 'निर्ग्रन्थ अपि' चरणकमलोंकी शुद्धभक्ति करते हैं और श्रीकृष्ण-कृपासे अर्थात् मुनिरूप पक्षीगण एवं मूर्खगण 'आत्मारामश्च'— तथा साधुसङ्गमें विचार-बुद्धि प्राप्त करते हैं।]॥ 182 ॥ निश्चय रूपमें धृतिमान (अर्थात् धैर्यशील अथवा श्रीमद्भगवद्गीता (10/8)में— भगवत्सम्बन्धज्ञान-हेतु दुःखशून्य और उत्तमवस्तु अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्त्तते। भगवत्प्रेम-प्राप्ति हेतु पूर्णानन्द) होकर उरुक्रम-श्रीकृष्णकी इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ 183 ॥ अहैतुकी भक्ति करते हैं, इस प्रकारसे अर्थ होता अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 183 ॥ है॥ 179 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं सभीका प्रभव (उत्पत्ति)-स्थान 'आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके हूँ और मुझसे ही सब कुछ प्रवर्त्तित हुआ है; ऐसा (6) 'बुद्धि'-अर्थकी व्याख्या :— जानकर सब पण्डितगण भक्तियुक्त होकर मेरा भजन 'आत्मा'-शब्दे 'बुद्धि' कहे बुद्धिविशेष। करते हैं॥ 183 ॥ सामान्यबुद्धियुक्त यत जीव अशेष ॥ 180 ॥ अनुभाष्य— पण्डित और मूर्खके भेदसे बुद्ध्याराम दो प्रकारके :— अहं (कृष्णः) सर्वस्य (विधिरुद्राणां प्रपञ्चस्य च) प्रभवः बुद्ध्ये रमे आत्माराम—दुइ त' प्रकार। (हेतुः जन्मकारणम्); मत्तः (सर्वकारणकारणभूतात्) सर्वं 'पण्डित' मुनिगण, निर्ग्रन्थ 'मूर्ख' आर ॥ 181 ॥ (वस्तु) प्रवर्त्तते (मदधीनप्रवृत्तिकम्)—इति मत्वा बुधाः साधु और श्रीकृष्णकी कृपासे सद्बुद्धिकी (कृष्णरसविदः) भावसमन्विताः (प्रेमयुक्ताः सन्तः) मां भजन्ते। प्राप्ति और श्रीकृष्णभजन :— श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 183 ॥ कृष्णकृपाय साधुसङ्गे रति-बुद्धि पाय। भक्तकी कृपासे श्रौत-पथका अनुसरण करते हुए नीच सब छाड़ि' कृष्णभक्ति शुद्धबुद्ध्ये पाय ॥ 182 ॥ त्रियर्क जातिकी भी मायासे मुक्ति :— श्रीमद्भागवत (2/7/46)में— अनुवाद—'आत्मा'-शब्दका अर्थ 'बुद्धि' ग्रहण करनेसे ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां विशेष बुद्धिको लक्ष्य किया जाता है। किन्तु कम हो स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः। या अधिक हो, सभी जीवोंमें बुद्धि होती है, इसलिये यद्यद्भुतक्रमपरायण-शील-शिक्षा- सामान्य बुद्धिसे युक्त असंख्य जीवोंको भी स्वीकार स्तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा ये ॥ 184 ॥ किया गया है। जो अपनी बुद्धिका सदुपयोग करते हैं, अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 184 ॥ वे आत्माराम कहलाते हैं। ऐसे आत्माराम दो प्रकारके होते हैं, एक—'पण्डित' मुनिगण और दूसरे निर्ग्रन्थ । 441

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